पाकिस्तान की निरंतर शत्रुता के पीछे का ‘अर्थशास्त्र’

Edited By Updated: 19 Mar, 2026 05:41 AM

the economics behind pakistan s persistent hostility

सोमवार को काबुल में एक पुनर्वास केंद्र पर हुई बमबारी में 400 से अधिक लोग मारे गए। यह घटना इस तथ्य की नवीनतम पुष्टि है कि पाकिस्तानी सेना का मूल उद्देश्य अपनी सीमाओं के पार और भीतर युद्ध करना है। एक वर्ष के भीतर ही इसने पश्चिम में अफगानों, भीतर बलूच...

सोमवार को काबुल में एक पुनर्वास केंद्र पर हुई बमबारी में 400 से अधिक लोग मारे गए। यह घटना इस तथ्य की नवीनतम पुष्टि है कि पाकिस्तानी सेना का मूल उद्देश्य अपनी सीमाओं के पार और भीतर युद्ध करना है। एक वर्ष के भीतर ही इसने पश्चिम में अफगानों, भीतर बलूच लोगों और पूर्व में भारतीयों से युद्ध किया है। लेकिन भारत के साथ इसके टकराव का इतिहास इस बात को सबसे स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह दोनों ही भारत-पाकिस्तान संबंधों में व्याप्त शत्रुता और हिंसा के चक्र को तोडऩा चाहते थे। 1999 में लाहौर की बस यात्रा, जब प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अपने समकक्ष नवाज शरीफ से मिलने के लिए दिल्ली-लाहौर की पहली बस सेवा से यात्रा की, तो यह स्पष्ट रूप से पुराने मतभेदों को भुलाने का एक प्रयास था। 2001 का आगरा शिखर सम्मेलन और 2003 का ‘श्रीनगर समझौता’, जिसके दौरान उन्होंने 1999 के कारगिल आक्रमण और 2001 में भारतीय संसद पर हमले के बावजूद एक बार फिर पाकिस्तान की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया, नए सिरे से संबंध स्थापित करने के उदार प्रयास थे। मनमोहन सिंह ने 2006 में अमृतसर में बोलते हुए कहा, ‘‘सीमाओं को फिर से नहीं खींचा जा सकता लेकिन हम उन्हें महत्वहीन बनाने की दिशा में काम कर सकते हैं, नियंत्रण रेखा के दोनों ओर के लोगों को अधिक स्वतंत्रता से आवागमन करने और एक-दूसरे के साथ व्यापार करने में सक्षम होना चाहिए।’’ दोनों पक्षों के बीच बेहतर आपसी समझ की रूपरेखा आकार ले रही थी, जिसमें मुक्त व्यापार के लिए अधिक खुली सीमा, एक संयुक्त परामर्श तंत्र, चरणबद्ध विसैन्यीकरण और सीमा के दोनों ओर कश्मीर में अधिक स्वशासन शामिल था। विश्वास कायम करना ही मुख्य लक्ष्य था। 

फिर, विनाशकारी प्रभाव के साथ, 26/11 की घटना घटी। जिस प्रकार कारगिल संघर्ष लाहौर बस कूटनीति के बाद हुआ था, उसी प्रकार भारतीय संसद पर हमला आगरा शिखर सम्मेलन के बाद हुआ था। जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने भी पाकिस्तान के साथ शांति का एक नया ढांचा बनाने का प्रयास किया। उन्होंने नवाज शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया। उन्होंने 2 अंतर्राष्ट्रीय बैठकों के दौरान शरीफ से मुलाकात की और सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि उन्होंने राजनयिक प्रोटोकॉल तोड़ते हुए 2015 के क्रिसमस के दिन नवाज शरीफ के 66वें जन्मदिन और रायविंड में उनकी पोती की शादी के समारोह में भाग लेने के लिए पाकिस्तान की यात्रा की। कुछ ही हफ्तों में, इसका जवाब आया-पठानकोट स्थित हमारे वायुसेना अड्डे पर हमला और उरी स्थित हमारे सैन्य अड्डे पर भी। यह पैटर्न स्पष्ट है, यहां तक कि पूर्वानुमानित भी है-शांति स्थापित करने के प्रयास, जिसके तुरंत बाद पाकिस्तान की ओर से ङ्क्षहसा भड़क उठती है। आयशा सिद्दीका की 2007 में प्रकाशित पुस्तक ‘मिलिट्री इंक : इनसाइड पाकिस्तान्स मिलिट्री इकोनॉमी’ इस बात को बाखूबी समझाती है। वह बताती हैं कि पाकिस्तानी सेना को राज्य से कोई वित्तीय सहायता नहीं मिलती और वह संसद के प्रति जवाबदेह नहीं है। इसकी बजाय, यह एक आत्मनिर्भर आर्थिक संस्था है, जो सामान्य वित्तीय नियंत्रणों से परे काम करती है। फौजी, शाहीन, बहरिया और आर्मी जैसे सैन्य कल्याणकारी संस्थानों के माध्यम से यह संस्था अपना काम करती है।

सेना की विभिन्न शाखाएं उच्च शिक्षा संस्थान संचालित करती हैं, फौजी सीरियल्स और फौजी फूड्स खाद्य व्यवसाय में हैं और कैंटीन स्टोर्स विभाग देश भर में एक बड़ी खुदरा शृंखला चलाता है। इसके अलावा फौजी सीमैंट कंपनी और अस्कारी गाडर््स और फौजी सिक्योरिटी सॢवसेज जैसी सुरक्षा कंपनियां भी हैं। ये व्यवसाय भारी मुनाफा कमाते हैं, जिसे रीयल एस्टेट में लगाया जाता है, जिसका नेतृत्व रक्षा आवास प्राधिकरण करता है, जो सेवानिवृत्त सैन्य कर्मियों को शहरी और कृषि भूमि के बड़े-बड़े हिस्से आबंटित करता है।  सैन्य व्यापार या जैसा कि सिद्दीका इसे ‘मिलबस’ कहती हैं, के उदय ने लश्कर-ए-तोयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी समूहों को जन्म दिया, जिनका मुख्य उद्देश्य भारत पर ‘हजारों घाव’ दागना था, हालांकि अब पाकिस्तान को परेशान करने के लिए तहरीक-ए-तालिबान उभर कर सामने आई है।
अंतत:, भारत पाकिस्तान के साथ ऐसे व्यवहार में नहीं आ सकता जो सेना द्वारा शासित है, भले ही वहां चुनी हुई सरकार होने का दिखावा हो। निरंतर शत्रुता के बिना पाकिस्तानी सेना अपनी सुख-सुविधाओं को बरकरार नहीं रख सकती। न ही वह सच्चे लोकतंत्र को विकसित होने दे सकती है। इसलिए, इस क्षेत्र में शांति एक दूर का सपना है।-के.एम. चंद्रशेखर

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