ज्यादा बच्चे? कृपया परिवारों को बख्शें

Edited By Updated: 26 May, 2026 06:57 AM

more children please spare the families

हाल ही में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि उनकी सरकार तीसरे बच्चे के जन्म पर 30 हजार और चौथे के जन्म पर 40 हजार रुपए देगी। इस देश में दशकों से परिवार नियोजन पालिसी के तहत लोगों को छोटे परिवार रखने के लिए कहा जाता रहा है। इस...

हाल ही में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि उनकी सरकार तीसरे बच्चे के जन्म पर 30 हजार और चौथे के जन्म पर 40 हजार रुपए देगी। इस देश में दशकों से परिवार नियोजन पालिसी के तहत लोगों को छोटे परिवार रखने के लिए कहा जाता रहा है। इस लेखिका ने अपने बचपन में रेलवे स्टेशनों पर ऐसे पोस्टर और दीवारों पर लिखे नारे देखे हैं। उस समय तर्क यह था कि आबादी ज्यादा होने के कारण, देश के संसाधनों पर बोझ पड़ता है। अर्थव्यवस्था कमजोर होती है, इसलिए परिवारों का छोटा होना जरूरी है। परिवार नियोजन के तमाम साधनों का खूब प्रचार किया जाता था। जो परिवार इन्हें अपनाते, उन्हें प्रोत्साहन राशि भी दी जाती।

अपने यहां बच्चों को भगवान की देन मानकर स्त्री की उम्र जब तक बच्चे पैदा करने की रहती, बच्चे होते ही रहते थे। इस कारण बहुत सी स्त्रियों की मृत्यु भी हो जाती थी। जैसे-जैसे शिक्षा बढ़ी, स्त्रियों के स्वास्थ्य संबंधी मसले सामने आए, लड़कियों के विवाह की उम्र तय की गई, लोगों में छोटे परिवार रखने की जागरूकता भी बढ़ी। आपातकाल के दिनों में संजय गांधी ने नारा दिया था-हम दो, हमारा एक। उस समय यह नारा सफल नहीं हुआ लेकिन आज यह सफल दिखता है, जहां मध्यवर्ग के अनेक परिवारों में एक ही बच्चा है। लड़का-लड़की का भेद भी नहीं है। चीन, जिसने अरसे तक दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के कारण एक बच्चा नीति कठोरता से अपनाई थी, उसकी खबरें भी आती रहती थीं। 

लेकिन अब ऐसा क्या हुआ है कि भारत, जो चीन को पछाड़कर दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन चुका है, वहां कोई नेता अधिक बच्चे पैदा करने की सलाह दे रहा है। आज भी देश की अधिकांश आबादी के पास मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं। कहीं पानी नहीं है, कहीं इलाज नहीं है, कहीं शिक्षा का ठीक इंतजाम नहीं है। ऐसे में यदि मान लीजिए पूरे देश में लोग 4-4 बच्चे पैदा करने लगें, तो क्या होगा? क्या हमारे पास इतना अन्न, दूध, दवाएं, रेलगाडिय़ां, बसें, अस्पताल, स्कूल हैं, जो आबादी के इस विस्फोट को संभाल सकें। कहा जा रहा है कि चूंकि दक्षिण ने अपने यहां परिवार नियोजन की नीतियों को ठीक से लागू किया, इसलिए उत्तर के मुकाबले उनकी आबादी कम हो गई है। उन्हें अपनी आबादी बढ़ाने की जरूरत है, नहीं तो वे पिछड़ जाएंगे। क्या सचमुच आबादी ज्यादा होने से ही हम आगे बढ़ते हैं? फिर तो अमरीका, रूस, जर्मनी, आस्ट्रेलिया आदि देशों को पीछे ही रहना चाहिए था, जबकि हम संसाधनों के मामले तक में इनसे बहुत पीछे हैं। 

दुनिया के तमाम देशों में आबादी कम हो रही है। रूस में तो 10 बच्चों को जन्म देने वाली मां को पुरस्कृत करने तक की घोषणा हुई है। चीन ने युवाओं को लुभाने के लिए तरह-तरह की योजनाएं बनाई हैं, जिससे कि वे कम से कम 3 बच्चे पैदा करें। जापान, अमरीका आदि देशों में भी अधिक बच्चे पैदा करने की बातें हो रही हैं लेकिन लोग हैं कि नहीं मान रहे। खास तौर पर स्त्रियां। वे कह रही हैं कि हम क्यों बच्चे दर बच्चे पैदा करती जाएं। यह हमारा शरीर है, इसलिए निर्णय भी हमारा ही होना चाहिए। इसके अलावा एक तरफ अगर आप चाहते हैं कि स्त्रियां नौकरी करें, घर भी संभालें, तो हर रोज बच्चे पैदा कैसे करें? क्यों करें? 

मां बच्चे को जन्म देती है, तो यह फैसला भी उसे ही करना है कि वह बच्चे पैदा करना चाहती है या नहीं। वैसे भी ङ्क्षडक यानी ‘डबल इंकम नो किड्स’ जैसी बातें भी चलन में हैं। मैं ऐसे कई जोड़ों से मिली भी हूं, जिन्हें बच्चे नहीं चाहिएं। फिर स्त्रीवादी विचार ने सिखाया कि कोख तुम्हारी सबसे बड़ी शत्रु है, तो एकाएक नेताओं के कहने से स्त्रियां क्यों मान लें कि कोख उनकी सबसे बड़ी मित्र है, इसलिए शिक्षा, आत्मनिर्भरता से भी अधिक उन्हें बच्चे पैदा करने के बारे में सोचना चाहिए। एक तरफ हमारे नेता अपनी पीठ थपथपाने से बाज नहीं आते कि देखो जी हमने स्त्रियों के लिए क्या-क्या कर दिया। उनके लिए शिक्षा सुगम बना दी। रोजगार के अवसर बढ़ा दिए। फ्री टिकट देकर उनकी यात्रा आसान कर दी। पुलिस थाने बना दिए। परिवार अदालतें बना दीं। लेकिन स्त्री की वह टैड्रीशनल छवि, जहां उसका सबसे महत्वपूर्ण काम बस मां बनना है, उसी को पालते-पोसते रहते हैं। यह निर्णय स्त्रियों पर ही छोड़ दीजिए कि वे क्या करना चाहती हैं। वे एक बच्चा चाहती हैं, 2 या 4 या एक भी नहीं। क्योंकि बच्चे पालना इन दिनों बेहद कठिन भी है। 

पश्चिमी देशों की तरह भारत में ऐसा नहीं है कि एक उम्र के बाद बच्चों की कोई जिम्मेदारी माता-पिता न उठाएं। यहां तक कि शिक्षा के लिए जो ऋण वहां बच्चे लेते हैं, उसे कई बार जीवन भर चुकाते हैं। माता-पिता उनकी कोई मदद नहीं करते, जबकि अपने यहां बूढ़े होने तक बच्चे जैसे माता-पिता की ही जिम्मेदारी रहते हैं। कृपया अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए परिवारों को बख्शिए। इन दिनों इलाज या शिक्षा जितनी महंगी है और रोजगार की कोई गारंटी नहीं, ऐसे में कौन बहुत-से बच्चे पाल सकता है।-क्षमा शर्मा
 

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