जीवन दान की भांति मृत्यु दान संभव है!

Edited By Updated: 14 Mar, 2026 04:27 AM

just as the gift of life is possible so too is the gift of death

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से एक पुरानी बहस फिर शुरू हो गई है। इस मामले में पिछले 13 वर्षों से एक युवक मरणासन्न अवस्था में पड़ा था और ठीक होने की उम्मीद नहीं थी। माता-पिता की ओर से उसके लिए मौत मांगी गई, जिसे स्वीकार कर लिया गया। प्रश्न यह...

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से एक पुरानी बहस फिर शुरू हो गई है। इस मामले में पिछले 13 वर्षों से एक युवक मरणासन्न अवस्था में पड़ा था और ठीक होने की उम्मीद नहीं थी। माता-पिता की ओर से उसके लिए मौत मांगी गई, जिसे स्वीकार कर लिया गया। प्रश्न यह है कि क्या सभी विकल्प, जैसे आयुर्वेद और यूनानी, होम्योपैथी और प्राकृतिक या किसी भी अन्य उपचार से रोगमुक्त नहीं हो सकता था? इसका उत्तर डॉक्टर या मृत्युदान प्राप्त व्यक्ति के परिजन ही दे सकते हैं। इस विषय पर चर्चा होनी चाहिए।

मृत्यु और पुनर्जन्म : भारत में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्तमान औसत आयु 65 से 75 वर्ष तक की आंकी गई है। आजादी के समय यह 31-32 वर्ष और 50 साल पहले या 1975 में 50 साल थी। 80 तक पहुंच गए तो जश्न, 90 के हो गए तो ईश्वर की विशेष कृपा और इससे अधिक उम्र वाले कभी भी ईहलीला के लिए तैयार और 100 पूरे कर लिए तो विरले हो गए। हर कोई इतनी लंबी उम्र का राज जानने को आतुर और यदि कोई गंभीर बीमारी नहीं हुई तो दुनिया में निराले व्यक्ति हैं। हर कोई मिलकर उनसे उनके जीवन के विभिन्न पड़ावों के बारे में जानना चाहता है।

अस्सी पार कर लेने का अनुभव मुझे है। मेरी उम्र के संगी-साथियों और परिजनों के जाने के समाचार मिलते रहते हैं। निधन यानी अब कोई धन साथ में नहीं, महल-चौमहले, जमीन-जायदाद या दौलत जमा की हो, अपनी नहीं रही। खाली हाथ आए तो ऐसे ही जाना है। इसे देहांत भी कहते हैं, मतलब हाड़ मांस के इस शरीर या देह का अंत हो गया। इसी तरह मौत के लिए अनेक शालीन शब्दों का इस्तेमाल होता है, जैसे स्वर्गवास, परलोक गमन या महाप्रयाण। लोग कहते हैं कि स्वर्ग-नर्क तो यहीं रहकर भोगने होते हैं, अर्थात अच्छे कर्म किए तो उनका फल अपनी इच्छित वस्तुएं प्राप्त करने से है और बुरे किए, तब तो कल्पना के नर्क जैसा जीवन जीना होता है। परंतु एक व्यक्ति, जिसने अब तक कोई कर्म नहीं किया, वह मृत्यु के बाद कहां जाता होगा?

अब यहां समस्या यह खड़ी होती है कि श्रीमद्भगवद्गीता में प्रभु श्री कृष्ण कह गए कि जातस्य हि ध्रुवो मृत्युधुर्वम् जन्म मृतस्य च, जिसका अर्थ है कि जन्म हुआ तो मृत्यु निश्चित है और उस के बाद जन्म भी अवश्य होगा। हिन्दू धर्म और दर्शन में बहुत सी बातें कही गई हैं जैसे शरीर नश्वर, आत्मा अमर और जो नहीं रहता वह शरीर है, आत्मा ने तो पुराने वस्त्र का त्याग करने की तरह कहीं नई देह में प्रवेश करना है। 80-90 पार वाले इस आधार पर सोचने लगते हैं कि न जाने कितना समय और है, काफी जी लिया, परिवार को अपने सामने फलता-फूलता या गिरता-पड़ता देख लिया। सभी तरह की मोह माया से दूर रहने की बात मन में आने लगती है। काहे किसी झंझट में पड़ो, जितनी बची है, मस्ती से जिओ। 

यह बात हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख दर्शन में सिद्धांत रूप में है कि कहीं न कहीं जन्म तो होना तय है। बात यहीं खत्म हो जाती तो भी ठीक था क्योंकि सब यह सोचते हैं कि दोबारा कहीं किसी की कोख से पैदा हो जाएंगे लेकिन मुसीबत यह है कि आत्मा कर्मों के अनुसार 84 लाख योनियों में भटकती कही गई है। अब यह सोचकर तो फुरफुरी आती है कि इनमें से किसके यहां मतलब पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े या किस योनि को प्राप्त होंगे। जो कहते हैं कि जैसा करोगे वैसा भरोगे तो यहां प्रश्न यह उठता है और जिसे एक उदाहरण के रूप में भी रखा जा सकता है कि आज अमरीका-इसराईल और ईरान ने अपनी आपस की दुश्मनी निकालने के लिए पूरी दुनिया में हाहाकार मचा दिया है, लाखों-करोड़ों लोगों का जीवन संकट में डाल दिया है तो इनके कत्र्ता-धत्र्ताओं की मौत कैसे होगी और कौन सी योनि मिलेगी? वैसे ट्रम्प भी 80 के लपेटे में हैं। यह तय है कि उनकी मौत होगी लेकिन कैसे...कुछ नहीं कह सकते।

इच्छामृत्यु जीवन का अंतिम प्रश्न : हमारे धर्मों में मोक्ष की व्यवस्था है, मतलब कि जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल सकती है। इसलिए यही जन्म है तो जो चाहे कर लो। ईसाई, यहूदी, इस्लाम में मोक्ष की बात दूसरे ढंग से कही गई है और जन्म और मृत्यु के चक्र से बाहर निकला जा सकता है। पाप से मुक्ति और ईश्वर के शाश्वत रूप की मान्यता है। हमारे यहां मोक्ष है तो उनके यहां मुक्ति या उद्धार है। असली मुद्दा यह है कि जब हम उस उम्र के दौर में हैं, जब कभी भी आंख बंद हो सकती है, तो अपनी वसीयत जरूर बना लें और जब यह तय है कि नामालूम कब तक जिएंगे, तब तक के लिए अपने लिए आवश्यक चीजें, जैसे रहने को अपना घर और रोजाना के खर्चे के लिए जेब या बैंक में पर्याप्त पैसे रखें, ताकि किसी से कुछ मांगने की नौबत न आए। अपनी आजादी बनाए रखें, इतना ही काफी है।

हमारे धार्मिक ग्रंथों, आख्यानों और पौराणिक कथाओं में इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त होने की बात कही गई है। अनेकों पवित्र आत्माओं को अपनी इच्छानुसार मृत्यु का वरण करने की शक्ति प्राप्त थी। आज इसकी अनुमति माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णयों में दी है। इसके अनुसार असाध्य रोगों से पीड़ित और जीवन की कोई भी उम्मीद खो चुके व्यक्तियों को उनका लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने को मान्यता प्रदान कर दी गई है। इसके भी दो प्रकार हैं, एक तो रोगी को दवा के रूप में जहर जैसा कुछ दे दिया जाए या फिर जीवनदायिनी मशीनों का प्लग निकालकर ऑफ कर दिया जाए। सवाल है कि किसी पारिवारिक या राजनीतिक झगड़े में कोई ऐसा व्यक्ति, जिसके न रहने पर व्यक्तिगत लाभ हो तो अगर चिकित्सक के साथ मिलीभगत कर मृत्यु दान दे दिया जाता है तो उसके लिए कानून में क्या व्यवस्था है?-पूरन चंद सरीन
 

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