Edited By ,Updated: 05 Sep, 2026 05:13 AM

इतिहास के कुछ प्रसंग ऐसे होते हैं जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जाता, महसूस करना पड़ता है। चित्तौड़ का जौहर भी ऐसा ही प्रसंग है। यह केवल आग में उतर जाने की कहानी नहीं है। यह उस समय की भयावह परिस्थितियों, युद्ध की कू्ररता, स्त्री की अस्मिता, पराजय के बाद...
इतिहास के कुछ प्रसंग ऐसे होते हैं जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जाता, महसूस करना पड़ता है। चित्तौड़ का जौहर भी ऐसा ही प्रसंग है। यह केवल आग में उतर जाने की कहानी नहीं है। यह उस समय की भयावह परिस्थितियों, युद्ध की कू्ररता, स्त्री की अस्मिता, पराजय के बाद विजेता के अधिकार और एक समाज की सामूहिक मानसिकता को समझने का विषय है।
इसीलिए जब आज कोई सात सौ वर्ष पुराने उस निर्णय को अपनी सुविधानुसार ‘कायरता’ या ‘बहादुरी’ की कसौटी पर कसता है तो सबसे पहले सवाल यह होना चाहिए कि क्या हम उस समय को समझने की कोशिश कर रहे हैं या केवल आज के चश्मे से उस पर फैसला सुना रहे हैं? हाल ही में अभिनेत्री स्वरा भास्कर द्वारा फिल्म पद्मावत के जौहर दृश्य पर की गई टिप्पणी ने इसी बहस को फिर जिंदा कर दिया है। दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि फिल्म का जौहर दृश्य उन्हें परेशान करता है और उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी बलात्कार से बची महिला को यह संदेश दिया जाना चाहिए कि सम्मान बचाने के लिए मर जाना ही बहादुरी है। उनके बयान की व्यापक आलोचना हुई। बाद में उन्होंने सफाई दी कि उन्होंने रानी पद्मावती अथवा जौहर करने वाली महिलाओं को कायर नहीं कहा था और उनके कथन का गलत अर्थ निकाला गया। स्वरा की सफाई अपनी जगह है। किसी व्यक्ति के बयान को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना भी उचित नहीं। लेकिन इससे एक दूसरा प्रश्न खत्म नहीं हो जाता। क्या जौहर जैसी ऐतिहासिक घटना को आज के नैतिक और सामाजिक मानदंडों से देखकर उन महिलाओं के साहस पर प्रश्नचिह्न लगाया जा सकता है?
मेरा उत्तर है..नहीं : लेकिन यहां एक ऐतिहासिक भूल से बचना भी जरूरी है। रानी पद्मावती का प्रसंग सती का नहीं, जौहर का है। सती वह प्रथा थी जिसमें पति की मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी पति की चिता पर स्वयं को समर्पित करती थी। इसके विपरीत जौहर युद्ध की उस अंतिम स्थिति से जुड़ा था, जब किले का पतन निश्चित हो जाता था और महिलाओं के सामने शत्रु के हाथों बंदी बनने, दासता, अपमान अथवा यौन हिंसा का भय खड़ा होता था। दोनों परंपराओं को एक मान लेना इतिहास को सरल बनाना नहीं बल्कि विकृत करना है।
चित्तौड़ की उस रात को आज की आंखों से मत देखिए: कल्पना कीजिए उस समय की, न मोबाइल था, न न्यायालय, न मानवाधिकार आयोग, न पुलिस की कोई ऐसी व्यवस्था जिस पर संकट में पड़ी महिला भरोसा कर सके। किले के बाहर महीनों से शत्रु सेना डेरा डाले बैठी थी। भीतर रसद सीमित हो रही थी। सहायता की उम्मीद क्षीण हो रही थी। अंतिम युद्ध निकट था और पराजय का अर्थ केवल सत्ता का परिवर्तन नहीं था। 1303 में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर लंबी घेराबंदी के बाद उसे अधिकार में लिया। उसके दरबारी इतिहासकार अमीर खुसरो ने इस अभियान का वर्णन किया है। उपलब्ध विवरणों में चित्तौड़ की घेराबंदी और विजय का उल्लेख मिलता है और खुसरो ने बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों की हत्या का भी वर्णन किया है, हालांकि मृतकों की संख्या को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं।
ऐसे वातावरण में किले के भीतर बैठी महिलाओं के सामने विकल्प क्या थे? आज हम कहते हैं जीवन सबसे मूल्यवान है। बिल्कुल है। किसी भी स्त्री का जीवन उसकी अस्मिता से कम मूल्यवान नहीं। बलात्कार पीड़िता को जीने का पूरा अधिकार है। उसे शर्मिंदा करना या उसके जीवन को समाप्त मान लेना घोर अन्याय है। लेकिन क्या यही सामाजिक व्यवस्था सात सौ वर्ष पहले भी मौजूद थी? नहीं। उस काल में युद्ध हारने वाली स्त्रियां विजेता की संपत्ति मानी जा सकती थीं। बंदी बनना केवल जेल में जाना नहीं था।
राजघराने और योद्धा समाज के लिए यह परिवार, वंश, सम्मान और स्वतंत्र अस्तित्व के खत्म होने का भय था। इस भयावह परिस्थिति में जौहर को केवल ‘आत्महत्या’ कहकर समाप्त कर देना उस मानसिक संसार को समझने से इन्कार करना होगा जिसमें वह निर्णय लिया गया। यहां एक बुनियादी बात समझनी होगी। आज की दृष्टि से जौहर मृत्यु का चुनाव दिखाई देता है, लेकिन उस दौर की स्त्रियों के लिए वह शत्रु के हाथों अपमान और पराधीनता स्वीकार करने की बजाय अपनी अस्मिता बचाने का अंतिम संकल्प था।
सवाल स्वरा भास्कर से भी, समाज से भी: स्वरा भास्कर को अपनी बात रखने का अधिकार है। उन्हें यह कहने का भी अधिकार है कि किसी महिला के लिए बलात्कार जीवन का अंत नहीं होना चाहिए। इस बात का समर्थन होना चाहिए। लेकिन जब हम किसी ऐतिहासिक प्रसंग पर टिप्पणी करते हैं तो शब्दों का चयन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। खासकर तब, जब वह प्रसंग किसी समुदाय की सामूहिक स्मृति, अस्मिता और पूर्वजों की वीरगाथा से जुड़ा हो। दूसरी ओर समाज को भी यह समझना होगा कि इतिहास पर बहस का उत्तर केवल आक्रोश नहीं है। इतिहास की सबसे मजबूत रक्षा तथ्यों, शोध और तर्क से होती है। किसी फिल्म अभिनेत्री की टिप्पणी से रानी पद्मावती की प्रतिष्ठा न बढ़ सकती है, न घट सकती है।-बालकृष्ण थरेजा