हैरानीजनक है तृणमूल में बिखराव

Edited By Updated: 07 Jun, 2026 05:03 AM

the split in trinamool is surprising

लगातार 15 साल शासन के बाद ममता बनर्जी की चुनावी पराजय से भी ज्यादा चौंकाने वाला उनकी तृणमूल कांग्रेस में बिखराव है। 2021 के विधानसभा चुनाव में 294 में से 215 और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में 42 में से 29 सीटें जीतने वाली तृणमूल इस बार विधानसभा में 80...

लगातार 15 साल शासन के बाद ममता बनर्जी की चुनावी पराजय से भी ज्यादा चौंकाने वाला उनकी तृणमूल कांग्रेस में बिखराव है। 2021 के विधानसभा चुनाव में 294 में से 215 और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में 42 में से 29 सीटें जीतने वाली तृणमूल इस बार विधानसभा में 80 पर सिमट जाएगी, ऐसा किसने सोचा था? बेशक चुनाव में बड़े उलटफेर पहले भी देखे गए हैं। भारतीय राजनीति की ‘लौह महिला’ इंदिरा गांधी 1977 में प्रधानमंत्री रहते हुए लोकसभा चुनाव हारीं और पहली बार कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बेदखल हो गई। 2009 में 206 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2014 के लोकसभा चुनाव में 44 पर सिमट गई। इसलिए कांग्रेस छोड़ अपनी तृणमूल बना कर 2011 में 34 साल पुराने वाम मोर्चा शासन को उखाड़ फैंकने वाली ममता का सत्ता के साथ ही खुद भी चुनाव हार जाना अनहोनी घटना नहीं है। दरअसल हार से भी ज्यादा हैरानीजनक है तृणमूल में विभाजन और जन आक्रोश। 

विधानसभा चुनाव में तृणमूल का ‘गुंडा राज’ बड़ा मुद्दा था, मतदाताओं ने जिसकी समाप्ति के लिए जनादेश दिया है, न कि चेहरे बदलने के लिए। तृणमूल कांग्रेस नेताओं ने भ्रष्टाचार से ले कर हिंसा तक जो कुछ भी गलत किया, कानून सम्मत प्रक्रिया से उसकी कठोर सजा उन्हें मिलनी ही चाहिए, लेकिन कानून व्यवस्था बनाए रखना सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है, जिससे मुंह नहीं चुराया जा सकता। 

चार मई को विधानसभा चुनाव परिणाम आने के साथ ही तृणमूल में बड़ी टूट की आशंका भी जताई जाने लगी थी। ममता की तृणमूल को नकार कर मतदाताओं ने ‘सोनार बांग्ला’ बनाने की जिम्मेदारी भाजपा को सौंपी है, जिसके निर्वाह का दायित्व सुवेंदु अधिकारी को दिया गया है। जाहिर है, भाजपा के ‘वादे-इरादे’ सुवेंदु सरकार के कामकाज की कसौटी पर ही कसे जाएंगे लेकिन तृणमूल कांग्रेस में अप्रत्याशित बिखराव कई सवाल खड़े करता है, जिसके कुछ जरूरी सबक भी हैं। मसलन, राज्य-दर-राज्य रेखांकित हो रहा है कि क्षेत्रीय दल वस्तुत: परिवार विशेष की जागीर होते हैं, जिनकी सफलता की कसौटी सिर्फ सत्ता होती है। सत्ता जाते ही इनकी प्रासंगिकता पर सवालिया निशान लगने लगते हैं। 

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की सबसे बड़ी योग्यता-प्रतिभा यही है कि वह दिवंगत मुलायम सिंह यादव के बेटे हैं, जिन्होंने खुद जनादेश हासिल कर उन्हें अपने जीवनकाल में ही मुख्यमंत्री बना दिया। बसपा सुप्रीमो मायावती भी राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए भतीजे आकाश से आगे नहीं देख पाईं तो वही कहानी ममता बनर्जी की है। कई-कई बार इतने बड़े राज्यों पर शासन करने वाले दल में परिवार से बाहर और कोई योग्य उत्तराधिकारी ही नहीं मिला, इस पर कौन विश्वास करेगा? माया ने आकाश को चुना तो तमाम दिग्गजों को बाहर का रास्ता देखना पड़ा और जब ममता ने अभिषेक को आगे बढ़ाया तो बगावत करने वाले सुवेंदु ने आखिरकार भाजपाई बन कर सत्ता ही छीन ली। दरअसल तृणमूल में बगावत के मूल में जो भी ज्ञात-अज्ञात कारण हों, यह तो साफ है कि ममता की बजाय नाराजगी अभिषेक से ज्यादा है। 

चुनाव प्रचार के दौरान अभिषेक बनर्जी की भाषा किसी राजनेता की बजाय क्षेत्रीय बाहुबली की ज्यादा नजर आई। वह सरेआम डायमंड हार्बर मॉडल तोडऩे की चुनौती देते दिखे, पर नतीजों ने बता दिया कि जब मतदाता ठान ले तो कोई मॉडल नहीं टिक पाता। छात्र जीवन से राजनीति शुरू कर अपने दम पर यहां तक पहुंचीं इतनी अनुभवी ममता भी उस सत्ता मद से नहीं बच पाईं! 15 साल की सत्ता विरोधी भावना और भाजपा के मुकाबले 80 विधानसभा सीटों को सम्मानजनक भी मान लें तो रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 58 विधायकों की बगावत को क्या कहें? अब वैसी ही बगावत की आशंका 29 लोकसभा सांसदों में भी जताई जा रही है। 

जाहिर है, हाल तक ममता के निष्ठावान रहे इन बागी तृणमूल नेताओं की आत्मा अचानक जाग जाने के लिए भाजपा पर उंगलियां उठाई जा रही हैं। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी सरकार गिरा कर वैकल्पिक सरकार बनाते हुए भाजपा ने जिस  एकनाथ शिंदे और अजीत पवार रूपी मोहरों से अपनी निष्कंटक सत्ता की चुनावी बिसात बिछाई, उसके मद्देनजर तृणमूल कांग्रेस में अप्रत्याशित बिखराव में उसकी भूमिका खारिज कर पाना आसान नहीं लेकिन अनुकूल माहौल तैयार करने के लिए जिम्मेदार तो खुद ममता ही हैं। सत्ता पा कर एकला चलो का राग अलापने वाली तथा लोकसभा और विधानसभा चुनाव में ‘इंडिया’ गठबंधन के सहयोगियों के लिए सीटें न छोडऩे वाली ममता अब भाजपा के विरुद्ध संघर्ष के लिए सबसे साथ आने का आह्वान कर रही हैं।-राज कुमार सिंह
 

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