एन.ई.पी. 2020 और विकसित भारत तक की यात्रा में शिक्षकों की भूमिका

Edited By Updated: 06 Sep, 2026 05:33 AM

nep 2020 and the role of teachers in the journey towards a developed india

भारतीय परंपरा में, शिक्षा को हमेशा एक ऐसी यात्रा के रूप में देखा गया है, जो एक व्यक्ति को आकार देती है और समाज को समृद्ध बनाती है। ज्ञान व्यक्ति को दुनिया को समझने में मदद करता है, जबकि शिक्षक का मार्गदर्शन सीखने की प्रक्रिया को उद्देश्य, दिशा और...

भारतीय परंपरा में, शिक्षा को हमेशा एक ऐसी यात्रा के रूप में देखा गया है, जो एक व्यक्ति को आकार देती है और समाज को समृद्ध बनाती है। ज्ञान व्यक्ति को दुनिया को समझने में मदद करता है, जबकि शिक्षक का मार्गदर्शन सीखने की प्रक्रिया को उद्देश्य, दिशा और अर्थ देता है। प्राचीन भारत के गुरुकुलों से लेकर आज के क्लासरूमों तक, शिक्षक और शिक्षार्थियों के बीच का रिश्ता इस यात्रा के केंद्र में रहा है। हमारी प्राचीन परंपरा में, शिक्षक को एक ऐसे मार्गदर्शक के रूप में सम्मान दिया जाता था, जो शिक्षार्थी को ज्ञान और बेहतर समझ की ओर ले जाता था। ‘गुरु देवो भव:’ की भावना शिक्षक के प्रति गहरे सम्मान को दर्शाती है, जिनकी भूमिका अनुशासन, चरित्र, मूल्यों और जिम्मेदारी की भावना को विकसित करने तक विस्तृत है। शिक्षा को व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता था।

भारत की शिक्षा प्रणाली में गुरु-शिष्य परंपरा आज भी जीवित है। शिक्षक का योगदान केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं होता, बल्कि व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शिक्षक विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते हैं, उनके गुणों को पहचानते हैं, उन्हें अपनी रुचियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और उनमें आत्मविश्वास जगाने में मदद करते हैं। उनका मार्गदर्शन किसी व्यक्ति के जीवन पर स्थायी प्रभाव डाल सकता है और उन्हें एक सफल और जिम्मेदार इंसान बनने में मदद कर सकता है। 

भारत की शिक्षा की लंबी परंपरा में यह समृद्ध शैक्षिक विरासत दिखाई देती है। तक्षशिला, विक्रमशिला और नालंदा जैसे हमारे प्राचीन शिक्षा केंद्रों ने भारत और विदेशों से विद्यार्थियोंऔर विद्वानों को आकॢषत किया है। ये केंद्र गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन, साहित्य, भाषाओं और जीव विज्ञान जैसे विषयों पर विद्वत्ता, चर्चा और विचारों के आदान-प्रदान के केंद्र बन गए। इस परंपरा के मूल में इस बात की गहरी समझ थी, कि मानव जीवन के लिए ज्ञान का क्या अर्थ है। संस्कृत का वाक्यांश ‘ज्ञानं मनुजस्य तृतीयं नेत्रम्’ ज्ञान को मनुष्य की तीसरी आंख के रूप में प्रस्तुत करता है। ज्ञान हमें तत्कालिकता से परे देखने, गहराई से समझने और सोच-समझकर फैसले लेने के योग्य बनाता है। इस प्रक्रिया में शिक्षक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वह शिक्षार्थी को जानकारी से समझ की ओर और समझ से विवेक की ओर ले जाता है।

ये विचार ऐसे में और भी अहम हो जाते हैं, जब भारत 21वीं सदी के अवसरों के लिए अपनी शिक्षा व्यवस्था को तैयार कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में, एक विकसित और ज्ञान-आधारित राष्ट्र बनने की भारत की यात्रा में शिक्षा को केंद्र में रखा गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इस दिशा में एक अहम कदम है। यह नीति शिक्षार्थी को शिक्षा के केंद्र में रखती है और उसके सर्वांगीण विकास, वैचारिक समझ, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता, अनुभव आधारित शिक्षा और कौशल को महत्व देती है। साथ ही, यह भारतीय भाषाओं पर फिर से ध्यान केंद्रित करती है और विद्याॢथयों को आॢटफिशियल इंटैलिजैंस, कोडिंग, रोबोटिक्स और अन्य नई तकनीकों जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए भी तैयार करती है।

जानकारी प्राप्त करने और सीखने के लिए तकनीक बड़े पैमाने पर नए रास्ते खोल रही है। शिक्षक सीखने की इस प्रक्रिया को संदर्भ, दिशा और मानवीय जुड़ाव देते हैं। आधुनिक तकनीक से लैस क्लासरूम वास्तव में तब सार्थक होता है, जब शिक्षक विद्याॢथयों को सवाल पूछने, नई चीजें खोजने, समझने और जो सीखा है उसे लागू करने के लिए प्रेरित करते हैं। शिक्षक नए-नए तरीके अपना रहे हैं, तकनीक को शामिल कर रहे हैं और विद्यार्थियों को उनकी रुचियों और क्षमताओं को खोजने में मदद कर रहे हैं, साथ ही वे शैक्षिक सुधार के दृष्टिकोण को दैनिक क्लासरूम के अनुभवों में बदल रहे हैं। ज्ञान का बदलता स्वरूप भी शिक्षक की भूमिका को और भी महत्वपूर्ण बनाता है। आज विद्यार्थियों के पास जानकारी के बहुत सारे स्रोत उपलब्ध हैं। शिक्षक उन्हें विचारों को ध्यान से परखने, जानकारी और समझ के बीच फर्क करने, सार्थक सवाल पूछने और ज्ञान का जिम्मेदारी से उपयोग करने में मदद करते हैं। गुरुकुल से डिजिटल क्लासरूम तक की यात्रा, भारत की उस शानदार क्षमता को दिखाती है, जिसके जरिए वह नई संभावनाओं को अपनाते हुए अपनी सभ्यतागत समझ को आगे लेकर जा रहा है। शिक्षा के साधन भले ही बदल जाएं, लेकिन ज्ञान की खोज और शिक्षक की मार्गदर्शक भूमिका हमारी शैक्षिक यात्रा में हमेशा से अहम बनी हुई है।

आइए उस भारतीय परंपरा का जश्न मनाएं, जो ज्ञान को मानव जीवन के सबसे ऊंचे लक्ष्यों में से एक मानती है और उसे देने वालों का गहरा सम्मान करती है। इस समृद्ध विरासत को आगे बढ़ाएं और एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाएं, जो हर शिक्षार्थी को अपनी क्षमताओं को खोजने, समाज में योगदान देने और विकसित एवं ज्ञान-समृद्ध भविष्य की ओर भारत की यात्रा में आत्मविश्वास के साथ भाग लेने के लिए सक्षम बनाए।(लेखक केंद्रीय शिक्षा मंत्री और केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के मंत्री हैं)-प्रह्लाद जोशी 

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