भारतीय संस्कृति को समृद्ध बनाने के लिए हमें अपनी सोच बदलनी होगी

Edited By Updated: 29 Dec, 2021 06:03 AM

we have to change our thinking to make indian culture rich

हमारी समृद्ध हिंदू संस्कृति, जो लगभग 200 अरब वर्ष पुरानी है, को विदेशी आक्रमणकारियों ने समय-समय पर अपने हस्तक्षेप से प्रभावित करने का काम किया है। उसके बाद राजनीतिज्ञों ने भी वास्तविकता को

हमारी समृद्ध हिंदू संस्कृति, जो लगभग 200 अरब वर्ष पुरानी है, को विदेशी आक्रमणकारियों ने समय-समय पर अपने हस्तक्षेप से प्रभावित करने का काम किया है। उसके बाद राजनीतिज्ञों ने भी वास्तविकता को नकार कर अपने स्वार्थी उद्देश्यों की भरपाई के लिए नए तथ्यों को जोड़ कर इसे नया रूप देने की कोशिश की। 

भारतीय संस्कृति पूरी दुनिया में फैली हुई थी, जिसके अवशेष आज भी कई देशों में मिलते हैं। भारत में कई आक्रमणकारी आए, मगर इन सबको हिंदू धर्म में मिला लिया गया। पुराणों में इस देश को देव-निर्मित बताया गया है। सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेष अब भी इस बात के परिचायक हैं कि यहां हिंदुओं का ही अस्तित्व था। हमारी संस्कृति विविधता में एकता लिए हुए पूरे विश्व में एक अलग स्थान रखती है। 

कभी भारत को सोने की चिडिय़ा कहा जाता था तथा विदेशी आक्रमणकारी यहां पर आकर लूटपाट मचाते रहे तथा अपनी-अपनी सभ्यता के मटमैले छींटे हमारी समृद्ध संस्कृति पर छोड़ते गए। विडम्बना यह रही कि भारतीयों ने इनका कोई विशेष प्रतिरोध नहीं किया, जिनकी उदासीनता ने इन विदेशी आक्रमणकारियों के हौसले बुलंद किए क्योंकि वे मूकदर्शक बन कर तमाशा देखते रहे। 

स्वर्गीय अटल जी ने कहा था कि प्लासी की लड़ाई, जो कि सिराजुद्दौला व अंग्रेजों के बीच लड़ी गई, में लडऩे वालों से ज्यादा लोगों की भीड़ युद्ध क्षेत्र के बाहर युद्ध का परिणाम सुनने के लिए खड़ी थी। इसी तरह हल्दीघाटी की लड़ाई में महाराणा प्रताप की वीरता, पराक्रम देखने को मिलती है मगर जयपुर, जोधपुर, बूंदी व जैसलमेर की सब रियासतें महाराणा प्रताप के विरुद्ध लामबंद थीं। भारत पर अंग्रेजों ने 200 से भी ज्यादा वर्षों तक शासन किया। 

इससे पहले मुस्लिम लुटेरों ने यहां के मंदिरों पर आक्रमण किए तथा भारतीय महिलाओं की अस्मिता से खिलवाड़ किया। अंग्रेजों ने भारत में आकर भारतीय संस्कृति को दागदार किया तथा भारतीय संस्कृति को नष्ट करने के लिए अपना कैलेंडर, शिक्षा, धर्म व त्यौहार इत्यादि भारतीयों पर थोपने शुरू कर दिए तथा हम अपनी ङ्क्षहदू संस्कृति को भूलते चले गए। आज भारत के लोग अपने त्यौहारों, शिक्षा व धर्म को इतना महत्व नहीं देते तथा मानसिक गुलामी के कारण विदेशी सभ्यता को अपनाने में अपना गौरव समझते हैं। 

अंग्रेजी बोलने वाले हिंदी में बातचीत करना अपना अपमान समझते हैं। कुर्ता, धोती, टोपी जैसे भारतीय परिधान पहनने में शर्म महसूस करते हैं, जबकि छोटे व फटे हुए कपड़े पहनने में अपना गौरव समझते हैं। लगता है कि हम अभी भी मानसिक गुलामी से ऊपर नहीं उठ पाए हैं। अपनी मां व बाप को अम्मा, माता जी व पिता जी नहीं कहेंगे, मगर मम्मा, डैडी या डैड कहने में अपना गौरव समझेंगे। 

आज लोग व्हाट्स ऐप या फेसबुक देखने में ही मसरूफ रहते हैं तथा सुबह उठते ही दोस्तों को गुड मॉर्निंग लिखने में व्यस्त हो जाते हैं। बच्चों के साथ बैठ कर अपने धर्म, गुरुओं व बलिदानियों की कितनी चर्चा करते हैं, शायद कभी नहीं। अगर हम बदलेंगे तभी समाधान होगा। विश्व के महान देश, जैसे कि रूस, चीन, जापान, फ्रांस, इंगलैंड इत्यादि अपनी मातृभाषा का ही इस्तेमाल करते हैं, मगर भारत में तो कुछ ऐसे राज्य भी हैं, जहां पर राष्ट्रभाषा हिंदी बोलने वालों को घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। 

आज समाज के बहुत-से लोग भारतीय संस्कृति की मर्यादाओं व नैतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाते देखे जा सकते हैं। कभी पाश्चात्य देश हमारी संस्कृति को अपनाने के लिए आतुर रहते थे मगर आज हमारे देश में ही इसके विपरीत हो रहा है। अनुशासनहीनता, उद्दंडता व अराजकता का माहौल देखने को मिलता है। टी.वी. के विभिन्न धारावाहिक कार्यक्रमों में रिश्तों को अभद्र ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। किसी भी तरह का कोई सकारात्मक प्रभाव इन धारावाहिकों द्वारा सृजित नहीं किया जाता तथा युवा पीढ़ी भटकती जा रही है। 

किसी समय भारत विश्वगुरु कहलाता था मगर आज हम अपनी संस्कृति से परे होते जा रहे हैं। अंग्रेजों ने हमारी संस्कृति को खूब तोड़ा-मरोड़ा है। आज हम मिशनरी धर्म के अनुसार नववर्ष की पूर्व संध्या को बड़े हर्षोल्लास से मनाते हैं जबकि हम अपने हिंदू विक्रमी संवत् को, जो चैत्र महीने से आरंभ होता है बारे जानते तक नहीं। हम तुलसी पूजन करना भूल गए हैं, जबकि क्रिसमस-डे बड़ी धूम-धाम से मनाते हैं। 

यदि हम चाहते हैं कि भारतीय संस्कृति समृद्ध बनी रहे तो हमें अपनी सोच में परिर्वतन लाना तथा पाश्चातय जीवनशैली को त्यागना होगा। तभी हम भारत माता के फीके पड़ते हुए संस्कृति के मुकुट को चमकाने व सजाने में सफल हो पाएंगे।-राजेन्द्र मोहन शर्मा डी.आई.जी. (रिटायर्ड)
 

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