अपने अर्थ, संदर्भ और मिजाज में भारतीय है हमारा लोकतंत्र

Edited By Updated: 18 Feb, 2026 05:31 AM

our democracy is indian in its meaning context and temperament

गणराज्य  के स्वधर्म की शिनाख्त करती हुई इस शृंखला में हम आज तीसरे सूत्र यानी लोकतंत्र की चर्चा करेंगे। सैकुलरवाद और समाजवाद की तरह लोकतंत्र के बारे में भी यही मान्यता है कि यह एक आधुनिक पश्चिमी विचार है। लेकिन अपने खांटी भारतीय अर्थ, संदर्भ और मिजाज...

गणराज्य के स्वधर्म की शिनाख्त करती हुई इस शृंखला में हम आज तीसरे सूत्र यानी लोकतंत्र की चर्चा करेंगे। सैकुलरवाद और समाजवाद की तरह लोकतंत्र के बारे में भी यही मान्यता है कि यह एक आधुनिक पश्चिमी विचार है। लेकिन अपने खांटी भारतीय अर्थ, संदर्भ और मिजाज में लोकतंत्र भारत गणराज्य का स्वधर्म है। यहां सवाल यह नहीं है कि हमने पश्चिमी लोकतंत्र से कुछ अपनाया है या नहीं। सवाल यह है कि जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं, उसकी जड़ें क्या सिर्फ आधुनिक काल में और सिर्फ पश्चिमी लोकतंत्र से सीखे तौर-तरीकों में हैं? 

इस खोज की शुरुआत प्राचीन भारतीय गणतंत्र से करनी होगी। इसलिए नहीं कि भारत गणराज्य का कोई तार सीधे वैशाली या लिच्छवी गणतंत्र से जुड़ा है। इन प्राचीन गणराज्यों से हमारा रिश्ता कुछ वैसा ही है, जैसा आज के यूरोप का एथेंस और स्पार्टा के नगर-राज्यों से। यानी कि रिश्ता सीधा नहीं, बल्कि इतिहास की तलहटी में रची-बसी स्मृतियों के माध्यम से है। आधुनिक गणराज्य को भले ही प्राचीन गण का संस्थागत ढांचा विरासत में नहीं मिला, लेकिन उसमें गण की अवधारणा, उसकी शब्दावली और उसके प्रतीक जरूर घुल-मिल गए। 

प्राचीन भारत के गणतांत्रिक राज्य ईसा पूर्व 5वीं और चौथी सदी में उभरे थे, ठीक उसी समय, जब एथेंस में लोकतंत्र का जन्म हुआ था। इन दोनों को आधुनिक अर्थ में लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। लेकिन उत्तर भारत के इन कबीलाई गणतांत्रिक राज्यों में वैसे अनेक तत्व मौजूद थे जिन्हें लोकतंत्र की बुनियाद कहा जा सकता है-एक संप्रभु राजा की जगह एक समूह द्वारा राज, सांझी संप्रभुता, आम सभा में और आम सहमति से निर्णय और जरूरत हो तो मतदान की प्रक्रिया। गण, सभा, समिति, परिषद-अगर हमारा लोकतंत्र आज भी इन शब्दों से पल्लवित है तो इनके अर्थ भी कहीं न कहीं हमारी लोक संस्कृति का हिस्सा हैं।

प्राचीन भारत की विरासत को हमारे गणतंत्र से जोडऩे का काम विनय की अवधारणा करती है। आजकल हम विनय का इस्तेमाल नम्रता और अनुनय के अर्थ में करते हैं। पूर्व वैदिक और वैदिक काल में भी विनय को एक विद्यार्थी के व्यक्तिगत शील का अंग समझा गया-शालीनता, शिष्टता, संयम और गुरुजन का आदर। लेकिन गौतम बुद्ध ने विनय की व्याख्या नैतिक अनुशासन की आचार संहिता के रूप में की। पहले मौखिक और फिर लिखित रूप में विनयपिटक ने संघ से जुडऩे वाले सभी बौद्ध भिक्षुकों के आचार-व्यवहार को मर्यादित करने के लिए एक विस्तृत संहिता बनाई। बौद्ध संघ की विनयपिटक ने उस जमाने के गणतंत्रों की अलिखित नियमावली को लिपिबद्ध कर दिया। यह आचार संहिता भिक्षुओं के व्यक्तिगत आचार व्यवहार और एक धार्मिक संगठन के आंतरिक अनुशासन के लिए बनी थी, किसी राजनीतिक समुदाय के लिए नहीं। लेकिन एक मायने में विनयपिटक भारत का पहला लिखित संविधान है। 

गौरतलब है कि संघ की निर्णय प्रक्रिया में ऊंच-नीच के लिए कोई जगह नहीं है। संघ में आने के बाद अमीर-गरीब या जाति का कोई मतलब नहीं है। हर भिक्षु का एक मत है-वरिष्ठ हो या कनिष्ठ, पुरुष हो या महिला, संघ का सामूहिक निर्णय सर्वोच्च है। विनयपिटक की यह परंपरा बौद्ध धर्म के साथ विलुप्त नहीं हो गई। कालांतर में जैन, शैव, वैष्णव सहित अनेक सम्प्रदायों ने इस खांचे का इस्तेमाल किया और धर्मशास्त्र के जरिए यह सामूहिक जीवन के बारे में हमारी सोच का हिस्सा बन गया। आज यह भाषा हमारे लिए अपरिचित है लेकिन आम राय से पंचायती फैसले लेने की मर्यादा कहीं न कहीं विनयपिटक से जुड़ी है। सल्तनत और मुगल राज ने इस सोच में एक नया आयाम जोड़ा। जाहिर है बादशाह के राज में लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं की कोई जगह नहीं थी। लेकिन सूफी संतों की सीख के चलते भारत में इस्लाम की राजनीतिक भाषा में बदलाव आया। यहां अदल यानी न्याय और मसलह यानी कल्याण की अवधारणा में हुए बदलाव महत्वपूर्ण हैं। राजा का राज सिर्फ उसके खानदान या युद्ध में विजय के आधार पर वैध नहीं ठहराया जा सकता।

बादशाह तभी जिल्ल-ए-इलाही (अल्लाह की परछाई) कहलाएगा अगर वह प्रजा का नैतिक अभिभावक बने, खुद उसके व्यक्तित्व में न्याय झलके (तकाकिया), वह शालीनता और संयम का व्यवहार करे, जुल्म न करे और कमजोर लोगों की रक्षा (रैयत-परवरी) करे। बादशाह की वैधता इस पर भी निर्भर करती है कि वह बिना किसी धार्मिक भेदभाव के अपनी समस्त प्रजा का कल्याण करे, उनकी खिदमत करे। राजशाही की वैधता को स्थापित सिद्धांतों की बजाय अदल और मसलह से जोडऩा सिर्फ एक नैतिक उपदेश नहीं था। यह शासक को मर्यादा से बांधने का एक बड़ा कदम था। भारत में लोकतंत्र की आधुनिक भाषा यूरोप से आई। लेकिन उसे भारत ने अपने तरीके से अपनाया और उसकी अपनी इबारत विकसित की।

नतीजतन भारतीय लोकतंत्र किसी बनी-बनाई लीक पर नहीं चला। लोकतंत्र का पौधा उस परिवेश में फला-फूला, जिसमें लोकतंत्र की गुंजाइश नहीं बताई जाती थी। भारतीय लोकतंत्र ने उन तमाम संकटों को झेला, जिनसे अमूमन तीसरी दुनिया के लोकतंत्र उबर नहीं पाते थे। इसलिए भारतीय लोकतंत्र ने लोकतंत्र के विचार का लोकतांत्रीकरण कर एक वैश्विक व्यवस्था बनाने में योगदान दिया। हमारे यहां लोकतंत्र किसी राजशाही या तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष से नहीं आया। हमारा मुख्य आंदोलन देश की आजादी का था। उसकी सफलता से लोकतंत्र अपने आप हासिल हो गया। 

संविधान ने पश्चिम के उदारवादी लोकतंत्र का पूरा तंत्र बना दिया। लेकिन उस तंत्र में प्राण फूंकना संविधान के बस की बात नहीं होती। जनमानस का मिजाज संविधान नहीं लिख सकता। इसलिए भारत में लोकतंत्र के प्रयोग ने एक अनूठा रास्ता अपनाया। लोकतंत्र का मतलब था जनता-जनार्दन। इसलिए लोकतंत्र के त्यौहारों में जनता की भागीदारी खूब बढ़ी। लेकिन जनता को प्रक्रिया नहीं, परिणाम से मतलब था। लोकतांत्रिक पद्धति से चुने गए शासक को मर्यादित करने की जिम्मेदारी संस्थाओं ने नहीं निभाई। यह काम जनआंदोलनों ने किया। लोकतंत्र का मतलब था बहुमत का राज। एक लंबे समय तक लोकतांत्रिक शासकों ने इसे बहुसंख्यक समुदाय का राज होने से रोके रखा। विविध भाषाओं और क्षेत्रों का सम्मान किया। भारत लोकतंत्र और विविधता के सामंजस्य का एक मॉडल बना। लेकिन एक वक्त इसमें अल्पसंख्यक के अधिकार की चिंता दब गई। बहुमतवादी लोकतंत्र का उदय हुआ। (लेखक की नई पुस्तक ‘गणराज्य का स्वधर्म’ से उद्धृत और सम्पादित अंश)-योगेन्द्र यादव
 

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