केरल के चुनाव सभी पार्टियों के लिए चुनौतीपूर्ण

Edited By Updated: 31 Mar, 2026 04:32 AM

the kerala elections are challenging for all parties

विपक्ष में एक दशक बिताने के बाद, कांग्रेस पार्टी 2026 के चुनावों से पहले केरल में अपना प्रभाव फिर से हासिल करने की कोशिश कर रही है। सत्तारूढ़ सी.पी.आई. (एम) (माकपा) नियंत्रण बनाए रखने के लिए प्रयासों को तेज कर रही है। वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस के...

विपक्ष में एक दशक बिताने के बाद, कांग्रेस पार्टी 2026 के चुनावों से पहले केरल में अपना प्रभाव फिर से हासिल करने की कोशिश कर रही है। सत्तारूढ़ सी.पी.आई. (एम) (माकपा) नियंत्रण बनाए रखने के लिए प्रयासों को तेज कर रही है। वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस के नेतृत्व वाला यू.डी.एफ. सत्ता की तलाश में है, जिसे पिछले लोकसभा चुनावों और स्थानीय निकाय चुनावों के मजबूत परिणामों से बल मिला है। आगामी चुनाव एल.डी.एफ. की सत्ता बरकरार रखने की क्षमता और यू.डी.एफ. की कड़ी चुनौती का परीक्षण करेंगे। 1982 के बाद से, मतदाताओं ने हर 5 साल में बारी-बारी से वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एल.डी.एफ.) और संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यू.डी.एफ.) का समर्थन किया है, जिससे किसी भी सरकार को लंबे समय तक सत्ता में रहने से रोका जा सका। हालांकि, 2021 में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व में एल.डी.एफ. ने लगातार दूसरा कार्यकाल जीता। दोनों पाॢटयां वर्तमान में मोदी सरकार का विरोध और मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। एन.डी.ए. केरल में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। भाजपा अपना वोट शेयर बढ़ाने और महत्वपूर्ण सीटें जीतने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। राज्य स्तर पर कांग्रेस के अधिकारी आश्वस्त महसूस करते हैं। हालांकि, स्थानीय स्तर पर गंभीर समस्याएं हैं, जो भविष्य के चुनावों में उनकी संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा प्रमुख राजनीतिक गठबंधन है, जिसे मुख्य रूप से हिंदुओं का समर्थन प्राप्त है। इसके विपरीत, संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा अल्पसंख्यक समूहों के समर्थन पर निर्भर करता है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उदय ने यू.डी.एफ. से कुछ हिंदू वोटों को अपनी ओर खींचा है, जिसमें इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आई.यू.एम.एल.) और केरल कांग्रेस शामिल हैं, जो लगभग 27 प्रतिशत मुस्लिमों और 18 प्रतिशत ईसाइयों का प्रतिनिधित्व करते हैं। केरल के 6 जिलों में कम से कम दस ‘सिं्वग’ (अनिश्चित) निर्वाचन क्षेत्र हैं, जो महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पिछले दो विधानसभा चुनावों में, तीनों गठबंधनों को मतदाताओं का लगभग समान समर्थन मिला था। कांग्रेस के भीतर आंतरिक संघर्ष, विशेष रूप से उम्मीदवारों के चयन को लेकर, पार्टी की एकजुटता के महत्व को रेखांकित करते हैं। भले ही सतीशन, चेन्निथला और वेणुगोपाल जैसे नेता विधानसभा चुनावों से पहले एकजुट दिख रहे हों लेकिन वे अभी भी सत्ता के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। 2026 के केरल विधानसभा चुनावों में, भाजपा ईसाई मतदाताओं, विशेष रूप से मध्य केरल में, के साथ जुडऩे की पूरी कोशिश कर रही है। पार्टी स्थानीय समुदायों के साथ जुडऩे, प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने और अपने प्रयासों में वरिष्ठ नेताओं को शामिल करने की योजना बना रही है। उनका लक्ष्य खुद को पारंपरिक यू.डी.एफ. गठबंधन के एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश करना है। पार्टी बुनियादी ढांचे, नौकरियों और सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित कर रही है। हाल ही में, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एन.डी.ए.) ने स्थानीय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया। यह दर्शाता है कि केरल का राजनीतिक परिदृश्य, जिस पर यू.डी.एफ. और एल.डी.एफ. का दबदबा रहा है, बदल सकता है।

उम्मीदवारों के चयन पर कांग्रेस के भीतर मतभेद, जिसमें टिकट वितरण के बारे में राहुल गांधी की चिंताएं भी शामिल हैं, पार्टी की एकजुटता को कमजोर और मतदाताओं के भरोसे को प्रभावित कर सकते हैं। प्रस्तावित सूची में लगभग 60 प्रतिशत उम्मीदवार लोकसभा सदस्य और पार्टी महासचिव के.सी. वेणुगोपाल से जुड़े हैं। गांधी ने कांग्रेस के भीतर अधिक संगठित दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया है। चुनाव समिति केवल राज्य इकाई के नामांकन पर निर्भर रहने की बजाय जाति समीकरण, जीतने की क्षमता और पिछले चुनावी परिणामों जैसे प्रमुख कारकों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। पार्टी कार्यकत्र्ता उम्मीदवार सूची में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व को लेकर भी चिंतित हैं। जमीनी स्तर पर स्थिति स्पष्ट है। माकपा ने प्रभावी प्रचार और स्पष्ट संगठन के माध्यम से मजबूत प्रगति की है। इसके विपरीत, कांग्रेस को अभी भी अपने सदस्यों को संगठित करने में कठिनाई हो रही है। कुछ लोग जो मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, वे अपने समर्थकों के लिए टिकट सुरक्षित करने हेतु कड़ी मेहनत कर रहे हैं। वे केवल वफादार कार्यकत्र्ताओं की मदद करने या नए नेता बनाने का काम नहीं कर रहे, वे अपने समूहों को मजबूत करने की भी कोशिश कर रहे हैं। कई शीर्ष नेता अपने वफादार समर्थकों को महत्वपूर्ण पदों पर बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वे इसे चुनावों के बाद मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने से पहले समर्थन जुटाने के तरीके के रूप में देखते हैं।
सतीशन, चेन्निथला और वेणुगोपाल विधानसभा चुनावों से पहले दुर्लभ एकजुटता दिखा रहे हैं। फिर भी, राजनीतिक नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्धा स्पष्ट बनी हुई है।

2026 के केरल विधानसभा चुनावों में भाजपा सक्रिय रूप से ईसाई मतदाताओं, विशेष रूप से मध्य केरल के सीरो-मालाबार समुदाय तक पहुंच रही है। स्थानीय स्तर पर जुड़कर, मुद्दा-आधारित अभियान चलाकर और नेतृत्व के साथ उच्च-स्तरीय बातचीत की सुविधा प्रदान करके, पार्टी खुद को पारंपरिक यू.डी.एफ. गठबंधन के व्यवहार्य विकल्प के रूप में पेश करना चाहती है। हाल के स्थानीय निकाय चुनाव और शुरुआती सर्वेक्षण संकेत देते हैं कि यू.डी.एफ. थोड़ा आगे है लेकिन आंतरिक विभाजन का सामना कर रहा है। यदि भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन 2024 के लोकसभा चुनावों के अपने 19 प्रतिशत वोट शेयर को बनाए रखता है, तो उसे 2021 की तुलना में 7 प्रतिशत का लाभ हो सकता है। मुख्य प्रश्न यह है कि क्या यह लाभ एल.डी.एफ. के वोटों से होगा या यू.डी.एफ. के? ईसाई और मुस्लिम समुदाय किसे वोट देंगे?
यू.डी.एफ. चुनौतियों का सामना कर रहा है। अनिश्चितता इस बात पर है कि क्या विपक्ष में एक दशक के बाद, कांग्रेस 2026 के चुनावों के लिए वापसी की पटकथा तैयार कर रही है। यह स्पष्ट नहीं है कि वे (मतदाता) कांग्रेस पार्टी की ओर लौटेंगे या एल.डी.एफ. के साथ बने रहेंगे, जिसे कुछ लोग भाजपा को चुनौती देने के लिए बेहतर स्थिति में मानते हैं। इन समुदायों के प्रभाव वाली 47 सीटों के परिणाम 2026 के चुनावों का नतीजा तय कर सकते हैं।-कल्याणी शंकर

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