भारत-अमरीका डील से किसानी का संकट और गहरा हो जाएगा

Edited By Updated: 04 Feb, 2026 05:18 AM

the india us deal will further deepen the agricultural crisis

इन पंक्तियों का लेखक पिछले कुछ समय से बार-बार यह आगाह करता रहा है कि चाहे मोदी सरकार कुछ भी कहे, ट्रम्प इसमें कामयाब होंगे कि वह भारत सरकार को ट्रेड डील पर मजबूर करें। प्रचार जो भी हो, इस डील में कृषि को शामिल किया जाएगा। पिछले कई महीनों से दरबारी...

इन पंक्तियों का लेखक पिछले कुछ समय से बार-बार यह आगाह करता रहा है कि चाहे मोदी सरकार कुछ भी कहे, ट्रम्प इसमें कामयाब होंगे कि वह भारत सरकार को ट्रेड डील पर मजबूर करें। प्रचार जो भी हो, इस डील में कृषि को शामिल किया जाएगा। पिछले कई महीनों से दरबारी मीडिया खबर फैला रहा था कि मोदी ने अमरीका के सामने झुकने से इंकार कर दिया। अगस्त में प्रधानमंत्री ने कहा था कि किसान, पशुपालक और मछुआरे उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता हैं, उनके हितों से कोई समझौता नहीं होगा। यूरोपीय यूनियन से हुए व्यापार समझौते में कृषि को बाहर रखने पर भी यही प्रचार हुआ कि मोदी किसान के हितों की रक्षा कर रहे हैं। अंतत: वही हुआ जो होना था।

भारत-पाकिस्तान में युद्ध विराम की तरह इस बार भी भारत की जनता को पहली खबर अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प से मिली। अभी प्रधानमंत्री ने मुंह नहीं खोला है और वाणिज्य मंत्री तथा कृषि मंत्री के बयान भी लीपापोती वाले ही हैं, लेकिन ट्रम्प का बयान साफ तौर पर जिक्र करता है कि डील में कृषि को शामिल किया गया है। इसकी पुष्टि अमरीका की कृषि मंत्री (वहां ‘कृषि सचिव’) ब्रुक रोलिंस के बयान से हुई है। उन्होंने अमरीका के किसानों को बधाई देते हुए लिखा है कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने अब उनकी फसलों के लिए भारत की मंडियों के दरवाजे खोल दिए हैं। जरूर अब भारत सरकार की तरफ से लीपा-पोती की कोशिश शुरू हो जाएगी। लेकिन कुछ बुनियादी तथ्यों पर गौर करना बेहतर होगा। पिछले कई दशकों से सत्ता में चाहे जो भी दल हो, भारत सरकार की नीति यह रही है कि कृषि को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों से बाहर रखा जाएगा ताकि किसानों के हितों की रक्षा की जा सके। 

भारत के किसान को विदेशी व्यापार से खतरा इसलिए नहीं है कि भारत का किसान निकम्मा या अक्षम है। दरअसल दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देश अपने किसान को भारी सबसिडी देते हैं जिसके चलते वह विश्व बाजार में अपना माल सस्ता बेच सकते हैं। इसके विपरीत भारत सरकार किसान को जितना देती है उससे ज्यादा उसकी जेब से निकाल लेती है। तकनीकी भाषा में कहें तो भारत में किसान को ‘नकारात्मक सबसिडी’ मिलती है। इसलिए जिन फसलों का भारत में पर्याप्त उत्पादन होता है उस पर आयात शुल्क लगाकर भारत सरकार किसान को विदेशी माल के हमले से बचाती है। इसी नीति के चलते पिछले वर्षों में जितने भी विदेशी व्यापार समझौते हुए, उनमें से कृषि उत्पादों को बाहर रखा गया। हालांकि यूरोपीय यूनियन के साथ प्रस्तावित समझौते में प्रोसैस्ड फूड को अनुमति दी गई है जिसका असर आखिर हमारे किसानों पर पड़ सकता है।

ट्रम्प ने भारत सरकार को इस नीति को पलटने के लिए मजबूर कर लिया है। शुरू से ही अमरीका के वार्ताकारों की नजर भारत के कृषि पदार्थों के बाजार पर थी। अमरीका दुनिया भर में मक्का, सोयाबीन और कपास के सबसे बड़े उत्पादकों में है। पिछले कुछ वर्षों में उसका उत्पादन तो बढ़ा है लेकिन चीन ने मक्का और सोयाबीन की खरीद घटा दी है। पिछले साल अमरीका के वाणिज्य विभाग की एक रिपोर्ट ने इस फालतू उत्पादन की खपत के लिए भारत को एक बड़े स्रोत के रूप में चिह्नित किया था। उनके लिए अड़चन यह थी कि भारत का आयात शुल्क बहुत ज्यादा था और अमरीका का अधिकांश मक्का और सोयाबीन जैनेटिकली मॉडिफाइड (जी.एम.) हैं जिस पर भारत में प्रतिबंध है। अमरीका दूध और दुग्ध उत्पाद भी भारत को बेचना चाहता है, लेकिन यहां भी शुल्क के अलावा भारत की यह शर्त है कि दूध जिस जानवर का हो उसे मांसाहारी पदार्थ न खिलाए गए हों। अमरीका इन सब शर्तों से मुक्ति चाहता था।

भारत सरकार के मुताबिक अभी तक समझौते के प्रावधान अंतिम रूप से तय नहीं हुए हैं, इसलिए यह कहना कठिन है कि भारत सरकार ने इनमें से कौन-कौन-सी शर्तें मान ली हैं, लेकिन इतना तय है कि कृषि को शामिल न करने के संकल्प से मोदी सरकार पीछे हटी है। यह भी तय है कि बादाम, पिस्ता और सेब जैसी फसलों का बड़े पैमाने पर आयात खुल जाएगा और इनका उत्पादन करने वाले किसानों को झटका लगेगा। मोटे तौर पर यह भी कहा जा सकता है कि इसकी पहली मार मक्का, सोयाबीन और गन्ना किसानों पर पड़ेगी। पिछले कुछ वर्षों में देश में मक्का और सोयाबीन का उत्पादन बढ़ा है और किसानों को उसका दाम भी बेहतर मिला है। अमरीका का सस्ता मक्का और सोयाबीन आयात होने से भारतीय बाजार में उसका दाम गिरेगा। ऐसा कपास के साथ शायद न हो, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से कपास का उत्पादन घटा है और हमें कपास विदेश से आयात करनी पड़ती है, लेकिन इसका अप्रत्यक्ष नुकसान गन्ने के किसान को होगा। 

संभावना यह है कि मक्का और सोयाबीन में जी.एम. फसलों पर लगे प्रतिबंध से बचने के लिए सरकार इनका तेल और एथनॉल में प्रयोग करने की अनुमति दे सकती है। फिलहाल देश में गन्ने की बहुतायत है और गन्ना मिलें एथनॉल बना कर किसान का गन्ना खरीद पा रही हैं। अगर एथनॉल अमरीका से आने लगा तो गन्ना मिलें और गन्ना किसान दोनों संकट में फंस जाएंगे। अभी डेयरी के बारे में कुछ स्पष्ट नहीं है, लेकिन अगर उस पर शुल्क और पाबंदी हटा दी जाती है तो भारत के पशुपालकों के लिए भारी संकट खड़ा हो जाएगा। बाहर से आए इस संकट को भीतरी बेरुखी से जोडऩे पर पूरी तस्वीर सामने आती है। नए बजट में वित्त मंत्री ने किसान का नाम लेना जरूरी नहीं समझा। खानापूर्ति के लिए जो योजनाओं की घोषणा की जाती थी, वह भी नहीं की। कृषि और उससे जुड़ी सभी मदों पर खर्चे का अनुपात 2019 के बाद से लगातार घटता रहा है जो इस साल 3.38 से घटाकर 3.04 फीसदी कर दिया गया। यही नहीं, पिछले साल जिन 6 विशेष मिशन की घोषणा की गई थी, उनके लिए बजट में एक पैसा भी नहीं दिया गया। ऊपर सेे यूरिया की सबसिडी काटने की तैयारी कर ली गई है। लेकिन खेती किसानी के दीर्घकालिक संकट से निपटने के लिए कोई योजना नहीं बनाई गई। कुल मिलाकर सरकार ने किसान को भगवान भरोसे छोडऩे की ठान ली है। अब देखना है कि किसान और किसान संगठन इस चुनौती का सामना कैसे करते हैं।-योगेन्द्र यादव
 

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