Edited By ,Updated: 18 Jun, 2026 04:24 AM

हिमाचल प्रदेश लंबे समय से अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य के सामने एक गंभीर चुनौती उभरकर सामने आई है-चिट्टा (हैरोइन) और अन्य मादक पदार्थों का बढ़ता प्रचलन। विशेष रूप...
हिमाचल प्रदेश लंबे समय से अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य के सामने एक गंभीर चुनौती उभरकर सामने आई है-चिट्टा (हैरोइन) और अन्य मादक पदार्थों का बढ़ता प्रचलन। विशेष रूप से युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति ने समाज, परिवार और सरकार, सभी की ङ्क्षचता बढ़ा दी है। इस चुनौती से निपटने के लिए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली हिमाचल सरकार ने व्यापक स्तर पर अभियान छेड़ा है।
बढ़ती समस्या और सामाजिक चिंता : हिमाचल प्रदेश में चिट्टे का कारोबार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से फैला है। सीमावर्ती राज्यों से होने वाली तस्करी और युवाओं को आसान पैसे तथा गलत संगति का लालच इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। नशे के कारण अनेक परिवार टूट रहे हैं, अपराध बढ़ रहे हैं और युवाओं का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि नशे की लत केवल व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज को प्रभावित करती है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए इस समस्या का समाधान केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं बल्कि सामाजिक जागरूकता का भी प्रश्न है।
सरकार की सख्त कार्रवाई : सुक्खू सरकार ने सत्ता संभालने के बाद नशे के खिलाफ जीरो टॉलरैंस की नीति अपनाई है। राज्य पुलिस को तस्करों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। विशेष जांच दलों का गठन किया गया है और अंतर्राज्यीय तस्करी नैटवर्क को तोडऩे के लिए पड़ोसी राज्यों की एजैंसियों के साथ समन्वय बढ़ाया गया है। पुलिस द्वारा लगातार छापेमारी अभियान चलाए जा रहे हैं। नशा तस्करों की संपत्तियों की जांच, अवैध कमाई पर कार्रवाई तथा बड़े नैटवर्क का पर्दाफाश करने के प्रयास तेज किए गए हैं। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि नशे के कारोबार में शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।
युवाओं को बचाने पर विशेष जोर : सरकार का मानना है कि केवल गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसलिए युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए जागरूकता कार्यक्रमों पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नशा विरोधी अभियान चलाए जा रहे हैं। विद्याॢथयों को नशे के दुष्परिणामों के बारे में जानकारी दी जा रही है। खेल गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और रचनात्मक प्रतियोगिताओं को बढ़ावा देकर युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास किया जा रहा है।
पंचायतों और समाज की भागीदारी : नशे के खिलाफ लड़ाई को जन आंदोलन बनाने के उद्देश्य से सरकार पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों, महिला मंडलों और युवा क्लबों को भी साथ जोड़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता शिविर आयोजित किए जा रहे हैं, जहां लोगों को नशे के खतरों और उससे बचाव के उपायों के बारे में बताया जाता है। महिला समूह विशेष रूप से इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। माताएं और बहनें अपने परिवारों और समुदायों में नशे के विरुद्ध जनमत तैयार कर रही हैं। समाज की यह भागीदारी सरकार के प्रयासों को और अधिक प्रभावी बना रही है।
पुनर्वास और उपचार की व्यवस्था : नशे की गिरफ्त में आ चुके लोगों के लिए पुनर्वास और उपचार भी आवश्यक है। इस दिशा में सरकार नशा मुक्ति केंद्रों को मजबूत बनाने पर कार्य कर रही है। विशेषज्ञ चिकित्सकों और परामर्शदाताओं की सहायता से नशे के शिकार युवाओं को सामान्य जीवन में लौटाने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य केवल नशेडिय़ों को अपराधी के रूप में देखना नहीं, बल्कि उन्हें उपचार और पुनर्वास का अवसर प्रदान करना भी है। इससे अनेक युवाओं को नई शुरुआत करने का मौका मिल रहा है।
भविष्य की चुनौतियां : हालांकि सरकार के प्रयास सराहनीय हैं लेकिन नशे के खिलाफ यह लड़ाई लंबी और कठिन है। तस्करों के बदलते तौर-तरीके, डिजिटल माध्यमों का दुरुपयोग और युवाओं तक नशे की आसान पहुंच जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इनसे निपटने के लिए सरकार, प्रशासन और समाज को मिलकर लगातार काम करना होगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि रोजगार के अवसर बढ़ाने, खेल सुविधाओं को मजबूत करने और परिवारों में संवाद को बढ़ावा देने से भी युवाओं को नशे से दूर रखा जा सकता है।
निष्कर्ष : चिट्टे के खिलाफ हिमाचल प्रदेश में सुक्खू सरकार की मुहिम केवल कानून लागू करने का अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढिय़ों को सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य देने का प्रयास है। यदि सरकार, प्रशासन, शैक्षणिक संस्थान, सामाजिक संगठन और आम नागरिक मिलकर इस दिशा में कार्य करें, तो हिमाचल को नशा मुक्त बनाने का सपना अवश्य साकार हो सकता है।-प्रो. मनोज डोगरा