Edited By ,Updated: 27 May, 2026 04:17 AM

हमारे देश भर में फैले जंगलों, पहाडिय़ों और दूरदराज की बस्तियों में एक शांत लेकिन सफल परिवर्तन चल रहा है। जनजातीय समुदाय लंबे समय से भारत की विकास गाथा के केंद्र में अपने उचित स्थान का इंतजार कर रहे थे। आज वे राष्ट्र की प्रगति के सक्रिय वास्तुकार के...
हमारे देश भर में फैले जंगलों, पहाडिय़ों और दूरदराज की बस्तियों में एक शांत लेकिन सफल परिवर्तन चल रहा है। जनजातीय समुदाय लंबे समय से भारत की विकास गाथा के केंद्र में अपने उचित स्थान का इंतजार कर रहे थे। आज वे राष्ट्र की प्रगति के सक्रिय वास्तुकार के रूप में उभर रहे हैं। जनजातीय गरिमा उत्सव की यही भावना है-विकसित भारत की यात्रा का एक राष्ट्रीय उत्सव, जहां प्रगति भूगोल या परिस्थिति का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का समान अधिकार है।
महत्वाकांक्षा का पैमाना : प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान (पी.एम.-जनमन), धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (डी.ए.जे.जी.यू.ए.), राष्ट्रीय सिकल सैल एनीमिया उन्मूलन मिशन और संबंधित पहलों में 549 जिलों और 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 2,911 ब्लॉकों के 63,000 से अधिक गांवों को शामिल किया गया है, जिससे 5.5 करोड़ से अधिक आदिवासी नागरिक लाभान्वित हुए हैं। विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पी.वी.टी.जी.) पर विशेष ध्यान देने के साथ, इन प्रयासों का उद्देश्य आवास, पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, कनैक्टिविटी और आजीविका जैसी आवश्यक सेवाओं की सम्पूर्ण कवरेज सुनिश्चित करना है। इस तरह के विविध और विस्तृत इलाके में हर परिवार तक पहुंचने के लिए ऐसी प्रणाली की आवश्यकता होती है जो डाटा-संचालित, कनैक्टेड और उत्तरदायी होती है और यही हम तैयार कर रहे हैं।
इस वर्ष जनजातीय गरिमा उत्सव के उद्घाटन का विषय, ‘विकास के एक वाहक के रूप में प्रौद्योगिकी’, इस बात को दर्शाता है कि कैसे डिजिटल सिस्टम, विज्ञान और नवाचार भारत के कुछ दूरस्थ समुदायों तक शासन और अवसर का विस्तार करने में मदद कर रहे हैं। इस दृष्टिकोण के केंद्र में एक सरल सिद्धांत निहित है-जनजातीय भाषाओं, संस्कृतियों, विरासत और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का पर्याप्त सम्मान करते हुए विकास को अंतिम दूरी तक पहुंचना चाहिए।
प्रौद्योगिकी द्वारा जनजातीय गरिमा को बढ़ावा : उद्देश्य के साथ निर्देशित होने पर प्रौद्योगिकी क्या हासिल कर सकती है, इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण बिरसा 101 यानी सिकल सैल रोग के लिए भारत की पहली स्वदेशी सी.आर.आई.एस.पी.आर.-आधारित जीन थैरेपी है। सिकल सैल रोग लंबे समय से जनजातीय आबादी के लिए स्वास्थ्य की एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है और भारत अब समानता और पहुंच में निहित उन्नत विज्ञान के साथ उस चुनौती का जवाब दे रहा है। जनजातीय कार्य मंत्रालय ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सी.एस.आई.आर.), सी.एस.आई.आर.-इंस्टीच्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आई.जी.आई.बी.) और सीरम इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से अनुसंधान, नैदानिक परीक्षण इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का समर्थन करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है।
सांझा लक्ष्य स्पष्ट है : एक किफायती, एकमुश्त उपचारात्मक उपचार विकसित करना, जो जरूरतमंद हर आदिवासी परिवार तक पहुंच सके। बी.आई.आर.एस.ए. 101 केवल चिकित्सा क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि से भी बढ़कर है। यह एक घोषणा है कि भारत का सबसे उन्नत विज्ञान अपने सबसे पात्र समुदायों की सेवा करेगा। ट्रैडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (टी.के.डी.एल.) और आयुर्जेनोमिक्स जैसे प्रयास दर्शाते हैं कि कैसे आधुनिक तकनीक आदिवासी समुदायों द्वारा लंबे समय से संरक्षित समृद्ध औषधीय और पारिस्थितिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण, मान्यीकरण और संरक्षण में मदद कर सकती है।
इंडिया ए.आई. इम्पैक्ट समिट 2026 में, मंत्रालय ने एक सरल लेकिन दृढ़ विश्वास पर आधारित ए.आई.-सक्षम प्लेटफार्मों की शृंखला प्रस्तुत की, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि भाषा एक बाधा नहीं है जिसे दूर किया जाना है, बल्कि एक पहचान है, जिसका उत्सव मनाया जाना चाहिए। आदि वाणी, जनजातीय भाषाओं के लिए ए.आई.-संचालित अनुवादक, टैक्स्ट-टू-टैक्स्ट और टैक्स्ट-टू-स्पीच अनुवाद, ओ.सी.आर. और आदिवासी भाषाओं में सरकारी योजना की जानकारी के वितरण का समर्थन करता है, जिससे नागरिकों को घर पर बोलने वाली भाषा में सार्वजनिक सेवाओं से जुडऩे में सक्षम बनाया जाता है।
आगामी ट्राइबएक्स प्लेटफॉर्म का उद्देश्य जनजातीय कलाओं, भाषाओं, पारंपरिक ज्ञान, संगीत, शिल्प और सांस्कृतिक अनुभवों को बढ़ावा देने के लिए एक डिजिटल ईकोसिस्टम बनाना है। इस प्रयास को पूरा करते हुए, जनजातीय भारत का प्रस्तावित जी.आई. संभावित कला और शिल्प एटलस भौगोलिक संकेत क्षमता के साथ जनजातीय हस्तशिल्प, वन उत्पादों और पारंपरिक कला रूपों का डिजिटल रूप से मानचित्रण करेगा, जिससे ब्रांडिंग, बाजार पहुंच और जनजातीय बौद्धिक विरासत की पहचान को मजबूत करने में मदद मिलेगी। प्रौद्योगिकी जनजातीय समुदायों तक शासन के तरीके को समान रूप से बदल रही है। पी.वी.टी.जी. घरेलू सर्वेक्षणों के लिए पी.एम.-जनमन के तहत सर्वेक्षण सेतु दूरदराज के क्षेत्रों में कल्याण वितरण की तत्क्षण, जियो-टैग निगरानी को सक्षम बनाता है। इसके साथ ही मंत्रालय दावा प्रस्तुतिकरण, जी.आई.एस.-आधारित मानचित्रण, वर्कफ्लो की निगरानी और शिकायत निवारण को सुव्यवस्थित करने के लिए एक ए.आई.-सक्षम वन अधिकार अधिनियम शासन मंच विकसित कर रहा है।
जनजातीय समुदाय-विकसित भारत के वाहक : जब दूरदराज की बस्ती की एक आदिवासी महिला, तकनीक से, भाषा से सशक्त होती है और उसे इस बात का अहसास होता हो कि उसकी बात को राष्ट्र सुन रहा है, ऐसे में वह अपनी शर्तों पर सरकारी सेवाओं से जुड़ती है और पूरी गरिमा के साथ जवाब प्राप्त करती है। जनजातीय समुदाय, अपनी दृढ़ता, अपने पारिस्थितिक ज्ञान, अपनी कलात्मक परंपराओं और इस भूमि में अपनी गहरी जड़ों के साथ, विकसित भारत की दहलीज पर इंतजार नहीं कर रहे, बल्कि वे इसके सबसे शक्तिशाली और प्रेरक वाहकों में शामिल हैं। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी दूरियों को पाटती है, जैसे-जैसे विज्ञान उपचार प्रदान करता है, जैसा कि ए.आई. जंगलों और पहाडि़य़ों की भाषाओं में बोलता है और जैसे-जैसे शासन सबसे दूर के गांव के अंतिम परिवार तक पहुंचता है, हम हर दिन भारत के करीब आते हैं, जो न केवल व्यापकता के रूप में विकसित है, बल्कि अपनी मानवता में परिपूर्ण है। यह वह विकसित भारत है जिसे हम माननीय प्रधानमंत्री के विजन से प्रेरित होकर एक साथ मिलकर निर्मित कर रहे हैं।-रंजना चोपड़ा