Edited By ,Updated: 27 Mar, 2026 04:19 AM

‘वैस्टर्न रीजन बिशप्स काऊंसिल’ से संबद्ध महाराष्ट्र के कैथोलिक बिशपों ने हाल ही में महाराष्ट्र राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों द्वारा पारित ‘फ्रीडम ऑफ रिलीजन’ विधेयक के खिलाफ आधिकारिक रूप से विरोध दर्ज कराया है। मुझे खुशी है कि उन्होंने ऐसा किया। एक...
‘वैस्टर्न रीजन बिशप्स काऊंसिल’ से संबद्ध महाराष्ट्र के कैथोलिक बिशपों ने हाल ही में महाराष्ट्र राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों द्वारा पारित ‘फ्रीडम ऑफ रिलीजन’ विधेयक के खिलाफ आधिकारिक रूप से विरोध दर्ज कराया है। मुझे खुशी है कि उन्होंने ऐसा किया। एक कैथोलिक के रूप में, मुझे बहुत निराशा होती यदि बिशप संविधान के उस अपमान को चुपचाप स्वीकार कर लेते, जो यह ‘स्वतंत्रता’ अपने साथ लाती है।
संविधान के इस ‘अपमान’ पर विस्तार से चर्चा करने से पहले, मैं वर्तमान भाजपा सरकार के पक्ष में एक बात कहना चाहता हूं। उनके पास हास्य की अच्छी समझ है! एक नागरिक को अपनी पसंद के धर्म को चुनने या उसका पालन करने की स्वतंत्रता से वंचित करना और फिर उस प्रतिबंध को ‘स्वतंत्रता’ का नाम देना वाकई किसी जादूगर की हाथ की सफाई जैसा है। हमारे प्रधानमंत्री ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात करते हैं, लेकिन उनके अनुयायी मुसलमानों को (जो उनकी नफरत का मुख्य लक्ष्य हैं) ङ्क्षहदू इलाकों में अपना सामान बेचने की अनुमति नहीं देते, जबकि वे अनंत काल से ऐसा करते आ रहे हैं। व्यक्तिगत रूप से, मैं धर्म परिवर्तन के पक्ष में नहीं हूं।
मेरा कहने का मतलब यह है कि हमारे पादरियों और ननों को अन्य धर्मों के अनुयायियों को ईसाई धर्म की ओर आकर्षित करने के उद्देश्य से जानबूझकर ‘सुसमाचार’ का प्रचार नहीं करना चाहिए। लेकिन अगर सत्य, न्याय, दया और करुणा के उनके ईसाई जीवन से प्रभावित होकर कुछ गैर-ईसाई, ईसाई धर्म की ओर आकर्षित होते हैं, तो क्या हमारे पादरी और नन इन संभावित ‘धर्म परिवर्तन करने वालों’ को भगा सकते हैं? वे ऐसा नहीं कर सकते और उन्हें ऐसा करना भी नहीं चाहिए। भारतीय संविधान इस मुद्दे पर बहुत स्पष्ट है। ईसाई और इस्लाम दोनों के विवाह नियमों में यह आवश्यक था कि चर्च या मस्जिद में विवाह करने वाले दोनों पक्ष एक ही धर्म के हों। यदि वे नहीं थे, तो गैर-ईसाई को ईसाई धर्म में और गैर-मुस्लिम को इस्लाम में परिवर्तित होना पड़ता था, यदि विवाह उनके संबंधित कानूनों और रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न करना हो।
कैथोलिक चर्च ने दशकों पहले इस मजबूरी को त्याग दिया है। जब गैर-कैथोलिक पक्ष द्वारा धर्म परिवर्तन के लिए अनुरोध किया जाता है, तो पादरी उन्हें सूचित करते हैं कि धर्म परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। वे यह भी जोड़ते हैं कि पक्षकार इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए 5 या उससे अधिक वर्षों तक प्रतीक्षा कर सकते हैं। मैं यहां नौसेना के 2 डॉक्टरों का मामला बताता हूं, जो पुणे के ए.एफ.एम.सी. (आम्र्ड फोर्सेज मैडिकल कॉलेज) के छात्र थे और अलग-अलग धर्मों के थे। पढ़ाई के दौरान उन्हें प्यार हो गया। दूल्हा पुणे नगर पालिका के मुख्य चिकित्सा अधिकारी का बेटा था। उसकी मां और मेरी मां बारदेज तालुका के छोटे से गोअन गांव बादेम में पड़ोसी और सहपाठी थीं। दुल्हन भारतीय सेना के एक सेवारत या सेवानिवृत्त मेजर जनरल की बेटी थी और पुणे के एक प्रसिद्ध चितपावन ब्राह्मण परिवार से थी। जब जोड़ा शादी के बंधन में बंधने के अपने इरादे की घोषणा करने के लिए एक जेसुइट पादरी (जो एक जर्मन थे) के पास गया, तो लड़की ने कहा कि वह कैथोलिक धर्म अपनाने को तैयार है। तुरंत जवाब आया, ‘ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है। वास्तव में, मैं आपको सलाह देता हूं कि ऐसा कोई भी निर्णय लेने से पहले कम से कम पांच साल प्रतीक्षा करें।’ और यह अच्छा ही रहा। क्योंकि उनका बेटा पैदा होने के तुरंत बाद, अधिकारी ने नौसेना की विमानन शाखा के सहयोगियों के साथ हैलीकॉप्टर में एक सवारी की और कभी वापस नहीं आए। हैलीकॉप्टर समुद्र में गायब हो गया और उसमें सवार सभी लोग मारे गए।
मेरी मां की सहपाठी ने मेरी मां को बताया कि उन्होंने और उनके पति ने युवा विधवा को दोबारा शादी करने के लिए राजी किया, जो उसने कर ली। पूर्व बहू और उसके पहले पति के परिवार के बीच संबंध अब भी घनिष्ठ और आत्मीय बने हुए हैं। मैं इस मामले का विस्तार से उल्लेख यह साबित करने के लिए कर रहा हूं कि कैथोलिक चर्च पिछले कुछ वर्षों में नाटकीय रूप से बदला है और उसने चर्च की शिक्षाओं को आधुनिक विचारों के साथ समायोजित किया है।
वर्तमान में, ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ के आरोप से बचने का एकमात्र समाधान ‘मैरिज रजिस्ट्रार’ के कार्यालय में शादी करना है, जैसा कि मेरी बेटी ने किया था। हाल ही में, गुजरात उच्च न्यायालय ने एक मुस्लिम पुरुष साथी को रजिस्ट्रार कार्यालय में शादी करने और अपनी हिंदू महिला साथी के खाते में 3 लाख रुपए जमा करने का आदेश दिया, ताकि उसके माता-पिता की इस मांग को खारिज किया जा सके कि उसे उसके मायके वापस भेज दिया जाए। लड़के ने तुरंत इसका पालन किया, जिससे साबित हुआ कि उसका प्यार सच्चा था और किसी ‘जिहाद’ से प्रेरित नहीं था।
कुछ राज्यों में सत्ता में बैठी भाजपा सरकारों को अपने उस मुख्य वोट बैंक को खुश करना पड़ता है, जिसे यह झूठ परोसा गया है कि हर मुस्लिम पुरुष की 4 पत्नियां और एक दर्जन बच्चे होते हैं। उनसे कहा जाता है कि एक समय आएगा जब मुसलमानों की संख्या हिंदुओं से अधिक हो जाएगी और वे शरीयत के कानून लागू कर देंगे। इस वर्ग के जागरूक लोग जानते हैं कि ये आंकड़े गलत हैं लेकिन वे हिंदू गौरव को बनाए रखने के लिए इस रास्ते पर चलते दिख रहे हैं। धर्म की ‘स्वतंत्रता’ की रक्षा के लिए बनाया गया यह कानून छोटे से ईसाई समुदाय को भी प्रभावित करेगा। शादी के बाद होने वाले कुछ धर्म परिवर्तन जरूर होते हैं लेकिन हमारे पादरियों को स्वयं यह निर्देश दिया गया है कि वे शादी संपन्न होने से पहले गैर-कैथोलिक साथी को सलाह दें कि धर्म परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं है, जैसा कि पांच दशक या उससे पहले हुआ करता था।-जूलियो रिबैरो(पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी)