वर्षों से चीनी नेतृत्व की भारत के प्रति ‘रणनीति’

Edited By ,Updated: 05 Jul, 2020 04:49 AM

the chinese leadership s strategy for india over the years

यह आलेख 9 मई 2006 को बिजनैस स्टैंडर्ड में प्रकाशित किया गया था। इसमें बताई गई भविष्यवाणियां सत्य साबित हुईं। यह एक काल्पनिक बातचीत पर आधारित है जिसे चीन के मास्टर कूटनीतिकार के साथ की गई थी। बिजनैस स्टैंडर्ड ने इस आलेख ...

यह आलेख 9 मई 2006 को बिजनैस स्टैंडर्ड में प्रकाशित किया गया था। इसमें बताई गई भविष्यवाणियां सत्य साबित हुईं। यह एक काल्पनिक बातचीत पर आधारित है जिसे चीन के मास्टर कूटनीतिकार के साथ की गई थी। बिजनैस स्टैंडर्ड ने इस आलेख को पुन: प्रकाशित किया है। मैंने चीनी मास्टर कूटनीतिक का सबसे पहले धन्यवाद किया जिन्होंने मुझसे बात करने के लिए मेरा आग्रह स्वीकार किया। हालांकि उनका स्वास्थ्य निरंतर गिर रहा है। सबसे पहले मैंने उनसे पूछा कि पिछले 50 वर्षों से भी ज्यादा समय के दौरान भारत के प्रति चीनी नेतृत्व की क्या रणनीति है? इस रणनीति पर आपका क्या मूल्यांकन है? 

तो उन्होंने कहा कि रणनीति अच्छी रही और मेरी इच्छा से ज्यादा इसने कार्य किया। इसके लिए मैं आपके देशवासियों की अनिच्छापूर्वक मदद का धन्यवाद करना चाहता हूं। विशेष तौर पर राजनीतिक/प्रशासनिक नेतृत्व का। जब मैंने उनसे पूछा कि यह रणनीति क्या थी तथा इसने आपको अनिच्छापूर्वक कैसे मदद की, तो मास्टर रणनीतिकार ने कहा कि ठीक है मुझे इसका व्याख्यान करने के लिए थोड़ा  समय चाहिए और इस दौरान मुझे टोका न जाए क्योंकि आप भारतीय किसी को सुनने के दौरान बहुत बुरा व्यवहार करते हैं। आप उसकी बातचीत को बीच में ही उसे सुने बगैर टोक देते हैं। इससे भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। हालांकि मुझे इसके लिए आपको शिकायत नहींकरनी चाहिए। आपकी  भ्रम वाली रणनीति ने हमें पिछले 50 वर्षों के दौरान बहुत ज्यादा फायदा पहुंचाया है। 

1950 के दशक के मध्य की बात करते हैं। ‘हिंदी चीनी भाई-भाई’ के समय में मैंने माओ त्से तुंग तथा झाओको यह परामर्श दिया कि एशिया या फिर पूरे विश्व में भारत चीन के लिए एक बेहद गंभीर संभावित चुनौती है इसलिए हमें भारत को कमजोर करना होगा। मुझे उनका ध्यान आकॢषत करने में थोड़ी मुश्किल हुई। वे दोनों अमरीका की आक्रामक रोकथाम वाली नीति तथा सोवियत यूनियन के साथ पूर्व के टकराव वाली नीति के साथ व्यस्त थे। मगर उन्होंने मेरी बात को सुना और 1950 के अंत में इन बातों को समझा। इस समय के दौरान हमने अपनी रणनीति सामने रखी। 

झाओ ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू से मीठी बातें कीं। हमने सभी मौसमों को झेलने वाली रणनीतिक सड़क को अक्साईचिन के साथ बनाया। अपनी फौजों को तिब्बत में बढ़ाया तथा मैकमोहन लाइन के इ र्द-गिर्द अपनी किलेबंदी को सशक्त किया। आपके पंडित नेहरू एक भद्र पुरुष थे मगर वह ज्यादा नर्म भी थे और लोगों को भांपने में थोड़ा कमजोर थे। आप देखिए कि उन्होंने कृष्णा मैनन पर कितना भरोसा कर लिया। कुछ भी हो पंडित नेहरू माओ तथा झाओ के मुकाबले कुछ नहीं थे। 

पहली बार हमने भारत के साथ युद्ध की योजना नहीं बनाई मगर मैनन की मूर्खतापूर्ण फार्वर्ड पॉलिसी ने हमें 1962 में एक मौका दिया। एक छोटे से सीमा झगड़े के बाद हमने कई चीजों को हासिल किया। हमने एक निर्णायक सैन्य जीत हासिल की तथा भारतीय सेना का मनोबल गिराया। हमने एशिया को ही नहीं पूरे विश्व को दिखा दिया कि एशिया में असली शक्ति किसके हाथ में है। हमने आपकी तीसरी पंचवर्षीय योजना को पटरी से उतार दिया। साथ ही आपके आॢथक विकास की गति को भी धीमा कर दिया। हमने तिब्बत में अपनी घेराबंदी को और मजबूत किया। उत्तर-पूर्व में हमारे विपक्षीय संघर्ष विराम तथा सैन्य वापसी के साथ हमने वैश्विक मामलों में अपनी परिपक्वता का श्रेष्ठ उदाहरण दिया। 

1950 के अंत से लेकर हमने पाकिस्तान में आर्थिक तथा सैन्य सहायता के बीज बोए। इससे भारत पर निरंतर उसकी पश्चिमी सीमाओं पर दबाव बढ़ता गया। हमारा लक्ष्य भारत को गिराना था और उसे पाकिस्तान के साथ उलझाए रखना था। यह बेहद प्रभावी रणनीति रही। हमने सफलतापूर्वक अमरीकियों विशेषकर निक्सन तथा किसिंगर को सहयोजित किया। मगर उसके बाद पाकिस्तान के याहिया खान तथा भुट्टो ने एक बहुत बड़ी भूल कर दी और आपकी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक सुनहरा अवसर दिया जिन्होंने पाकिस्तान के टुकड़े कर बंगलादेश के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। इंदिरा एक बेहद सशक्त महिला थीं। उन्हें दुर्लभ रणनीति तथा कूटनीतिक समझ थी। मैं आपको बताता हूं कि आपकी कैबिनेट में केवल इंदिरा ही एक ‘पुरुष’ जैसी थीं। मगर उन्होंने भी एक बहुत बड़ी भूल कर दी। क्योंकि इंदिरा ने  बदले में अंतर्राष्ट्रीय सीमा के तौर पर कश्मीर युद्धबंदी पर अंतिम समझौते के बिना 90,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा कर दिया। 

इससे हमें भारत पर अंकुश लगाने के मामले में ‘पाकिस्तानी कार्ड’ खेलने में मदद मिली जिसमें परमाणु तथा मिसाइल तकनीक का समांतर भी शामिल था।हमारी उम्मीदों के विपरीत  पोखरण-1 के साथबड़ी ताकत तथा प्रयास दिखाने के बाद हथियारीकरण के मामले में वह असफल हो गई। हमारे लिए यह खुशकिस्मती तथा आपके लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि न तो कश्मीरी पंडितों और न ही इंदिरा गांधी ने लोकप्रिय नारों को समझा। न ही उन्होंने भारतीय उद्योग, व्यापार तथा निवेश को समझा। जिसने कि आपके देश को कमजोर कर दिया और 15 वर्षों तक आपको कमजोर बनाएरखा।

इंदिरा की नीतियों ने आपके कपड़ा उद्योग तथा श्रमिकों का इस्तेमाल करने वाले उद्योगों की कमर तोड़ दी। इसने बड़े स्तर पर शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं को उपलब्ध नहीं करवाया। इन विषयों पर माओ ने चीन में बहुत बड़ी सफलता हासिल की। 1970 तक हमारे नेता उद्यम तथा बाजार की शक्तियों को पहचान पाए और आपके नेता इतने दर्जनों भर वर्षों के बाद भी कुछ न समझे। 

हमने आपको बहुत पीछे छोड़ दिया। यहां तक कि 1990 के दशक में विश्व व्यापार तथा निवेश के मामले में आपकी सोच बेहद संकीर्ण थी।  सच्चाई यह है कि पिछले 15 वर्षों के दौरान हमारी प्रति व्यक्ति विकास दर आपसे करीब दोगुनी हो गई। हमारा निर्यात भी आपसे ज्यादा बढ़ गया। भारत के करीब आधे बच्चे कुपोषण का शिकार हैं जोकि चीन में मात्र 10 है। ऐसी बातों को देखते हुए भारत चीन को टक्कर कैसे दे सकता है। इन सब बातों को सुनने के बाद मैंने चीनी मास्टर रणनीतिकार से पूछा कि आप इन असमानताओं को ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर क्यों कह रहे हैं? पिछले 3 वर्षों के दौरान हमारी 8 प्रतिशत वृद्धि दर के बारे में आपका क्या कहना है? सूचना प्रौद्योगिकी तथा फार्मा में हमारी तरक्की के बारे में आपका क्या विचार है? तेजी से बढ़ते हुए हमारे श्रमिक बल के बारे में आपका क्या विचार है? विश्व में सभी लोग भारत की उत्कृष्ट जनसांख्यिकी के बारे में बातें करते हैं। इन बातों को सुनकर उन्होंने सोच-समझने के बाद मुझसे कहा कि यह सब दिलचस्प है। 

मेरे पोलित ब्यूरो पिछले कई वर्षों के दौरान ऐसे ही सवालों को मुझसे पूछते हैं। मगर मैंने उनको कहा कि चिंता करने की कोई बात नहीं। मैंने उनको चार कारण बताए कि भारत चीन से प्रतिस्पद्र्धा क्यों नहीं रख सकता? पहला यह कि सूचना प्रौद्योगिकी केवल तमाशा है। इसके चीन में बहुत बड़े अवसर हैं। इस क्षेत्र में भारत की अगुवाई अस्थायी है। आप चाहो तो पिछले 5 वर्षों की चीन से तुलना कर लो। दूसरा यह कि उत्कृष्ट जनसांख्यिकी का तर्क देना बेवकूफी है। इससे भारत में नौकरियां उत्पन्न करने में असफलता देखी गई है। सभी लाखों नए कर्मचारी वास्तविक नौकरियां नहीं हासिल कर पा रहे।  भारत आॢथक मामलों में अशिक्षित है। अगले कई वर्षों तक वामदल श्रमिक सुधारों को नहीं होने देंगे। 

तीसरा यह भारत संसाधन नहीं खोज सकता और न ही यह बड़े स्तर पर अच्छी गुणवत्ता वाले मूलभूत ढांचों का निर्माण कर सकता है। आपके राजनेता, बाबूू तथा वेतन आयोग हमेशा ही लोगों के पैसों का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने लोगों के वेतन वृद्धि पर खर्च करते रहेंगे। अंतिम बात यह है कि कोटा-आरक्षण बहस तथा नीतियां उजागर होंगी। भारत में पिछड़ेपन तथा असमानता की परेशानियां फैली रहेंगी। शायद यह प्राइवेट सैक्टर में भी कायम रहेंगी। 8 प्रतिशत वृद्धि दर मात्र अस्थायी उछाल है। चीन को पुनरुत्थानशील भारत के प्रति चिंता करने की जरूरत नहीं। (लेखक आई.सी.आर.आई.ई.आर. में मानद प्रोफैसर हैं तथा भारत सरकार के पूर्व प्रमुख आर्थिक  सलाहकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।) साभार बिजनैस स्टैंडड-शंकर आचार्य

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