भारतीयों के लिए बड़ी गंभीरता से सोचने की घड़ी

Edited By Updated: 08 Jun, 2026 05:52 AM

it is time for indians to think seriously

पूंजीवादी व्यवस्था के अधीन, संसार की वर्तमान दुर्दशा देखकर पूंजीवाद के अंधभक्त यदि अभी भी इस लुटेरे ढांचे का गुणगान करते जाएं, तो उनकी संवेदनहीनता और मूर्खता पर तरस ही खाया जा सकता है। इस ढांचे की मुख्य विशेषता अमीरी-गरीबी की खाई का बेतहाशा बढऩा और...

पूंजीवादी व्यवस्था के अधीन, संसार की वर्तमान दुर्दशा देखकर पूंजीवाद के अंधभक्त यदि अभी भी इस लुटेरे ढांचे का गुणगान करते जाएं, तो उनकी संवेदनहीनता और मूर्खता पर तरस ही खाया जा सकता है। इस ढांचे की मुख्य विशेषता अमीरी-गरीबी की खाई का बेतहाशा बढऩा और पूंजी का चंद हाथों में केंद्रित होते जाना है। इस अमानवीय ढांचे के पैरोकार और प्रचारक मनुष्य द्वारा मनुष्य की लूट को सही ठहराते हैं। संसार भर में जारी युद्ध साम्राज्यवादियों, उनके द्वारा संचालित बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेशन और हथियार लॉबी ने सिर्फ और सिर्फ अपने मुनाफे कायम करने और इन देशों के प्राकृतिक तथा मानवीय संसाधन हथियाने की घिनौनी मंशा के अधीन छेड़े हैं। इन युद्धों के कुप्रभाव के कारण, संसार के करोड़ों श्रमिक और मध्यम वर्गीय लोग, जो पहले ही महंगाई, बेरोजगारी, सामाजिक सुविधाओं में भारी कटौती, काम के घंटे बढऩे और पक्की नौकरी की जगह ठेकेदारी प्रथा के अधीन मामूली वेतन पर काम करने जैसी अलामतों की मार झेल रहे हैं, अब और भी नई, घातक मुसीबतों के मुंह में जा पड़े हैं। दूसरी तरफ जानलेवा हथियार और गोला-बारूद बनाने वाले मौत के सौदागरों के वारे-न्यारे हो रहे हैं।

भारत क्योंकि विश्व पूंजीवाद का एक अटूट हिस्सा है, इसीलिए यहां के लोग भी उन सब मुसीबतों के रूबरू हैं, जो दुनिया की बाकी जनता, खासकर श्रमिक आबादी को दरपेश हैं। नए शासकों ने देशवासियों के साथ एक और बड़ा द्रोह भी कमाया है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान साम्राज्यवाद की दलाली करते रहे राजा-रजवाड़ों को सत्ता में भागीदार बना लिया है। परिणाम, लोगों की प्रगति और खुशहाली के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा, देश का सामंती ढांचा कुछ छोटे-मोटे बदलावों के साथ ज्यों का त्यों आज भी कायम है। विदेशी व्यापार समझौतों में साम्राज्यवादियों की अवांछित शर्तें मानकर भारतीय हितों, खासकर कृषि और छोटे तथा मध्यम उद्योग-कारोबार और खुदरा व्यापार की घोर अनदेखी की जा रही है।

अमरीकी दबाव को नकार कर यदि हमने अपनी मर्जी के अनुसार रूस, ईरान, वेनेजुएला आदि देशों से सस्ते कच्चे तेल की खरीद की होती, तो बेलगाम महंगाई और जरूरी वस्तुओं की कमी तथा कालाबाजारी की मार से लाजमी बचे रह सकते थे। बढ़े कर्ज, विदेशी मुद्रा के भंडार और निवेश में आई भारी कमी, आयात-निर्यात के विशाल असंतुलन आदि को देखते हुए भारत को संसार की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और ‘विश्व गुरु’ बनाने का मोदी सरकार और संघ-भाजपा एंड कंपनी का हास्यास्पद और सिरे का गुमराह करने वाला प्रचार पूरी तरह से खोखला सिद्ध हो रहा है। ये बड़ी कुशलता से इस सवाल से भी पल्ला झाड़ जाते हैं कि दुनिया भर में जब कच्चे तेल की कीमतों में भारी कमी हुई थी, तब भारत में डीजल-पैट्रोल और अन्य पैट्रोलियम वस्तुओं के दाम क्यों नहीं घटाए गए?

मोदी सरकार अक्सर यह दावा करती है कि देश की 90 करोड़ आबादी को हर महीने आटा-दाल, गेहूं-चावल आदि मुफ्त दिए जाते हैं। यानी 90 करोड़ लोग इसी सरकारी योजना के सहारे अपनी दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करते हैं। 145 करोड़ आबादी वाले भारत महान में लोगों की इतनी बड़ी तादाद, यदि जीवित रहने के लिए सरकार द्वारा मुफ्त दिए जाने वाले मामूली से राशन पर निर्भर है, तो देशवासियों के दयनीय जीवन स्तर का अंदाजा भी बखूबी लगाया जा सकता है। देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति भी काफी चिंताजनक बनी हुई है। आंतरिक और विदेशी हिंसक गुट और अराजकतावादी तत्व हर दिन बम धमाके कर रहे हैं। धमकियों, अपहरण और फिरौती वसूलने का दौर गर्म है। मामूली झगड़ों में हत्या कर देना या एक-दूसरे को गाजर-मूली की तरह काट फैंकना आम बात बन गई है। 

देश के चुनाव आयोग और न्याय प्रणाली सहित सभी स्वायत्त संवैधानिक संस्थानों, एजैंसियों, विभागों और मीडिया का पूर्ण रूप से सरकारीकरण कर दिया गया है। मोदी सरकार ने लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ, असहमति के अधिकार और विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट दिया है। देश में जिस रफ्तार से बहुराष्ट्रीय विदेशी कंपनियों के स्वामित्व वाले बड़े-बड़े मॉल खुल रहे हैं, उसी मात्रा में उनके पीछे खुले छोटे-मोटे कारोबारों, दुकानों और रेहड़ी-पटरी लगाकर गुजारा करने वालों का गला घोंटा जा रहा है। अतीत के भारी भीड़-भाड़ वाले अनेक बाजारों में आज 30-40 प्रतिशत दुकानों पर ताले लटके मिल जाएंगे। बाकी ज्यादातर दुकानें भी भारी मंदी का शिकार हैं। वर्तमान केंद्र सरकार लोगों की चीख-पुकार सुनकर उनकी मुसीबतों का हल ढूंढने के साधन जुटाने से पूरी तरह मुकर बैठी है और लोगों का ध्यान असली मुद्दों से भटकाने के चक्कर में लगी हुई है।

भारतीय लोगों के लिए यह बड़ी गंभीरता से सोचने की घड़ी है। क्या हमें, देश को साम्राज्यवादी लूट-खसूट के नव-औपनिवेशिक चंगुल में फंसाकर लोगों की जिंदगी तबाह करने वाली सांप्रदायिक-फासीवादी ताकतों का साथ देना चाहिए या फिर देश को वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और जन-हितैषी विकास मॉडल बनाने के आधुनिक विचार की समर्थक ताकतों की मदद करनी चाहिए? हमारा विश्वास है कि लोग सही फैसला लेंगे, क्योंकि अंतत: जनता की ताकत ही सबसे शक्तिशाली और निर्णायक होती है।-मंगत राम पासला

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