चुनाव आयोग के खोखले दावे और एस.आई.आर. प्रक्रिया की गलतियां

Edited By Updated: 07 Jun, 2026 04:17 AM

the election commission s hollow claims and flaws in the sir process

एक वकील के तौर पर, मैं समझता हूं कि अगर 2 सम्मानित जज कोर्ट की तरफ से बोलते हैं, तो असल में भारत का सुप्रीम कोर्ट बोल रहा होता है।

एक वकील के तौर पर, मैं समझता हूं कि अगर 2 सम्मानित जज कोर्ट की तरफ से बोलते हैं, तो असल में भारत का सुप्रीम कोर्ट बोल रहा होता है। सुप्रीम कोर्ट एक संवैधानिक अदालत है, यह अपील सुनने वाली आखिरी अदालत भी है, कुछ मामलों में इसके पास सीधे सुनवाई का अधिकार है, सभी अदालतों पर इसकी निगरानी है, यह अपने ही फैसलों की समीक्षा कर सकती है और उन्हें बदल सकती है, यह खुद से किसी मामले पर संज्ञान ले सकती है, इसके पास स्पैशल इन्वैस्टिगेशन टीम (एस.आई.टी.) या कमीशन बनाने की ताकत है, यह किसी मामले की जांच के लिए पुलिस एजैंसी को निर्देश दे सकती है, यह सिविल या कमॢशयल विवाद को मध्यस्थता या आॢबट्रेशन के लिए भेज सकती है, यह किसी मामले को एक हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से दूसरे हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर सकती है, यह किसी पुरुष और महिला को तलाकशुदा घोषित कर सकती है, इसके पास कोर्ट की अवमानना के लिए किसी व्यक्ति को सजा देने की ताकत है, भारत के संविधान की इसकी व्याख्या ही आखिरी बात मानी जाती है और इसके पास ‘पूरा न्याय’ करने के लिए कोई भी आदेश पारित करने की ताकत है। कहा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट दुनिया की सबसे ताकतवर अदालत है।

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार : इसकी बहुत सारी ताकतों में से एक खास ताकत है। ‘स्टेट ऑफ मद्रास बनाम वी.जी. रो’ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने खुद को ‘सेंटिनल क्वि वाइव’ यानी संविधान का सतर्क प्रहरी बताया। संविधान चुनावों के बारे में क्या कहता है?
-अनुच्छेद 324 भारत के चुनाव आयोग (ई.सी.आई.) को संसद और हर राज्य की विधानसभा के लिए वोटर लिस्ट तैयार करने और सभी चुनाव कराने की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी देता है।
-अनुच्छेद 326 कहता है कि लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे। (वोट देने का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है-सुप्रीम कोर्ट)
इन दोनों अनुच्छेदों के बीच कोई टकराव नहीं है। ई.सी.आई. संवैधानिक रूप से भारत के हर वयस्क को शामिल करते हुए वोटर लिस्ट तैयार करने के लिए बाध्य है। जाहिर है, संविधान, नागरिकता अधिनियम, 1955 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत नागरिकता और निवास जैसी अन्य योग्यताएं भी तय की गई हैं। हर कानून एक अथॉरिटी और एक प्रक्रिया तय करता है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कोई व्यक्ति कानून के तहत योग्यताओं को पूरा करता है या नहीं।
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का मूल आधार सबको शामिल करना है। वोटर लिस्ट से नाम हटाना एक अपवाद है और इसके लिए तय प्रक्रिया का पालन करना और लिखित में फैसला लेना जरूरी है, जिसकी न्यायिक समीक्षा हो सकती है।

दिलचस्प बातें : ‘एसोसिएशन फॉर डैमोक्रेटिक रिफॉम्र्स बनाम चुनाव आयोग’ मामले में 27 मई, 2026 के फैसले के दौरान (बिहार में एस.आई.आर. प्रक्रिया के संदर्भ में), सुप्रीम कोर्ट ने ये बातें कहीं :
-आयोग ने तय किया कि 2003 की वोटर लिस्ट (जिसमें 01.01.2003 को पात्रता की तारीख माना गया था) को पात्रता का सबूत माना जाएगा, जब तक कि इसे गलत साबित न किया जाए। जिस व्यक्ति का नाम 2003 की लिस्ट में नहीं है, उसे वोटर के तौर पर अपनी पात्रता साबित करने के लिए एक या ज्यादा तय दस्तावेज दिखाने होंगे। [इंदरजीत बरुआ (1985) और लाल बाबू हुसैन (1995) के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि वोटर लिस्ट में शामिल नामों को नागरिकता का प्रमाण माना जा सकता है।]
-जांच के दौरान, अगर किसी व्यक्ति की पात्रता पर शक होता है, तो ERO/AERO के लिए जरूरी था कि वह नाम हटाने के प्रस्तावित आधार बताते हुए ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी करे... और तर्कपूर्ण आदेश दे। श्वक्रह्र के फैसले से असंतुष्ट कोई भी व्यक्ति आर.पी. एक्ट, 1969 की धारा 24(ए) के तहत जिला मैजिस्ट्रेट के पास अपील कर सकता है। दूसरी अपील धारा 24(बी) के तहत राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (सी.ई.ओ.) के पास की जा सकती है।
-वोटर लिस्ट तैयार करने या उसमें सुधार करने के दौरान, आयोग के पास निश्चित रूप से नागरिकता से जुड़े सवालों की जांच करने का अधिकार है (‘एक सीमित जांच’ -सुप्रीम कोर्ट) अहम बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
फैसले में बताया गया कि बिहार में एस.आई.आर. प्रक्रिया का नतीजा यह हुआ कि 2003 की वोटर लिस्ट से लगभग 47,00,000 नाम हटा दिए गए। बिहार में हर 100 वयस्कों में से 6 लोगों के नाम अंतिम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए।

असल नतीजा : बिहार एस.आई.आर. मामले में फैसला आने से पहले ही, पश्चिम बंगाल में एस.आई.आर. प्रक्रिया शुरू और पूरी हो चुकी थी। कई लाख नाम हटा दिए गए थे। तदर्थ न्यायिक अधिकारियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर न्यायिक समीक्षा की गई थी। ई.सी.आई. के जारी किए गए डाटा और प. बंगाल एस.आई.आर. एक्सरसाइज के सरकारी आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार :

पहला चरण : मौत, डुप्लीकेट एंट्री, जगह बदलने, अनुपस्थित रहने आदि के कारण हटाए गए-63.66 लाख
मुख्य रूप से ‘ताॢकक विसंगतियों’ के कारण समरी रिव्यू के बाद हटाए गए-27.16 लाख
कुल हटाए गए नाम-90.83 लाख
तदर्थ न्यायिक अधिकारियों के पास दायर अपीलें-25 लाख (लगभग)
सुनी और निपटाई गईं अपीलें (14 मई, 2026 तक)-6,581
स्वीकार की गईं अपीलें और वोटर लिस्ट में फिर से जोड़े गए नाम-4,043
सफलता का प्रतिशत-61.43
पश्चिम बंगाल ही एकमात्र ऐसा राज्य था, जहां हटाए गए नामों की न्यायिक समीक्षा की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर की गई थी। बिहार में ऐसा नहीं हुआ। फैसले और न्यायिक समीक्षा के नतीजों की तुलना करें। अगर हम प. बंगाल के सैंपल की सफलता दर (61.43 प्रतिशत) को बिहार में हटाए गए नामों (47,00,000) पर लागू करें, तो यह निष्कर्ष निकालना सही होगा कि लगभग 28,87,210 लोग, जिन्होंने वोट नहीं दिया था, बिहार की वोटर लिस्ट में फिर से शामिल किए जाने के हकदार होते।
यह निष्कर्ष ई.सी.आई. के दावों की खोखलापन और एस.आई.आर. प्रक्रिया की गलतियों, अविश्वसनीयता और भरोसे की कमी को उजागर करता है। ई.सी.आई. की मंजूरी के बाद, क्या लोकतंत्र बचेगा?-पी. चिदम्बरम

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