भारत का ‘स्टील फ्रेम’ टिक नहीं सकता, यदि इसके भीतर की नैतिकता पिघल जाए

Edited By Updated: 16 May, 2026 05:15 AM

india s  steel frame  cannot stand if its inner morality melts away

हाल ही में भारत की आंखें पंजाब से आई बेहद परेशान करने वाली खबरों से खुलीं। कथित तौर पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सी.बी.आई.) ने विजीलैंस प्रतिष्ठान से जुड़े अधिकारियों के परिसरों पर छापेमारी की, जबकि एक अन्य मामले में डी.आई.जी. रैंक के एक वरिष्ठ पुलिस...

हाल ही में भारत की आंखें पंजाब से आई बेहद परेशान करने वाली खबरों से खुलीं। कथित तौर पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सी.बी.आई.) ने विजीलैंस प्रतिष्ठान से जुड़े अधिकारियों के परिसरों पर छापेमारी की, जबकि एक अन्य मामले में डी.आई.जी. रैंक के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को रिश्वत के आरोपों में गिरफ्तार किया गया। सार्वजनिक चर्चाओं और मीडिया रिपोर्ट्स में आगे यह सुझाव दिया गया कि एक नागरिक माध्यम ने कथित तौर पर भ्रष्टाचार और प्रभाव के एक व्यापक नैटवर्क का वर्णन करते हुए कई वरिष्ठ आई.पी.एस. और आई.ए.एस. अधिकारियों के नाम लिए। देश के सामने मौजूद यह बड़ा मुद्दा अनदेखा नहीं किया जा सकता। यदि भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए बनाए गए संस्थान ही संदेह के घेरे में आ जाएं, तो आम नागरिक तक क्या संदेश पहुंचता है?

यह चिंता केवल पंजाब तक सीमित नहीं, पूरे भारत में वरिष्ठ नौकरशाहों, पुलिस अधिकारियों और लोक सेवकों को पूछताछ, गिरफ्तारी, सतर्कता जांच और मुकद्दमों का सामना करना पड़ा है। चुनावों के दौरान, पक्षपात या अधिकार के दुरुपयोग के आरोपों पर मुख्य सचिवों, पुलिस महानिदेशकों, जिला मैजिस्ट्रेटों और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को अक्सर स्थानांतरित या हटा दिया जाता है। धीरे-धीरे और लगातार, प्रशासनिक प्रणाली की तटस्थता और नैतिक शक्ति में जनता का विश्वास कमजोर होता दिख रहा है।

भारत को अपना नौकरशाही ढांचा ब्रिटिश साम्राज्य से विरासत में मिला था। अंग्रेज हर साल केवल मुट्ठी भर उम्मीदवारों का चयन करते थे, जिनमें से अधिकांश इंगलैंड के बेहतरीन विश्वविद्यालयों से होते थे। भारत में तैनात होने से पहले उन्हें प्रशासन, कानून, अनुशासन, आचरण और शासन में कठोर प्रशिक्षण दिया जाता था। उनकी निष्ठा निस्संदेह ब्रिटिश क्राऊन के प्रति थी न कि भारत के प्रति। फिर भी इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने प्रशासनिक अनुशासन, पर्यवेक्षण और संस्थागत मानकों में भारी निवेश किया था। अधिकारियों से दृढ़, समयनिष्ठ, वित्तीय रूप से ईमानदार, सार्वजनिक आचरण में विनम्र और प्रशासन में सीधा होने की अपेक्षा की जाती थी। किसी भी प्रकार की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाती थी। भ्रष्टाचार को एक ऐसे कलंक के रूप में देखा जाता था जो करियर को स्थायी रूप से समाप्त करने में सक्षम था।   

स्वतंत्रता के बाद, भारत ने इस प्रशासनिक संरचना का अधिकांश हिस्सा बरकरार रखा। शासन का ‘स्टील फ्रेम’ जारी रहा, लेकिन इसकी निष्ठा क्राऊन से बदलकर भारत के संविधान के प्रति हो गई। स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दशकों में, कई सिविल सेवकों ने अनुशासन, त्याग और राष्ट्र-निर्माण की परंपराओं को आगे बढ़ाया। हालांकि, समय के साथ व्यवस्था धीरे-धीरे बदलने लगी। ब्रिटिश शासन के दौरान भर्ती हुए भारतीय मूल के अधिकारियों की पीढ़ी 1970 के दशक के अंत और 1980 के दशक की शुरुआत में सेवानिवृत्त हो गई। इसके बाद, धीरे-धीरे एक नई प्रशासनिक संस्कृति उभरी। 

आज के सिविल सेवक अकादमिक रूप से प्रतिभाशाली हैं। सिविल सेवा परीक्षा दुनिया की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक बनी हुई है। लाखों युवा भारतीय हर साल कुछ सौ पदों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं क्योंकि नौकरशाही सत्ता, प्रतिष्ठा, प्रभाव और सुरक्षा प्रदान करती रहती है। अधिकारियों का एक बड़ा बहुमत ईमानदार और मेहनती है। फिर भी चिंता इसलिए पैदा होती है क्योंकि वरिष्ठ स्तरों पर भ्रष्टाचार का एक छोटा-सा प्रतिशत भी संस्थागत विश्वसनीयता को गहरा नुकसान पहुंचा सकता है। वर्तमान संकट केवल प्रशासनिक नहीं है। यह नैतिक है। ‘परीक्षाएं अधिकारी बनाती हैं, चरित्र लोकतंत्र के संरक्षक बनाता है। एक राष्ट्र केवल परीक्षाओं से नहीं, बल्कि उन्हें उत्तीर्ण करने वालों के नैतिक साहस से चलता है।’ आज बढ़ती चिंता यह है कि कई जगहों पर संवैधानिक साहस की जगह सुविधा और अनुपालन की संस्कृति ले रही है। ‘यस बॉस’ अक्सर ‘यस संविधान’ की तुलना में अधिक फायदेमंद प्रतीत होता है। स्थानान्तरण, अनुबंध, खनन, उत्पाद शुल्क, भूमि मामले, भर्ती और जांच कभी-कभी ऐसे क्षेत्र बन जाते हैं, जहां राजनीतिक हित, आपराधिक नैटवर्क और भ्रष्ट प्रशासनिक तत्व आपस में मिल जाते हैं।

इतने बड़े पैमाने पर पैसा शायद ही कभी ईमानदार गतिविधि से निकलता है। अवैध संपत्ति अक्सर सार्वजनिक प्रणालियों के शोषण, संगठित भ्रष्टाचार, आपराधिक गतिविधि या राज्य सत्ता के दुरुपयोग से उत्पन्न होती है। जब भ्रष्ट व्यवसायी, अपराधी तत्व, समझौतावादी अधिकारी और राजनीतिक शक्ति एक साथ काम करने लगते हैं, तो आम नागरिक असहाय हो जाता है। तब कानून चुनिंदा रूप से लागू किए जाते हैं। ईमानदार अधिकारी अलग-थलग पड़ जाते हैं। निष्पक्षता का स्थान भय ले लेता है। इसलिए बड़ा प्रश्न अपरिहार्य हो जाता है-चयन, सत्यापन, प्रशिक्षण और पर्यवेक्षण की हमारी वर्तमान प्रणाली कितनी पुख्ता है? क्या कोई परीक्षा वास्तव में ईमानदारी को माप सकती है? क्या साक्षात्कार पूरी तरह से नैतिक शक्ति का न्याय कर सकते हैं? क्या केवल प्रशिक्षण अकादमियां अखंडता पैदा कर सकती हैं? शायद नहीं। ‘बिना नैतिकता के प्रतिभा, सत्ता के साथ अज्ञानता से अधिक खतरनाक है।’ फिर भी, भारत को उम्मीद नहीं छोडऩी चाहिए।

आज भी, देश भर में हजारों अधिकारी ईमानदारी, साहस और समर्पण के साथ चुपचाप सेवा करते हैं। कुछ कानून को बनाए रखने के लिए अपने करियर को जोखिम में डालते हैं। कुछ संगठित अपराध और भ्रष्टाचार से लड़ते हैं। कुछ सांप्रदायिक तनाव या राजनीतिक दबाव के दौरान कमजोरों की रक्षा करते हैं। भारत मजबूती से खड़ा है क्योंकि ऐसे अधिकारी आज भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं। लेकिन सुधारों में अब देरी नहीं की जा सकती। भारत को न केवल परीक्षाओं को, बल्कि नैतिक आधारों को भी मजबूत करना चाहिए। भर्ती में योग्यता को पुरस्कृत करना जारी रखना चाहिए लेकिन ईमानदारी के मूल्यांकन, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन और नैतिक अभिविन्यास पर भी अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। आंतरिक सतर्कता प्रणालियों को स्वतंत्र रूप से और तेजी से कार्य करना चाहिए। राजनीतिक नेतृत्व को यह पहचानना चाहिए कि भ्रष्ट अधिकारी अंतत: सरकारों को विपक्षी दलों की तुलना में अधिक नुकसान पहुंचाते हैं।-डा. इकबाल सिंह लालपुरा पूर्व चेयरमैन, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, भारत सरकार

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