Edited By ,Updated: 30 Jan, 2026 04:08 AM

अजित पवार की विमान हादसे में दर्दनाक मौत से उनका पूरा परिवार गहरे सदमे में है। उनकी एन.सी.पी. पार्टी के नेता, विधायक, कार्यकत्र्ता तिराहे पर हैं। दादा के जाने से देवेन्द्र (फडऩवीस) पशोपेश में हैं। एकनाथ शिंदे सही वक्त के इंतजार में हैं। महाराष्ट्र...
अजित पवार की विमान हादसे में दर्दनाक मौत से उनका पूरा परिवार गहरे सदमे में है। उनकी एन.सी.पी. पार्टी के नेता, विधायक, कार्यकत्र्ता तिराहे पर हैं। दादा के जाने से देवेन्द्र (फडऩवीस) पशोपेश में हैं। एकनाथ शिंदे सही वक्त के इंतजार में हैं। महाराष्ट्र की राजनीति कोई नई करवट लेने को बेचैन दिखाई दे रही है। ममता बनर्जी भले ही साजिश देख रही हों लेकिन महाराष्ट्र के नेता सियासत में चरमराहट सुन रहे हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस और एकनाथ शिंदे की आपसी सियासी लड़ाई में दादा पवार ढाल बनते रहे हैं। अब देवेंद्र और एकनाथ में नए सिरे से शह-मात का खेल शुरू हो सकता है।
पिछले विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद एकनाथ शिंदे जब मुख्यमंत्री पद पर दाव लगा रहे थे तो अजित दादा ने ही फडऩवीस को महायुति का मुख्यमंत्री घोषित कर दिया था। यह फडऩवीस के लिए बहुत बड़ी राहत थी। हाल के नगर निगम चुनावों के दौरान जब अजित पवार ने भाजपा पर भ्रष्टाचार को लेकर राक्षसी भूख होने का आरोप लगाया था, तब देवेंद्र ने इसे हंसी-मजाक में टाल दिया था कि अजित पवार दो कदम आगे दो कदम पीछे होते रहते हैं और वह कहीं जाने वाले नहीं हैं। दादा की विदाई के बाद उनकी पार्टी के सामने तीन ही रास्ते बचते हैं। एक, पार्टी को पार्टी की तरह चलाया जाए और महाराष्ट्र की राजनीति में खुद के लिए अलग जगह बनाई जाए। दो, शरद पवार के आगे नतमस्तक हो कर उन्हें अपना नेता चुन लिया जाए। तीन, भाजपा की शरण में चल दिया जाए। सियासी जानकार कहते रहे हैं कि महाराष्ट्र जैसे राज्य में 6-6 दलों का लंबे समय तक टिके रहना संभव नहीं है। भाजपा, एन.सी.पी. और शिंदे सेना एक तरफ। कांग्रेस, शरद पवार की एन.सी.पी. और उद्धव ठाकरे की शिवसेना दूसरी तरफ। कुछ कहते रहे हैं कि जैसे एन.सी.पी. और शिवसेना 2-2 टुकड़ों में बंटीं, उसी तरह इन टुकड़ों का अपने-अपने गठबंधन की सबसे मजबूत पार्टी से नया रिश्ता बनना या फिर टुकड़ों का एक होना (दोनों में से एक) लाजमी है।
तो क्या यह मान लिया जाए कि अजित पवार के जाने के बाद यह सिलसिला शुरू हो सकता है? यानी एन.सी.पी. अब एक हो जाए या अजित की एन.सी.पी. का बड़ा हिस्सा भाजपा में शामिल हो जाए। मुख्यमंत्री तो दूसरे विकल्प का स्वागत ही करेंगे क्योंकि ऐसा हुआ तो दो फायदे होंगे। एक, एकनाथ शिंदे की दबाव की राजनीति से छुटकारा मिलेगा और दो, भाजपा का महाराष्ट्र में राजनीतिक कैनवास और भी ज्यादा बड़ा हो जाएगा। इतना बड़ा कि बाकी के दल कोने में सिमटे दिखाई देंगे।
अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर अजित पवार की एन.सी.पी. का क्या होगा? अगर अपने दम पर अपने वजूद को कायम रखना है तो क्या दादा की पत्नी सुनेत्रा पवार को आगे आना होगा और कमान संभालनी होगी? वह लोकसभा चुनावों में सुप्रिया सुले (ननद) के हाथों हारी थीं और इस समय राज्यसभा सांसद हैं। भले ही वह राजनीति के दाव-पेंच नहीं समझती हों लेकिन उनके साथ भावनाएं जुड़ी हुई हैं। भले ही वह बारामती के महिला संगठनों तक सीमित रही हों लेकिन अब राज्य भर में अजित पवार समर्थकों को एक करने की क्षमता रखती हैं। एक नाम पार्थ पवार का भी है। अपने दोनों बेटों को दादा ने सक्रिय चुनावी राजनीति से दूर ही रखा है। पार्थ ने जरूर 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा था लेकिन हार के बाद सियासत से दूरी बना ली। दूसरा बेटा लंदन में बैठकर पिता का कारोबार संभालता है। यह भी माना जा रहा है कि पवार के समर्थक और वरिष्ठ नेता पार्थ को अपना नेता मानने में झिझक महसूस कर सकते हैं। अलबत्ता सुनेत्रा के नाम पर किसी को शायद ही एतराज हो।
वैसे एन.सी.पी. में प्रफुल्ल पटेल जैसे अनुभवी नेता भी हैं जो शरद पवार के लिए लंबे समय तक काम करते रहे हैं। शरद पवार के कारण ही वह यू.पी.ए. सरकार में मंत्री भी बनाए गए थे। पटेल गठबंधन की राजनीति के तमाम दाव-पेंच समझते हैं और इनके बीच में से अपने लिए रास्ता बनाना भी उन्हें बखूबी आता है। अलग-अलग दलों के नेताओं से उनकी दोस्ती, जान-पहचान है लेकिन अपने ही राज्य में कार्यकत्र्ताओं के बीच जमीनी पकड़ उतनी नहीं है जितनी उम्मीद किसी पार्टी अध्यक्ष से की जाती है। सुनील तटकरे भी मौका मिला तो एन.सी.पी. को संभालने की क्षमता रखते हैं। वैसे भी एन.सी.पी. की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष हैं और जमीनी कार्यकत्र्ताओं के बीच अच्छी पकड़ रखते हैं। कुछ लोग छगन भुजबल जैसे दलित नेता का भी नाम लेते हैं। हालांकि वह जेल से छूट कर फिर से सियासत में सक्रिय हैं लेकिन उन पर लग चुके आरोप उनका पीछा अभी भी नहीं छोड़ रहे।
ऐसे में जो एकमात्र नाम बचता है, वह है शरद पवार। 84 साल की उम्र है, बीमार रहते हैं, रोजमर्रा की राजनीति उन्होंने बेटी सुप्रिया सुले और पोते रोहित पर छोड़ दी है। ऐसे नाजुक समय में वह फिर से एन.सी.पी. को नए सिरे से संगठित करने की क्षमता भी रखते हैं क्योंकि उन्हें राज्य भर के कैडर से सिर्फ एक अपील ही तो करनी है। यहां एक पेंच फंसता है। अगर दोनों धड़े एक होते हैं तो शरद पवार को तय करना होगा कि वह महायुति का हिस्सा बनेंगे या विपक्ष में बैठेंगे। सत्ता से दूर जाना क्या दादा की एन.सी.पी. के मंत्रियों और विधायकों को रास आएगा? यह अपने आप में बड़ा सवाल है? फिर इस बात की कोई गारंटी नहीं कि ऐसी परिस्थितियों में भाजपा एन.सी.पी. को तोडऩे की कोशिश नहीं करेगी। भाजपा को खुद का विस्तार करने का मौका मिलता है तो वह पीछे नहीं हटेगी।
कहा जा रहा है कि अजित दादा जीते जी मुख्यमंत्री फडऩवीस के काम आए और बदले माहौल में भले ही तात्कालिक रूप से फडऩवीस को शिंदे झटके दे रहे हों लेकिन अगर एन.सी.पी. टूटती है तो फायदा फडऩवीस को ही होगा। फडऩवीस हमेशा से ही अजित पवार को सियासी दोस्त मानते रहे जो मुश्किल दौर में प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से साथ देता रहा। एन.सी.पी. में फूट और दादा का महायुति के साथ आना सब फडऩवीस ने ही प्रायोजित किया था। यह बात है जुलाई, 2023 की। दिलचस्प है कि इसके 4 दिन पहले ही प्रधानमंत्री मोदी ने दादा पर चुनावी रैली में 70 हजार करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगाया था। खैर, अब देवेंद्र फडऩवीस के बचाव के लिए दादा नहीं हैं और कयासबाजी हो रही है कि भाजपा की नजर उनकी पार्टी पर है। राजनीति बहुत निर्मम होती है। महाराष्ट्र की राजनीति में तो कभी भी कुछ भी हो सकता है। बहुत कुछ शरद पवार पर भी निर्भर करता है। देखना दिलचस्प होगा कि वह क्या कदम उठाते हैं।-विजय विद्रोही