खाद्य सुरक्षा का संकट : कीटनाशकों के खतरे में भारतीय

Edited By Updated: 31 Jul, 2026 03:53 AM

food security crisis indians at risk from pesticides

जब कीटनाशकों का उपयोग खाद्य सुरक्षा संस्थानों द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर किया जाता है, तो इन्हें सामान्यत: सुरक्षित माना जाता है। ङ्क्षचता तब होती है, जब लंबे समय तक या बार-बार इनका अत्यधिक संपर्क होता है, विशेषकर तब, जब इसके साथ भोजन में...

जब कीटनाशकों का उपयोग खाद्य सुरक्षा संस्थानों द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर किया जाता है, तो इन्हें सामान्यत: सुरक्षित माना जाता है। चिंता तब होती है, जब लंबे समय तक या बार-बार इनका अत्यधिक संपर्क होता है, विशेषकर तब, जब इसके साथ भोजन में प्रोसैस्ड फूड की मात्रा भी अधिक हो। ऐसे में इनसे आमतौर पर पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। 

दो साल पहले हांगकांग, सिंगापुर और अन्य 5 देशों ने कुछ भारतीय ब्रांड्स के मसाले लौटा दिए थे और अब जापान ने भारतीय आम, तो गत हफ्ते चीन ने भारत से गई मिर्चों की खेप खारिज कर दी। इसकी वजह थी-या तो उनमें कीटनाशकों के अवशेष तय सीमा से अधिक पाए गए या इनकी पैस्ट कंट्रोल प्रक्रिया में खामी रही। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि यदि निर्यात के लिए चुने गए और सबसे अधिक जांचे-परखे उत्पाद भी विदेशी मानकों पर खरे नहीं उतर रहे, तो देश के सामान्य उपभोक्ताओं की थाली में पहुंचने वाले खाद्य पदार्थों की स्थिति क्या होगी? यह कीटनाशक नियमन प्रणाली और देश में भोजन के सेहतमंद व सुरक्षित होने की गारंटी पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है।

दरअसल हमारे किसान ऐसे कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिन्हें विकसित देशों ने खतरनाक मानकर प्रतिबंधित कर रखा है, जैसे क्लोरपायरीफॉस, प्रोफेनोफॉस, पैराक्वाट, मोनोक्रोटोफॉस। देश के अनेक कृषि विश्वविद्यालय और कृषि विस्तार सेवाएं इन कीटनाशकों की सिफारिश करती हैं, बिना इस बात पर ध्यान दिए कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इनकी क्या स्थिति है। इसके अलावा, कम से कम 40 फीसदी कीटनाशक वे हैं, जो कभी रजिस्टर्ड नहीं हैं या नकली हैं। इससे इन कीटनाशकों में कौन-से तत्व हैं या वे कितने घातक हैं, इसका पता ही नहीं चल पाता। वहीं दूसरी तरफ भारत में फूड सेफ्टी के लिए (एफ.एस.एस.ए.आई.), कीटनाशकों के रजिस्ट्रेशन के लिए सैंट्रल इंसैक्टिसाइड्स बोर्ड और राज्य स्तरीय इकाइयां काम कर रही हैं लेकिन इनके बीच कोई तालमेल नहीं है। फिर कीटनाशक अधिनियम (1968) का लचर कानून भी आड़े आ जाता है, जिसमें किसी सैंपल के फेल होने पर विभाग के पास अदालत में मामला दर्ज करने के लिए सिर्फ 60 दिनों का समय होता है। यदि समय सीमा के भीतर केस फाइल नहीं कर होता, तो केस स्वत: खत्म हो जाता है।

वस्तुत: भारत में कीटनाशक उद्योग बेहद संगठित है। बीते कुछ वर्षों में उद्योग के दबाव के कारण ‘ऑल इंडिया नैटवर्क प्रोजैक्ट ऑन पैस्टिसाइड रेसिड्यूज’ (ए.आई.एन.पी.पी.आर.) जैसे अहम राष्ट्रीय निगरानी कार्यक्रम काफी कमजोर हो गए हैं। यह लॉबी कितनी मजबूत है, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सरकार ने मई, 2020 में 27 घातक कीटनाशकों पर बैन लगाने पर विचार करने के लिए एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया था। मगर बाद में इस प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

गौरतलब है कि हमारे भोजन की थाली में रासायनिक पदार्थों का जोखिम इस बात पर भी निर्भर करता है कि हम कौन-सी चीज कितनी मात्रा में और कितनी बार खाते हैं। पालक, मेथी और धनिया इस सूची में सबसे ऊपर हैं, क्योंकि कटाई के पहले इन पर कीटनाशकों का भारी छिड़काव होता है। इनके ऊपर छिलके जैसी कोई सुरक्षा नहीं होती, इसलिए इन्हें बिना छीले खाना खतरनाक हो सकता है। भिंडी, बैंगन और टमाटर भी इसी श्रेणी में आते हैं। अंगूर, स्ट्रॉबेरी और आलूबुखारे जैसे फल, जिन्हें सीधे खाया जाता है, इनमें भी काफी अधिक मात्रा में कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है। छिलके उतारे जाने वाले फलों की तुलना में इन फलों को अधिक मात्रा में खाना ज्यादा घातक हो सकता है। मसालों में सबसे ज्यादा रेसिड्यूज (कीटनाशक अवशेष) पाए गए हैं। 

कुछ रसायन और अत्यधिक प्रोसैस्ड खाद्य पदार्थ आंतों में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया का संतुलन बिगाड़ सकते हैं। इससे पेट फूलना, एसिडिटी, अपच, कब्ज या दस्त जैसी समस्याएं हो सकती हैं। पोल्ट्री और पशुपालन में एंटीबायोटिक्स का अनावश्यक इस्तेमाल सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत गंभीर ङ्क्षचता का विषय है, क्योंकि इससे एंटीबायोटिक प्रतिरोध बढ़ सकता है। लंबे समय तक विभिन्न हानिकारक रसायनों के संपर्क में रहने से फैटी लिवर और अन्य मेटाबॉलिक विकारों का खतरा बढ़ सकता है।

सरकार को अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा हेतु नीतिगत स्तर पर इन 3 कदमों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए, जिनमें सर्वप्रथम है-सभी प्रमुख खाद्य श्रेणियों की स्वतंत्र प्रयोगशालाओं में व्यापक स्तर पर जांच हो और उसके नतीजे तुरंत आम जनता के लिए सार्वजनिक किए जाएं। दूसरा, मोनोक्रोटोफॉस, पैराक्वाट और क्लोरपायरीफॉस जैसे रसायन सबसे ज्यादा घातक हैं। इन्हें चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए और किसानों को सुरक्षित विकल्पों के लिए वित्तीय व तकनीकी सहायता दी जाए। नकली कीटनाशकों को भी बाजार से बाहर किया जाना चाहिए। तीसरा, भारत में फूड सेफ्टी और कीटनाशकों की निगरानी की जिम्मेदारी कई एजैंसियों में बंटी हुई है। जरूरत ऐसी मजबूत संस्था की है, जो कीटनाशक पंजीकरण से लेकर बिकने वाले खाद्य पदार्थों तक, पूरी शृंखला की निगरानी करे। पैस्टिसाइड्स मैनेजमैंट बिल-2025 इस दिशा में एक अवसर हो सकता है।-ऋषभ मिश्रा 
 

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