ढूंढनी होगी भ्रष्टाचार के रावण की नाभि

Edited By Updated: 17 Jul, 2026 03:20 AM

we will have to find the navel of the ravana of corruption

घटना  एक : राम जन्मभूमि मंदिर अयोध्या में चढ़ावा चोरी की घटना। ऐसा स्थान, जिससे करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है और जो मर्यादा पुरुषोत्तम का पवित्र स्थान है, वहां भ्रष्टाचार का यह रूप देखकर हर देशवासी दुखी है।

घटना  एक : राम जन्मभूमि मंदिर अयोध्या में चढ़ावा चोरी की घटना। ऐसा स्थान, जिससे करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है और जो मर्यादा पुरुषोत्तम का पवित्र स्थान है, वहां भ्रष्टाचार का यह रूप देखकर हर देशवासी दुखी है।
घटना दो : उफ! केदारनाथ मंदिर में भी वहां की मंदिर समिति के एक कर्मचारी को पकड़ा गया।

घटना तीन : जगह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ । कुछ समय पहले सेवानिवृत्त यू.पी. के सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी ललित कुमार के आवास पर विजिलैंस की 26 घंटे तक चली छापेमारी में 13 किलो सोना, 9 किलो चांदी, हीरे-आभूषण बरामद किए गए, जिनकी कीमत 20 करोड़ आंकी गई है। इनके अलावा पैकेट बनाकर दीवार में छुपाई गई 1.62 करोड़ की नकदी। 15 जगहों पर मकान, फ्लैट और खेती की जमीनों के दस्तावेज मिले। विजिलैंस ने बरामद कुल संपत्ति की कीमत करीब 35 करोड़ रुपए बताई है। विजिलैंस को ललित कुमार के खिलाफ शिकायत 2024 में उनकी कानपुर में तैनाती के दौरान ही मिल गई थी। यह कार्रवाई तत्काल हो गई होती तो शायद बरामदगी के आंकड़े कुछ और बड़े भी हो सकते थे।

घटना चार : गत 2 जुलाई को गुजरात के भरूच जिले में अंकलेश्वर के पास दिल्ली-मुम्बई एक्सप्रैस-वे का एक हिस्सा ढह गया। मानसून की बारिश में अडोल और पिलुद्रा गांवों के बीच पुल के स्लैब में लगभग 7 फुट का गड्ढा बन गया। 
घटना पांच : मुम्बई-पुणे एक्सप्रैस-वे के नवनिर्मित मिसिंग लिंक का उद्घाटन गत 1 मई को ही हुआ था और ठीक 66 दिन बाद बारिश में टनल-2 के पास का हिस्सा ढह गया। 
बाकी दृश्य गिनाने लगूं तो पूरा अखबार इसी से रंग जाएगा। बिहार में आए दिन पुल गिरते हैं। बिहार ही क्या, शायद ही कोई भी प्रदेश इस तरह की घटनाओं से अछूता है।

मंदिर में चोरी उदाहरण कुछ समूह के लोगों की चोरी का है। बाकी उदाहरण व्यक्तिगत आचरण और चोरी के अलावा संस्थाओं में फैल रहे भ्रष्टाचार के हैं। सरकार ने तमाम कोशिशें कर ऊपर और डी.बी.टी. ऐसी योजनाओं से नीचे के स्तर पर भ्रष्टाचार को रोकने की पर्याप्त कोशिशें की हैं तथा उसमें सफलता भी पाई है लेकिन  जनता और व्यापारियों से जुड़े सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार पर्याप्त पैठ जमा चुका है। उसके अफसर काफी कुछ ललित कुमार नुमा हैं, जो संस्था को ही नहीं, पूरा का पूरा आंवा बदनाम करने की ताकत रखते हैं। यह भी तय है कि ऐसे ललित कुमार ऊपर बैठे तमाम ललित कुमारों के साए में ही जिंदा रहते हैं और अपने शरीर के अंगों और बालों की तरह, जैसे सफेद को काला किया जाता है, यहां काले को सफेद करते रहते हैं। कार्यालयों में बाबुओं और सक्रिय एजैंटों के माध्यम से सुविधा शुल्क के बिना जनता के सामान्य काम भी अटक जाते हैं। ड्राइविंग लाइसैंस, वाहनों का पंजीकरण, फिटनैस प्रमाणपत्र जारी करने, ओवरलोड ट्रकों, अवैध बसों को अनुमति देने तथा राज्य के भीतर और अंतरराज्यीय परमिट देने में खेल होता है। 

पुलों के गिरने  के पीछे  भ्रष्टाचार, घटिया निर्माण सामग्री और प्रशासनिक सांठगांठ एक बेहद बड़ा और मुख्य कारण है। जब कुछ प्रोजैक्ट उद्घाटन के कुछ ही महीनों या दिनों के भीतर धंस जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर सार्वजनिक धन की लूट और भ्रष्टाचार को उजागर करता है। तय है कि कई मामलों में टैंडर हासिल करने के लिए और बाद में बिल पास कराने के लिए ठेकेदारों को भारी रिश्वत देनी पड़ती है। इस मुनाफे की भरपाई ठेकेदार निर्माण की गुणवत्ता से समझौता करके करते हैं। राजनीतिक पहुंच या रिश्वत के बल पर कई बार ऐसी कंपनियों को ठेके दे दिए जाते हैं, जिनके पास न तो तकनीकी अनुभव होता है और न ही आवश्यक संसाधन। लागत बचाने और अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए कंपनियां तय मानकों का उल्लंघन करती हैं। सड़कों के टूटने, खराब होने, फिर गड्ढा होने और भरने के नाम पर जो कुछ होता है, उसे हम सिर्फ देखने भर को विवश हैं।

ट्रांसपेरैंसी इंटरनैशनल का भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (सी.पी.आई.) विशेष रूप से  सार्वजनिक क्षेत्र/सरकारी कार्यालयों में फैले भ्रष्टाचार को ही मापता है। वर्ष 2025 में इस सूचकांक में भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर रहा। उससे पहले 2024 में भारत इस सूचकांक में 96वें स्थान पर था। यानी थोड़ा सुधार हुआ है। तय है कि  डिजिटल सुधारों की वजह से यह संभव हुआ है। ई-गवर्नैंस और डी.बी.टी. जैसी पहलों से भ्रष्टाचार कम भी हुआ है। मगर इन डिजिटल सुधारों के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर ‘लुक-छिपकर’ होने वाला भ्रष्टाचार या फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए रिश्वत की मांग अब भी काफी अधिक है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 (फरवरी तक) में लोकपाल को 389 शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 336 शिकायतों का निपटारा किया गया। इनमें ज्यादातर मामले ग्रुप ए और बी के अधिकारियों के खिलाफ थे। लोकपाल द्वारा अनुशंसित भ्रष्टाचार के मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन का प्रस्ताव अब भी लंबित है। लोकपाल कानून के तहत हर राज्य में लोकायुक्त  का होना अनिवार्य है। हालांकि, कई राज्यों में पदों के खाली होने या पर्याप्त बुनियादी ढांचा न होने के कारण ये उतने प्रभावी साबित नहीं हो पा रहे। उत्तराखंड में लोकायुक्त का पद लंबे समय से खाली है। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पुड्डुचेरी में पूर्ण लोकायुक्त संस्था नियमित संचालन प्रभावित है। देश के 22 से अधिक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में उप-लोकायुक्त या सहायक सदस्यों के पद खाली पड़े हैं। 

लोकपाल को 2019 से लेकर इस साल तक 7000 से ज्यादा शिकायतें मिली हैं। इनमें से करीब 90 फीसदी शिकायतें शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दी गईं, क्योंकि वे निर्धारित प्रारूप के अनुसार नहीं थीं। कुल दर्ज वैध शिकायतों का विश्लेषण बताता है कि 41 फीसदी शिकायतें ऐसी थीं, जो सीधे लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में नहीं आतीं। इसके बाद 35 फीसदी शिकायतें केंद्र सरकार के विभिन्न बोर्डों, निगमों या स्वायत्त संस्थाओं के अध्यक्षों और सदस्यों के खिलाफ आईं। इनमें 21 फीसदी शिकायतें केंद्र सरकार के ग्रुप ए, बी, सी और डी स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ थीं। सिर्फ 3 फीसदी शिकायतें ही प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों के खिलाफ थीं। देश में निचले स्तर पर जिस तरह से भ्रष्टाचार सिस्टम को खोखला कर रहा है, अगर उसे तत्काल नहीं रोका गया तो देश को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। भ्रष्टाचार के खिलाफ सभी तंत्रों को सक्रिय किए जाने की जरूरत है। भ्रष्टाचार के इस रावण की नाभि ढूंढनी होगी। उसमें छुपे विषकुंड को फोडऩा होगा।-हम, देश के लोगअकु श्रीवास्तव 
 

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