हिंदी पत्रकारिता और महिलाएं

Edited By Updated: 09 Jun, 2026 05:17 AM

hindi journalism and women

हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे हुए, जिसका जश्न अनेक जगहों पर खूब मनाया गया। 30 मई, 1826 को हिंदी के पहले समाचार पत्र ‘उदंत मार्तंड’ का प्रकाशन कोलकाता से शुरू हुआ था। यह एक साप्ताहिक पत्र था। इसके सम्पादक जुगल किशोर शुक्ल जी थे, लेकिन यह मात्र 18...

हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे हुए, जिसका जश्न अनेक जगहों पर खूब मनाया गया। 30 मई, 1826 को हिंदी के पहले समाचार पत्र ‘उदंत मार्तंड’ का प्रकाशन कोलकाता से शुरू हुआ था। यह एक साप्ताहिक पत्र था। इसके सम्पादक जुगल किशोर शुक्ल जी थे, लेकिन यह मात्र 18 महीने ही चल पाया। कृष्ण बिहारी मिश्र ने अपनी किताब हिंदी पत्रकारिता में हिंदी के पुराने अखबारों और उनमें चलते बहस-मुबाहिसों का विस्तार से वर्णन किया है। 

इन 200 सालों में हिंदी ने अभूतपूर्व प्रगति की है। आज हिंदी के लगभग 1000 समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं। इनकी प्रसार संख्या करोड़ों में है। सबसे अधिक समाचार पत्र उत्तर प्रदेश से प्रकाशित होते हैं। उसके बाद महाराष्ट्र और दिल्ली का नम्बर है। आर.एन.आई. के आंकड़ों के अनुसार, हिंदी के कुल पत्र-पत्रिकाओं की संख्या साढ़े चार हजार है। हिंदी को गति देने और उसे दुनिया की तीसरे नम्बर की भाषा बनाने में इन अखबारों, रेडियो, टी.वी. और फिल्मों का बड़ा हाथ है। एक समय में हिंदी अखबारों, पत्रिकाओं में महिलाओं की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक थी लेकिन आज हर तरफ वे ही दिखाई देती हैं। हिंदी की पहली महिला पत्रकार हेमंत कुमारी देवी को माना जाता है, जिन्होंने 1888 में लखनऊ से ‘सुगृहिणी’ नाम से पत्रिका निकाली थी। हेमंत कुमारी हिंदी भाषी न होकर बांग्ला भाषी थीं लेकिन फिर भी उन्होंने हिंदी को महत्व दिया। तब से अब तक अगर मुहावरे में कहूं, तो गंगा में बहुत पानी बह चुका है। 

करीब 49 साल पहले जब इस क्षेत्र में आई तो इस बड़े और स्थापित संस्थान में मात्र 5 महिला पत्रकार थीं, जिनमें से 2 दैनिक पत्र में, बाकी 3 दो पत्रिकाओं में। दूरदर्शन पर जरूर प्रतिमा पुरी, मुक्ता श्रीवास्तव, ज्योत्सना आदि दिखाई देती थीं। लेकिन 90 के दशक में भूमंडलीकरण के कारण जब मीडिया का फैलाव हुआ, अखबारों के अनेक संस्करण शुरू हुए, चैनल्स की तो जैसे बाढ़ ही आ गई, तो महिला पत्रकारों की संख्या भी बढऩे लगी। इसका बड़ा कारण महिलाओं में बढ़ती शिक्षा, आत्मनिर्भरता की भावना, कुछ अलग कर दिखाने की चाहत, साथ ही मीडिया का ग्लैमर भी। यही वह दौर था जब शीला झुनझुनवाला एक साप्ताहिक पत्र की सम्पादक बनीं। बाद में मृणाल पांडे भी इसकी सम्पादक बनीं। कुछ साल बाद वह इसी संस्थान के दैनिक पत्र के सभी संस्करणों की सम्पादक बनीं। वह पहली महिला पत्रकार थीं, जो किसी दैनिक की सम्पादक बनी थीं। दिल्ली एन.सी.आर. की हिंदी महिला पत्रकारों के योगदान पर पत्रकार वंदना अग्रवाल ने शोध भी किया है। 

90 के दशक में महिला पत्रकारों की संख्या इस तरह से बढ़ रही थी कि उन्हें लगा कि अपने लिए एक अलग से क्लब होना चाहिए। इसलिए वुमन प्रैस कोर की स्थापना की गई। आज इस क्लब में हिंदी, अंग्रेजी दोनों की मिलाकर 1000 से अधिक पत्रकार सदस्याएं हैं। आज तो हालत यह है कि चैनल्स के प्राइम टाइम पर महिलाएं ही छाई हुई हैं। वे बड़े-बड़ों के छक्के छुड़ा देती हैं। उनकी विजिबिलिटी या दृश्यमानता चारों ओर बढ़ी है, तो उनका महत्व भी बढ़ा है। यही नहीं, महिला मुद्दों पर भी इनकी सक्रियता देखते ही बनती है। चाहे वह  मथुरा रेप कांड हो, जिसमें मथुरा नाम की लड़की से पुलिस वालों ने ही दुष्कर्म किया था,  दिवराला में 1987 में हुई सती और शाहबानो का मामला, निर्भया का मसला हो या फिर अन्य मसले। राजनीतिक विषयों से लेकर फिल्म, मनोरंजन, अपराध हर मामले में वे रिपोॄटग करती, लिखती नजर आती हैं। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के  खिलाफ अक्सर स्त्रियां एक सुर में बोलती नजर आती हैं, तो उनकी ताकत भी पहचानी जाती है। महिलाओं के सशक्तिकरण के कारण ही महिला पत्रकार भी बढ़ रही हैं। इस सशक्तिकरण में हमारे यहां महिलाओं के लिए बनाए गए कानूनों और लोकतंत्र का भी हाथ है।

अपने देश में इन दिनों सिर्फ पत्रकारिता ही नहीं, हर क्षेत्र में महिला सफल होती, आगे बढ़ती दिखाई देती हैं। अच्छी बात यह है कि हमारे यहां महिलाओं को अमरीका की तरह मीडिया का भारी विरोध नहीं झेलना पड़ा है। वहां तो महिलाओं को मात्र वोट का अधिकार पाने के लिए 70 साल तक संघर्ष करना पड़ा था। मीडिया में उनका खासा मजाक उड़ाया जाता था कि ये घर का चूल्हा-चक्की छोड़कर घर से बाहर निकलकर वोट देकर क्या करेंगी। तरह-तरह के कार्टून बनाकर उन्हें बेइज्जत किया जाता था। जबकि हमारे देश में तो महिलाओं को वोट के लिए ऐसा कोई अपमान नहीं झेलना पड़ा। बल्कि वे शिक्षित और आत्मनिर्भर हों, उनकी सुरक्षा बढ़े, इसे आम तौर पर हिंदी मीडिया में रहने वाले पुरुषों के एक बड़े वर्ग का समर्थन भी मिला। यही कारण है कि आज जब हम हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष मना रहे हैं, तो महिला पत्रकारों की धमक हर ओर सुनाई दे रही है। यह बढ़ती ही जा रही है। 

जैसा ऊपर बताया गया कि जब इस क्षेत्र में आई  तब इस क्षेत्र में कम महिलाएं ही थीं लेकिन 37 साल बाद जब यहां से बाहर निकली तो सिर्फ पत्रकारिता में ही नहीें, अन्य विभागों में महिलाएं ही महिलाएं दिखाई देती थीं। बल्कि यह मजाक चलता था कि बस कुछ ही साल की बात है, हर तरफ 100 प्रतिशत महिलाएं ही दिखाई देंगी।-क्षमा शर्मा

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