भारतीय कंपनियों को इन पांच ताकतों का सामना एकजुट होकर करना होगा

Edited By Updated: 06 Jun, 2026 05:17 AM

indian companies must unite to face these five forces

भारत के कॉर्पोरेट जगत के नेता अब अनिश्चितताओं से सहज महसूस करने लगे हैं। देश की संरचनात्मक वृद्धि बरकरार है। घरेलू मांग स्थिर है, उपभोक्ता वर्ग महत्वाकांक्षी है और नीतिगत माहौल व्यापक रूप से अनुकूल है। फिर भी, विकास का मार्ग पहले कभी इतना जटिल नहीं...

भारत के कॉर्पोरेट जगत के नेता अब अनिश्चितताओं से सहज महसूस करने लगे हैं। देश की संरचनात्मक वृद्धि बरकरार है। घरेलू मांग स्थिर है, उपभोक्ता वर्ग महत्वाकांक्षी है और नीतिगत माहौल व्यापक रूप से अनुकूल है। फिर भी, विकास का मार्ग पहले कभी इतना जटिल नहीं रहा। भू-राजनीति, तकनीकी व्यवधान और स्थिरता, वार्षिक नियोजन चक्रों की क्षमता से कहीं अधिक तेजी से प्रतिस्पर्धी गतिशीलता को नया आकार दे रहे हैं।

इस तिमाही में 25 क्षेत्रों की 1,000 से अधिक कंपनियों के अॄनग्स कॉल के कानविक विश्लेषण से पता चलता है कि बोर्डरूम कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई.) के तेजी से बढ़ते उपयोग, भू-राजनीतिक अनिश्चितता, बढ़ती मुद्रास्फीति और प्रीमियम उत्पादों की ओर व्यापक बदलाव जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। चौंकाने वाली बात इन दबावों की मौजूदगी नहीं, बल्कि इन सभी को एक साथ जिस हद तक संभालना आवश्यक है, वह है।

हर बोर्ड में एक ही मुद्दा हावी है-कमोडिटी की कीमतों में अस्थिरता, जिसका जिक्र तिमाही-दर-तिमाही 32 प्रतिशत बढ़ रहा है। जो कभी तेल, गैस और धातुओं तक ही सीमित था, अब उसका दायरा भी बढ़ गया है। फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (एफ.एम.सी.जी.) कंपनियां सोया, पाम, गेहूं और सूरजमुखी के तेल में होने वाले उतार-चढ़ाव को उपभोक्ताओं की पसंद और मुनाफे पर सीधा असर डालने वाला कारक बता रही हैं। निर्माण कंपनियां कच्चे माल की लागत को अपनी सबसे बड़ी ङ्क्षचता बता रही हैं। उपभोक्ता इलैक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में, तांबे की कीमतों में उतार-चढ़ाव सकल मुनाफे को नुकसान पहुंचा रहा है। धातु क्षेत्र में, बुनियादी ढांचे के विकास के चलते इस्पात की मांग में वृद्धि बताई जा रही है। फिर भी, इनपुट लागतों में तेजी से उतार-चढ़ाव के कारण मुनाफे का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है।

ए.आई. अब सिर्फ तकनीकी चर्चा का विषय नहीं रह गया, तिमाही दर तिमाही इसकी चर्चा में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भवन निर्माण सामग्री और स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में पहली बार इतनी वृद्धि दर्ज की गई है। वित्तीय सेवाओं में 400 प्रतिशत और खुदरा क्षेत्र में 240 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। सीमैंट कंपनियां ए.आई.-सक्षम केंद्रीय नियंत्रण प्रणालियों को लागू कर रही हैं। लॉजिस्टिक्स कंपनियां दस्तावेजीकरण को स्वचालित करने के लिए एजेंटिक ए.आई. का उपयोग कर रही हैं। खुदरा क्षेत्र में, बाजार की वृद्धि और उपभोक्ता विश्वास के साथ-साथ ए.आई. चर्चा के शीर्ष तीन विषयों में शामिल हो गया है।

भू-राजनीतिक उथल-पुथल : व्यापार नीति पर चर्चा स्थिर रही लेकिन बातचीत अधिक तीखी और क्षेत्र-विशिष्ट हो गई है। यूरोपीय बाजार इस बात का उदाहरण प्रस्तुत करता है कि कैसे एक ही भू-राजनीतिक घटनाक्रम किसी कंपनी की स्थिति के आधार पर खतरा या अवसर दोनों का रूप ले सकता है। ऑटोमोटिव कंपोनैंट्स और औद्योगिक मशीनरी के निर्यातकों के लिए, यूरोप में मांग में नरमी और नई टैरिफ संरचनाओं से मुनाफे पर दबाव पड़ रहा है। भारतीय स्पैशलिटी कैमिकल्स और फार्मास्युटिकल कंपनियों के लिए स्थिति उलट है, क्योंकि यूरोपीय प्रतिस्पॢधयों के संयंत्रों के बंद होने से आपूर्ति में कमी आई है जिसे वे पूरा कर सकते हैं। वहीं, भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते के चरणबद्ध कार्यान्वयन से वस्त्र, भवन निर्माण सामग्री और स्पैशलिटी मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों के लिए निर्यात के नए रास्ते खुलने की उम्मीद है। 

लाभ बढ़ाने की रणनीति के रूप में प्रीमियम उत्पादों पर जोर देना : उपभोक्ता व्यवहार में तिमाही-दर-तिमाही मामूली 2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई लेकिन प्रीमियम उत्पादों पर ज़ोर देना, उच्च मूल्य वाले उत्पादों की ओर एक रणनीतिक बदलाव, लागत दबाव के सबसे व्यापक रूप से अपनाए जाने वाले उपायों में से एक बनकर उभरा है। यह सभी क्षेत्रों में देखने को मिलता है। मुद्रास्फीति फिर से लौट आई है : इस तिमाही का सबसे तीव्र मात्रात्मक संकेत मुद्रास्फीति से संबंधित उल्लेखों में 45 प्रतिशत की वृद्धि है, जो सभी विषयों में सबसे बड़ी वृद्धि है। हालांकि महंगाई अपने शुरुआती स्तर से नीचे आ गई, लेकिन लागत का दबाव कम नहीं हुआ। औद्योगिक उत्पाद कंपनियां लगातार बढ़ती इनपुट लागत को एक समस्या मानती हैं। वित्तीय सेवाओं में, चर्चा अब उपभोक्ता ऋण की गुणवत्ता, विवेकाधीन खर्च व्यवहार और अर्थव्यवस्था के सुधार की गति जैसे कारकों पर केंद्रित हो गई है।

इन पांचों विषयों को जोडऩे वाली बात यह है कि इनमें से कोई भी अस्थायी नहीं है। कमोडिटी की अस्थिरता, ए.आई. व्यवधान, भू-राजनीतिक विखंडन, उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव और मुद्रास्फीति चक्र परिचालन परिवेश की संरचनात्मक विशेषताएं हैं, न कि चक्रीय उतार-चढ़ाव। इसके अलावा, उभरते हुए देश वर्तमान अस्थिरता का अधिक बोझ झेल रहे हैं, जिससे भारतीय कंपनियों और व्यापारिक नेताओं के लिए आज की परिस्थितियों से निपटना कठिन हो गया है।इन चुनौतियों का अलग-अलग समाधान करना व्यर्थ साबित हो सकता है। इस परिवेश से सबसे मजबूत होकर उभरने वाली कंपनियां वे होंगी, जो इन कारकों को वैश्विक महाप्रवृत्तियों के परस्पर जुड़े आयामों के रूप में देखेंगी, जिनका समाधान एक ही रणनीतिक प्रश्न के उत्तर से किया जाना चाहिए : निरंतर अस्थिरता की दुनिया में टिकाऊ रूप से बढऩे वाला व्यवसाय कैसे बनाया जाए?-दीपक शर्मा/रोहित प्रसाद 

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