बुजुर्गों का अकेलापन और ए.आई.

Edited By Updated: 23 Jun, 2026 04:12 AM

loneliness of the elderly and ai

दुनिया में बुजुर्गों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे बहुत से अध्ययन भी किए गए हैं, जिनसे पता चलता है कि बुजुर्ग सबसे ज्यादा परेशान अपने अकेलेपन से हैं।

दुनिया में बुजुर्गों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे बहुत से अध्ययन भी किए गए हैं, जिनसे पता चलता है कि बुजुर्ग सबसे ज्यादा परेशान अपने अकेलेपन से हैं। पूरा जीवन किसी न किसी तरह का काम किया लेकिन अब उनके पास करने के लिए कुछ नहीं है। बहुत से बुजुर्ग चाहते हैं कि विविध क्षेत्रों में उनके अनुभव का लाभ उठाया जाए, वे कुछ काम कर सकें, जिससे उनका वक्त कट सके, कुछ आय भी हो लेकिन नीति नियंताओं की नजरें युवाओं पर लगी रहती हैं, क्योंकि उनके बारे में सोचा जाता है कि उनके शरीर में शक्ति है, ऊर्जा है, पर्स में पैसे हैं, इसलिए अधिकांश योजनाएं उन्हें ही देखकर बनाई जाती हैं। 

बहुत से बुजुर्ग ऐसे हैं, जिन्हें कोई आॢथक तंगी नहीं लेकिन उनसे बातचीत करने वाला कोई नहीं। अपने समवयस्कों के ऐसे ग्रुप्स भी बहुत कम हैं, जिनके साथ बैठकर कुछ गपशप की जाए, समय बिताया जाए। जिन बच्चों और परिवार के लिए जीवन और सारे संसाधन लगा दिए, उनके पास भी इनके लिए बहुत समय नहीं है। इसका एक कारण अपने देश में तो कम से कम यह है कि परिवारों का वह ढांचा खत्म हो गया है, जहां बुजुर्गों की राय को उनके अनुभव के आधार पर प्राथमिकता मिलती थी। अनुभव का जैसे कोई महत्व ही नहीं रहा। फिर आज की कामकाजी दुनिया भी पहले जैसी नहीं रही कि एक बंधे-बंधाए समय के लिए दफ्तर जाना है। बाकी समय परिवार के लिए है। अब तो 24&7 के काम की बातें गौरवपूर्वक की जाती हैं। बल्कि 24&7 काम करते हुए भी कई बार काम पूरा नहीं हो पाता। ऐसे में बुजुर्गों के लिए समय भी कहां है। डब्ल्यू.एच.ओ. की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि अमरीका तथा बहुत से यूरोपीय देशों में 20 से 34 प्रतिशत उम्रदराज लोग अकेलेपन से जूझ रहे हैं। अकेलेपन को ऐसी महामारी भी बताया गया, जो एक दिन में 15 सिगरेट पीने के बराबर है। इसीलिए बुजुर्ग न केवल अकेलेपन से जूझते हैं, इसके कारण अवसाद और तरह-तरह की बीमारियों के शिकार भी बनते हैं। 

कृत्रिम मेधा या आर्टीफिशियल इंटैलीजैंस (ए.आई.) के इस दौर में बुजुर्गों के लिए ऐसे उपकरण और रोबोट बनाए जा रहे हैं, जो उनकी कई तरह से मदद करते हैं। उनके कामों में हाथ बंटाते हैं। उनसे बातचीत करते हैं। ऐसे खेल बनाए गए हैं, जहां ए.आई. और बुजुर्ग खेलते हैं। पालतू जानवरों जैसे रोबोट्स भी हैं, जो बुजुर्गों के साथ रहते हैं। उनकी तरह-तरह से मदद करते हैं। हाल ही में एक ऐसी गुडिय़ा की खबर भी आई, जिसका नाम ह्योडोल है। इसे दक्षिण कोरिया में बनाया गया है। इसे सरकार की तरफ से बुजुर्गों को दिया जा रहा है। अब तक 14,500 बुजुर्गों को यह दी जा चुकी है। दक्षिण कोरिया में बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। इसलिए इस गुडिय़ा को इस तरह से बनाया गया है कि यह न केवल उनकी शारीरिक, बल्कि मानसिक स्थिति पर भी ध्यान देती है। नींद ठीक से आई कि नहीं, तबियत ठीक है कि नहीं, अगर तबियत खराब है तो दवा खाई कि नहीं, उनका मूड कैसा है। यदि इस गुडिय़ा को कोई ङ्क्षचताजनक स्थिति लगती है, तो वह फौरन केयर टेकर्स को इसकी खबर देती है। यह बुजुर्गों से बात करती है, उनके साथ गाना गाती है, उनका हाथ पकड़कर स्नेह जताती है। इसे पाकर वहां के बुजुर्ग बहुत खुश हैं। एक महिला ने कहा कि अब जब भी वह बाहर से लौटती है, तो उसे लगता है कि घर में कोई इंतजार कर रहा है।

अपने यहां कहावत कही जाती है कि ‘कुछ न से कुछ भला’, ए.आई. तकनीक के बारे में भी यह सोचा जा सकता है। जिन लोगों से कोई बात करने वाला  नहीं, खैरियत पूछने वाला नहीं, उनसे बात करने वाला, उनकी देखभाल करने वाला कोई तो है, चाहे वह मशीन ही क्यों न हो। 
यह बात भी महसूस होती है कि आखिर ये कैसे समाज हैं, जो अपने विकसित होने का दावा करते हैं। दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं लेकिन वहां इतना अकेलापन है कि कोई किसी की नहीं सुन रहा। परिवार के मुकाबले आप सरकार के भरोसे हैं। एक बार अमरीका में रहने वाले एक परिजन ने बताया था कि वहां बुजुर्गों के लिए बहुत अच्छी योजनाएं हैं। चिकित्सा सुविधाएं हैं लेकिन इनका लाभ तभी मिल सकता है, जब उन्हें कोई अस्पताल पहुंचाने वाला हो। अक्सर वही नहीं हो पाता। 

तथाकथित विकसित समाजों की तरह अपने देश में भी ऐसा हो रहा है कि बुजुर्गों का अकेलापन बढ़  रहा है। शहर के शहर और गांव के गांव, युवा आबादी से खाली हो गए हैं, क्योंकि वहां रोजगार के साधन नहीं। ऐसे में बुजुर्ग वहां अकेले हैं। गांव में तो चलिए फिर भी आपसी बातचीत कुछ होती हो, लेकिन शहरों में अकेलेपन की विकट स्थिति बढ़ती जा रही है। क्या बेहतर यह नहीं कि इंसानों को ही इंसान की मदद के लिए प्रेरित किया जाए? अनाथालयों और वृद्धाश्रमों को जोड़कर दोहरा लाभ प्राप्त किया जा सकता है। बच्चों को अभिभावक मिल जाएंगे और बुजुर्गों को बच्चों के साथ वक्त बिताने का आनंद। तब शायद किसी ए.आई. गुडिय़ा या रोबोट की मदद नहीं लेनी पड़ेगी।-क्षमा शर्मा
 

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