हिंदी पत्रकारिता : न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर

Edited By Updated: 30 May, 2026 03:42 AM

hindi journalism neither friendship with anyone nor enmity with anyone

हिंदी पत्रकारिता, जो कभी मिशन थी, अब बाजार के आतंक और भय के बीच पिस रही है। 30 मई को जब देश हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाता है, तब यह उस यात्रा का स्मरण है, जिसकी शुरुआत 1826 में उदन्त मार्तण्ड से हुई थी और जो आज मोबाइल स्क्रीन, यूट्यूब चैनलों और डिजिटल...

हिंदी पत्रकारिता, जो कभी मिशन थी, अब बाजार के आतंक और भय के बीच पिस रही है। 30 मई को जब देश हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाता है, तब यह उस यात्रा का स्मरण है, जिसकी शुरुआत 1826 में उदन्त मार्तण्ड से हुई थी और जो आज मोबाइल स्क्रीन, यूट्यूब चैनलों और डिजिटल स्टूडियो तक पहुंच चुकी है।

तकनीक का नहीं, विश्वास का संकट : एक बड़ा प्रश्न है-क्या हिंदी पत्रकारिता आज भी उतनी ही स्वतंत्र, निर्भीक और जनपक्षधर है, जितनी अपने आरंभिक दौर में थी? लेख और समाचार सत्य की नींव पर खड़े होकर सत्ता से टकराते थे और उनके परिणाम सच का आईना होते थे। अगर कोई सत्तालोलुप नग्न नृत्य कर रहा है तो वह कितने अलंकार, आभूषण और कीमती वस्त्र धारण कर ले, उसकी नंगई उजागर हो जाती थी। पत्रकार का लिखा पाठकों के मन को छू जाने के कारण एक अंगारे की तरह धधकता रहता और जब भी हवा चलती वह लपट और अग्नि रूप धारण कर सच्चाई को सामने ले ही आता। गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी और बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे नाम उस दौर की याद दिलाते हैं, जब पत्रकारिता नौकरी नहीं, राष्ट्रीय चेतना का अभियान थी। पत्रकार जेल जाते थे, अखबार बंद होते थे लेकिन कलम नहीं रुकती थी।

हिंदी की पहुंच जनमानस तक थी और है। अंग्रेजी में लिखने वाले लेखक भी हिंदी में अनुवाद, रूपांतर के जरिए विशाल हिंदी पाठक वर्ग तक पहुंचने को लालायित रहते थे। खुशवंत सिंह, कुलदीप नैयर जैसे पत्रकार भी अंग्रेजी की अपेक्षा हिंदी में छपने के कारण सामान्य पाठकों के बीच लोकप्रिय हुए। लाला जगत नारायण की प्रखर लेखनी और उनका बलिदान, प्रभाष जोशी की तीखी आलोचना, राजेंद्र माथुर की गहराई तक जाने की प्रतिभा, वेद प्रताप वैदिक की संतुलित शैली ने विश्लेषणात्मक लेखन को नई ऊंचाई दी। इसी दौर में पत्रकारिता धीरे-धीरे संस्थानों से निकलकर व्यक्तित्व आधारित होती गई। पत्रकार घरानों को उद्योगपतियों द्वारा अपने विशाल औद्योगिक साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया। संपादक का महत्व कम होता गया और संपादकीय कार्यालय उसकी एक अन्य गतिविधि बन गई।

समाचारपत्र समूह, जिनके लिए अंग्रेजी में पत्र पत्रिकाएं निकालना सत्ता में पैठ बनाने का मकसद लिए होता था, हिंदी में अखबार निकालना जनमानस तक पहुंचने का रास्ता था। हिंदी की कभी भारतीय भाषाओं के साथ प्रतिद्वंद्विता या प्रतियोगिता नहीं थी लेकिन अंग्रेजी अक्सर 2 बिल्लियों के बीच झगड़ा कराकर बंदर की भूमिका निभाने में सफल हो जाती थी। इसी का परिणाम यह हुआ कि जहां अंग्रेजी के अखबार 24, 28, 40 पन्नों तक के होने लगे, हिंदी के 4, 8 या 12 पन्नों तक सिमट गए। इस बात के प्रमाण हैं कि अनेक हिंदी पत्र इतने समर्थ थे कि समूह के अंग्रेजी प्रकाशनों का खर्चा चलाते थे। विडंबना यह रही कि इस स्थिति के बावजूद सबसे पहले हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं को बंद किया जाता था। इसके बाद बड़े समूहों ने संपादक की आवश्यकता को कम करते हुए इस तरह का मॉडल अपनाया, जिसमें बाजार का प्रभुत्व हो और उसे जानने वाले बताएं कि संपादक को अपने संपादकीय लिखते और अन्य सामग्री का चयन करते समय किन बातों का ध्यान रखना है। इस कारण जुझारू पत्रकार और कर्मठ संपादक की भूमिका अधिकतर केवल उसका नाम छपने की रह गई।

इस दौर में भी कुछ हिंदी समाचार पत्रों के मालिक पत्रकारों की लेखनी के पक्षधर बने रहे और स्वतंत्र तथा तथ्यों पर आधारित पत्रकारिता जीवंत बनी रही। आज हिंदी में सबसे अधिक पत्र-पत्रिकाएं हैं, जो अधिकांशत: गांव-देहात और छोटे जिलों और शहरों से एक ही व्यक्ति निकालता है। संपादक, मुद्रक, प्रकाशक, विज्ञापन एकत्रित करने वाला स्वयं होता है। फिर भी हिंदी पत्रकार ही हैं जो अपनी जान जोखिम में डालकर भ्रष्टाचार, अवैध खनन से लेकर माफिया नैटवर्क तक की पोल खोलते हैं।

मीडिया का मौन विभाजन : अंग्रेजी पत्रकारिता को सत्ता, कॉरपोरेट और अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक अपेक्षाकृत आसान पहुंच मिलती रही, जबकि हिंदी और क्षेत्रीय पत्रकारिता ने जमीन की धूल, गांवों की समस्याओं और स्थानीय भ्रष्टाचार से सीधा सामना किया। यही स्थिति अब डिजिटल युग में चैनलों की है। हिंदी रिपोर्टर की जान जोखिम में रहे लेकिन सुरक्षा की सुविधा में अंग्रेजी बाजी मार लेती है। यही कारण है कि भारत में सबसे अधिक खतरा अक्सर उन पत्रकारों को होता है, जो छोटे शहरों और कस्बों में काम करते हैं। आज मोबाइल फोन ने हर व्यक्ति को संभावित पत्रकार बना दिया है। यूट्यूब और सोशल मीडिया ने पत्रकारिता को लोकतांत्रिक तो बनाया है लेकिन इसमें जब निजी स्वार्थ शामिल हो जाता है तो यह कलंकित हो जाती है। सोशल मीडिया के जरिए आवाजें उभर रही हैं और उनकी पहुंच बढ़ रही है। डिजिटल युग अपने साथ नई समस्याएं भी लाया है, जिनमें फेक न्यूज, ट्रोल संस्कृति, एल्गोरिद्म आधारित सनसनी, विचारधारात्मक ध्रुवीकरण और ‘वायरल होने’ की होड़ शामिल हैं। आज खबर पहले वायरल होती है, सत्यापन बाद में होता है।

मीडिया अब सूचना उद्योग बन चुका है : पहले समाचार जनता तक पहुंचते थे। अब जनता का व्यवहार समाचार उद्योग तक पहुंचता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म यह तय कर रहे हैं कि कौन-सी खबर दिखाई जाएगी, कितनी देर दिखाई जाएगी और किस तरह प्रस्तुत की जाएगी। यह केवल संपादक का निर्णय नहीं रहा। डाटा और विज्ञापन अब नए ‘अदृश्य संपादक’ बन चुके हैं। यही आधुनिक पत्रकारिता का सबसे बड़ा और सबसे कम चर्चा किया गया सच है। क्या आज भी कोई पत्रकार सचमुच कह सकता है-‘न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर’? शायद यह पूर्ण वास्तविकता नहीं लेकिन पत्रकारिता का आदर्श अवश्य है और जब तक यह आदर्श है, तब तक लोकतंत्र में आस्था भी जीवित रहेगी। अंतत: पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता के साथ खड़ा होना नहीं, समाज को सच के साथ खड़ा करना है।-पूरन चंद सरीन
 

Related Story

    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!