Edited By Pardeep,Updated: 17 May, 2026 12:06 AM

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा न केवल कूटनीतिक और व्यापारिक मोर्चे पर, बल्कि सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी के लिहाज से भी ऐतिहासिक साबित हुई है। नीदरलैंड सरकार ने 11वीं शताब्दी के चोल राजवंश के बेशकीमती ताम्रपत्र (Copper Plates) औपचारिक...
एम्स्टर्डम/नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा न केवल कूटनीतिक और व्यापारिक मोर्चे पर, बल्कि सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी के लिहाज से भी ऐतिहासिक साबित हुई है। नीदरलैंड सरकार ने 11वीं शताब्दी के चोल राजवंश के बेशकीमती ताम्रपत्र (Copper Plates) औपचारिक रूप से भारत को सौंप दिए हैं। शनिवार को आयोजित एक भव्य समारोह में डच प्रधानमंत्री रॉब जेटेन की उपस्थिति में इन प्राचीन अभिलेखों को भारत के हवाले किया गया।
12 सालों की 'डिप्लोमैटिक जंग' में मिली बड़ी जीत
इन ऐतिहासिक अभिलेखों को यूरोप में 'लीडेन प्लेट्स' के नाम से जाना जाता है। भारत सरकार साल 2012 से ही इन ताम्रपत्रों को वापस लाने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रही थी। अब प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में नीदरलैंड ने इन्हें लौटाकर दोनों देशों के बीच गहरे होते रिश्तों का एक नया अध्याय लिख दिया है।
चोल साम्राज्य की वैभवशाली गाथा: 30 किलो का 'ऐतिहासिक खजाना'
ये ताम्रपत्र सम्राट राजराजा चोल प्रथम (985-1014 ईस्वी) के शासनकाल के हैं और इन्हें तमिल विरासत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
- अनोखी बनावट: इस संग्रह में कुल 21 ताम्रपत्र हैं जिनका वजन लगभग 30 किलोग्राम है।
- शाही मुहर: ये सभी प्लेटें एक पीतल की रिंग से जुड़ी हुई हैं, जिस पर चोल साम्राज्य की शाही मुहर (Royal Seal) लगी हुई है।
- संस्कृत और तमिल का मेल: इन पर शिलालेख दो भाषाओं में लिखे गए हैं—एक हिस्सा संस्कृत में है और दूसरा तमिल में।
नागपट्टिनम और समुद्र पार व्यापार के खुलेंगे राज
इतिहासकारों के अनुसार, ये रिकॉर्ड नागपट्टिनम में एक बौद्ध मठ को दिए गए दान से संबंधित हैं। ये शिलालेख उस युग में दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्वी एशिया के बीच समुद्री व्यापारिक संबंधों और विभिन्न धर्मों के बीच सह-अस्तित्व की परंपरा पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। गौरतलब है कि इन ताम्रपत्रों का उल्लेख मशहूर ऐतिहासिक उपन्यास 'पोन्नियिन सेलवन' में भी मिलता है।
18वीं सदी में भारत से गए थे नीदरलैंड
इतिहास बताता है कि ये ताम्रपत्र 18वीं शताब्दी में फ्लोरेटियस कैम्पर द्वारा नीदरलैंड ले जाए गए थे, जो उस समय नागपट्टिनम में एक ईसाई मिशन से जुड़े थे। दशकों तक ये नीदरलैंड की सुरक्षित सुविधाओं में रखे रहे और मुख्य रूप से शोधकर्ताओं के लिए ही उपलब्ध थे। अब, 24वें अंतर-सरकारी सत्र में भारत के दावे को सही ठहराए जाने के बाद, इनकी घर वापसी का रास्ता साफ हो गया है।
PM मोदी ने जताई खुशी
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इस ऐतिहासिक पल की तस्वीरें साझा करते हुए लिखा, "यह हर भारतीय के लिए खुशी का क्षण है! नीदरलैंड से 11वीं सदी के चोल ताम्रपत्र स्वदेश वापस आएंगे। प्रधानमंत्री रॉब जेटेन की उपस्थिति में इसके समारोह में भाग लिया"।