एक ‘गलत हवाई यात्रा’ की कहानी

Edited By Updated: 06 Feb, 2026 03:49 AM

the story of a  wrong plane journey

टैलीविजन स्क्रीन पर यह दिखाई दे रहा था कि बारामती में अजित पवार के अंतिम संस्कार के लिए हजारों नहीं, बल्कि दसियों हजार, यदि लाख नहीं, शोक संतप्त लोग एकत्र हुए थे। पवार परिवार (शरद पवार के परिवार वाले) बारामती में सबकी आंखों के तारे हैं। केवल यही बात...

टैलीविजन स्क्रीन पर यह दिखाई दे रहा था कि बारामती में अजित पवार के अंतिम संस्कार के लिए हजारों नहीं, बल्कि दसियों हजार, यदि लाख नहीं, शोक संतप्त लोग एकत्र हुए थे। पवार परिवार (शरद पवार के परिवार वाले) बारामती में सबकी आंखों के तारे हैं। केवल यही बात उस भीड़ का कारण हो सकती थी, जो उस व्यक्ति को अपनी अंतिम विदाई देने के लिए जुटी थी, जो राज्य का मुख्यमंत्री बनने के लिए बेताब था, लेकिन बन न सका! मुझे जूलियस सीजर के अंतिम संस्कार पर मार्क एंटनी के उस भाषण की याद आती है, जिसे शेक्सपियर ने अपने नाटक में अमर कर दिया है-‘मनुष्य जो बुराई करता है वह उसके बाद भी जीवित रहती है और अच्छाई अक्सर उसकी हड्डियों के साथ ही दफन हो जाती है।’ अजित पवार अपने राजनीतिक करियर के दौरान कई विवादों में शामिल रहे। उनमें से सबसे गंभीर वह भ्रष्टाचार का मामला था, जो उन पर सिंचाई परियोजनाओं के लिए निर्धारित धन को गायब करने के लिए दर्ज किया गया था, जब वह पिछली सरकार में सिंचाई विभाग के मंत्री थे। 

राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ए.सी.बी.) ने उन्हें क्लीन चिट दे दी। किसी भी मामले में, इस घटनाक्रम पर नजर रखने वालों के बीच सामान्य धारणा यही थी कि भाजपा ने अजित के पाला बदलते ही उन्हें सभी दोषों से मुक्त कर दिया! हाल ही में, कुछ महीने पहले, अजित के दो बेटों में से एक पार्थ पवार तब विवादों में आए थे, जब उनकी मुख्य स्वामित्व वाली कंपनी ‘अमाडेया एंटरप्राइजेज’ ने महार (एक अनुसूचित जाति) समुदाय के लिए आरक्षित भूमि प्राप्त की थी, जिसे बिक्री के माध्यम से भी हस्तांतरित नहीं किया जा सकता था। पार्थ की कंपनी ने वह जमीन बहुत ही कम दाम पर खरीदी थी। जब प्रैस ने इस लेनदेन का विवरण प्रकाशित किया, तो अजित पवार ने अपने बेटे का बचाव किया और फडऩवीस सरकार फिर से उनके बचाव में आई। अंतत: वह जमीन महार समुदाय को वापस करनी पड़ी। अधिकारों के दुरुपयोग के एक और आश्चर्यजनक उदाहरण में, अजित पवार को एक युवा महिला आई.पी.एस. अधिकारी को फटकार लगाते हुए रिकॉर्ड किया गया था, क्योंकि उसने राजस्व कानूनों को तोड़ने के लिए अजित के अनुयायियों को हिरासत में लिया था। यह सत्ताधारी दल का एक सटीक उदाहरण था, जहां पहले खुद कानून बनाए गए और फिर उम्मीद की गई कि जब उन कानूनों को तोड़ा जाए तो पुलिस अपनी आंखें बंद कर ले!

एक और हालिया मामला, जिसमें अजित की पत्नी सुनेत्रा भी शामिल थीं, महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक से गबन का था, जिसकी जांच ई.डी. (प्रवर्तन निदेशालय) अदालत में कर रही है। इन उदाहरणों से पाठकों को यह सोचना चाहिए कि क्या अजित पवार ‘9 जीवन वाली बिल्ली’ के समान थे? अब जब 28 जनवरी की सुबह मुंबई से उनके गृहनगर बारामती की यात्रा के दौरान एक निजी चार्टर्ड विमान दुर्घटना में उनकी क्रूर मृत्यु हो गई, तो बारामती के लोगों की सहानुभूति ने उनके सभी कथित कुकर्मों को मिटा दिया है। अजित ने मुख्यमंत्री की ‘गद्दी’ की चाह में अपने चाचा और मार्गदर्शक शरद पवार का साथ छोड़ दिया था। अभी हाल ही में चाचा और भतीजा पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम चुनाव एक-साथ लडऩे के लिए करीब आए थे। वे हार गए, लेकिन एक समय पर उनका साथ होना यह सोचने पर मजबूर करता है कि यह रिश्ता किस तरह का था जो हवा के रुख के साथ बदलता रहता था!

अजित पवार की मृत्यु के ठीक 3 दिन बाद, उनकी विधवा सुनेत्रा ने महाराष्ट्र कैबिनेट में उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। राज्य सरकार द्वारा घोषित 3 दिवसीय शोक की अवधि समाप्त हो रही थी और झंडे अभी भी आधे झुके हुए थे! सुनेत्रा द्वारा सत्ता के मोह में दिखाई गई इस जल्दबाजी से कई लोग स्तब्ध थे, यह भूलकर कि वह स्वयं एक ऐसे राजनीतिक परिवार से आती हैं जो हमेशा सत्ता की तलाश में रहा है। व्यक्तिगत रूप से, मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि राज्य के सबसे चतुर राजनीतिज्ञ देवेंद्र फडऩवीस ही इस त्वरित पदोन्नति के पीछे थे। 

अजित पवार की अचानक मृत्यु ने उनके सामने एकनाथ शिंदे (जो उद्धव ठाकरे विरोधी शिवसेना गुट के प्रमुख हैं) द्वारा राजनीतिक रियायतों के निरंतर दबाव की स्थिति पैदा कर दी थी। यदि अजित पवार का गुट शरद की एन.सी.पी. में शामिल हो जाता, जैसा कि अफवाहें थीं, तो फडऩवीस का शिंदे पर से नियंत्रण कम हो जाता, क्योंकि शरद पवार अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि बचाने के लिए भाजपा का साथ नहीं देते। यदि अजित के अनुयायी शरद पवार के पास नहीं लौटते, तो विधानसभा में उनकी संख्या (लगभग 40) भाजपा को शिंदे सेना की धमकियों से बचाने के लिए पर्याप्त होती। यह संख्या भाजपा को सत्ता में बनाए रखने के लिए काफी होती, यदि शिंदे की शिवसेना बहुत अधिक मांग करने लगती। इसलिए अजित के गुट को अपने पक्ष में रखना आवश्यक था। उनकी विधवा को उपमुख्यमंत्री बनाना स्पष्ट रूप से फडऩवीस जैसे चतुर राजनेता के पिटारे का एक हिस्सा था।

सत्ता के लिए पाला बदलना महाराष्ट्र की राजनीति का एक आम खेल है। बेशक, जो राजनेता विचारधारा के प्रति सच्चे हैं, वे ऐसा नहीं करेंगे लेकिन सच तो यह है कि ऐसे लोग अब दुर्लभ हैं। पद का लालच या लाभ ही उन्हें डगमगाने के लिए काफी है। इसके साथ ही ई.डी. की जांच से बचने की मजबूरी भी एक बड़ा कारण है, जो भाजपा उन लोगों के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल करती है, जिनके अतीत में दाग हैं।-जूलियो रिबैरो(पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी) 
 

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