Edited By ,Updated: 24 Jun, 2026 07:05 AM

पंजाब सदियों से अपनी जीवंत संस्कृति, समृद्ध परम्पराओं और अदम्य जज्बे के लिए जाना जाता रहा है। पंजाब की आत्मा बहादुरी, करुणा, मेहनत, अतिथि-सत्कार, त्याग और आध्यात्मिकता जैसे मूल्यों में बसती है। यह बाबा फरीद और बुल्ले शाह जैसे संतों, शिव कुमार बटालवी...
पंजाब सदियों से अपनी जीवंत संस्कृति, समृद्ध परम्पराओं और अदम्य जज्बे के लिए जाना जाता रहा है। पंजाब की आत्मा बहादुरी, करुणा, मेहनत, अतिथि-सत्कार, त्याग और आध्यात्मिकता जैसे मूल्यों में बसती है। यह बाबा फरीद और बुल्ले शाह जैसे संतों, शिव कुमार बटालवी जैसे कवियों और हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल तथा मिर्जा-साहिबां जैसी अमर प्रेम कहानियों की धरती है। पंजाबी संस्कृति हमेशा से जीवन, भावनाओं, संगीत और मानवीय मूल्यों का उत्सव रही है।
कई दशकों तक पंजाबी संगीत ने इन आदर्शों को जीवित रखा। गुरदास मान, हंस राज हंस, सुरिंदर कौर, सुरिंदर छिंदा और अनेक कलाकारों ने अपने गीतों के माध्यम से पंजाब की लोक परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को आगे बढ़ाया। उनके गीत किसानों, माताओं, प्रेम, साहस, अध्यात्म और ग्रामीण जीवन की सुंदरता का चित्रण करते थे।लेकिन पिछले 2 दशकों में पंजाबी पॉप संगीत का एक हिस्सा ङ्क्षचताजनक दिशा में बढ़ गया है। पश्चिमी संगीत और पंजाबी लोक संगीत के मेल से शुरू हुई यह धारा धीरे-धीरे भौतिकवाद, ङ्क्षहसा और अपराध को बढ़ावा देने का माध्यम बनती जा रही है। यह कहना गलत होगा कि पूरा पंजाबी संगीत ऐसा है लेकिन एक प्रभावशाली वर्ग पंजाब की छवि को विकृत और युवाओं की सोच को प्रभावित कर रहा है। सबसे चिंताजनक प्रवृत्ति गैंगस्टर संस्कृति का महिमामंडन है। कई गीत अपराधियों को नायक के रूप में प्रस्तुत करते हैं और ङ्क्षहसा, धमकी तथा कानून तोडऩे वाले जीवन को आकर्षक बनाकर दिखाते हैं। गीतों में गैंग, बदला, एफ.आई.आर., पुलिस मुठभेड़, जेल और राजनीतिक प्रभाव जैसी चीजों को शक्ति और प्रतिष्ठा का प्रतीक बताया जाता है। इससे युवाओं में यह गलत संदेश जाता है कि सम्मान और पहचान मेहनत और शिक्षा से नहीं, बल्कि डर और दबदबे से मिलती है।
इसी प्रकार हथियारों और हिंसा को भी सामान्य और आकर्षक बनाया जा रहा है। पिस्तौल, राइफल, ए.के.-47, ग्लॉक और अन्य हथियार अब गीतों और संगीत वीडियो का नियमित हिस्सा बन चुके हैं। जो बातें पहले समाज में अस्वीकार्य मानी जाती थीं, उन्हें अब फैशन और स्टाइल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। बार-बार हथियारों का प्रदर्शन और आक्रामक व्यवहार युवाओं के मन में हिंसा को स्वीकार्य बना देता है। पंजाब वीरों की धरती अवश्य है लेकिन वीरता और ङ्क्षहसा में बहुत बड़ा अंतर है। पंजाब की वास्तविक बहादुरी कमजोरों की रक्षा करने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने में रही है, न कि हथियारों के दम पर लोगों को डराने में। पंजाबी पॉप संगीत ने उपभोक्तावाद और दिखावे की संस्कृति को भी बढ़ावा दिया है। अनेक गीतों में महंगे विदेशी ब्रांड, लग्जरी कारें, डिजाइनर कपड़े और आलीशान जीवनशैली को सफलता का पर्याय बना दिया गया है। आज सफलता को मेहनत, चरित्र और उपलब्धियों से नहीं, बल्कि महंगी वस्तुओं के प्रदर्शन से जोड़ा जा रहा है। इसका असर यह हुआ है कि अनेक युवा अपनी पहचान और आत्मसम्मान को भौतिक वस्तुओं से जोडऩे लगे हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ा दिया है। पंजाब की पारंपरिक सादगी, मेहनत और सामुदायिक भावना की जगह अब दिखावे और प्रतिस्पर्धा की संस्कृति लेती जा रही है।
इस संगीत ने पुरुषत्व की परिभाषा को भी बदल दिया है। एक आदर्श पंजाबी युवक को अब जिम्मेदार बेटा, ईमानदार नागरिक या संवेदनशील इंसान के रूप में नहीं, बल्कि आक्रामक, अमीर और हथियार रखने वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह संदेश दिया जा रहा है कि सच्चा पुरुष वही है जो दूसरों पर अपना दबदबा बनाए रखे। इससे युवाओं के सामने सकारात्मक आदर्शों का अभाव पैदा हो रहा है। महिलाओं का वस्तुकरण भी एक गंभीर समस्या बन चुका है। अनेक गीतों में महिलाओं को सम्मानजनक व्यक्तित्व की बजाय केवल आकर्षण और प्रदर्शन की वस्तु के रूप में दिखाया जाता है। इससे समाज में महिलाओं के प्रति गलत धारणाएं मजबूत होती हैं, जबकि पंजाब का इतिहास साहसी और सशक्त महिलाओं से भरा पड़ा है। लोकप्रिय संस्कृति को उनकी गरिमा और योगदान का सम्मान करना चाहिए।
इन प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम अब समाज में दिखाई देने लगे हैं। नशाखोरी, गैंगस्टर नैटवर्क, हथियारों के प्रति आकर्षण और सोशल मीडिया पर दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह कहना उचित नहीं होगा कि इन समस्याओं का कारण केवल संगीत है लेकिन यह निश्चित रूप से इन प्रवृत्तियों को बढ़ाने वाला एक शक्तिशाली माध्यम बन गया है। बार-बार ऐसे गीत सुनने से असामान्य व्यवहार भी सामान्य लगने लगता है। जब करोड़ों युवा प्रतिदिन ऐसे गीत सुनते हैं, जो अपराध, ङ्क्षहसा और नशे का महिमामंडन करते हैं, तो उसका प्रभाव समाज पर अवश्य पड़ता है।
समाधान पूरे पंजाबी पॉप संगीत को प्रतिबंधित करना नहीं है। पंजाबी संगीत में अपार रचनात्मक क्षमता है और उसने पंजाबी भाषा और संस्कृति को पूरी दुनिया तक पहुंचाया है। आवश्यकता जिम्मेदार रचनात्मकता की है। कलाकारों, संगीत निर्माताओं और श्रोताओं को मिलकर ऐसे संगीत को बढ़ावा देना होगा जो पंजाब की वास्तविक पहचान को सामने लाए। किसानों, उद्यमियों, सैनिकों, खिलाडिय़ों, कवियों, संतों और मेहनतकश आम लोगों की कहानियां ही पंजाब की सच्ची ताकत हैं। साथ ही, स्कूलों, अभिभावकों और नागरिक समाज को भी बच्चों को यह सिखाना होगा कि मनोरंजन और वास्तविक जीवन में अंतर होता है। पंजाब का भविष्य बंदूकों, गैंगस्टरों और दिखावे के आधार पर नहीं बनाया जा सकता। उसकी असली शक्ति उसके सदियों पुराने मूल्यों-साहस, करुणा, आध्यात्मिकता और संघर्षशीलता में निहित है। दुनिया पंजाब को उसकी उदारता, ऊर्जा और जीवटता के लिए जानती है, न कि हिंसा के महिमामंडन के लिए। आज की लड़ाई केवल संगीत की नहीं, बल्कि पंजाब की आत्मा को बचाने की लड़ाई है। यदि समय रहते समाज ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो पंजाब की विकृत छवि ही आने वाली पीढिय़ों के लिए वास्तविकता बन जाएगी। लेकिन यदि समाज जागरूक हुआ, तो पंजाबी संगीत फिर से प्रेरणा, मूल्यों और संस्कृति का वाहक बन सकता है, न कि उनकी विकृति का माध्यम।-गीतांजलि मेहरा