Edited By jyoti choudhary,Updated: 09 Mar, 2026 01:25 PM

पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध तनाव का असर अब भारतीय निर्यात पर भी साफ दिखाई देने लगा है। लॉजिस्टिक्स क्षेत्र की कंपनियों के अनुसार लगभग 40,000 से 45,000 भारतीय कंटेनर इस समय या तो समुद्री रास्तों में फंसे हुए हैं या फिर विदेशी बंदरगाहों पर अटके पड़े...
बिजनेस डेस्कः पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध तनाव का असर अब भारतीय निर्यात पर भी साफ दिखाई देने लगा है। लॉजिस्टिक्स क्षेत्र की कंपनियों के अनुसार लगभग 40,000 से 45,000 भारतीय कंटेनर इस समय या तो समुद्री रास्तों में फंसे हुए हैं या फिर विदेशी बंदरगाहों पर अटके पड़े हैं। इन कंटेनरों में मौजूद करीब 1 से 1.5 अरब डॉलर के निर्यात माल का भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है। यदि जहाजों को वैकल्पिक मार्ग से भेजा जाता है या माल वापस भारत लाना पड़ता है, तो इससे लागत में और बढ़ोतरी हो सकती है।
शिपिंग कंपनियों द्वारा लगाए जा रहे आपातकालीन और अतिरिक्त शुल्क के कारण प्रति कंटेनर लागत में 3-5 गुना तक वृद्धि हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति जारी रही तो कंटेनर की कमी का संकट पैदा हो सकता है और खासकर जल्दी खराब होने वाले उत्पादों के निर्यातकों को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है।
करीब 1-1.5 अरब डॉलर का माल अटका
सूत्रों के मुताबिक फंसे हुए माल में करीब 4 लाख टन बासमती चावल भी शामिल है। ट्राइटन लॉजिस्टिक्स एंड मैरीटाइम के सीईओ जितेंद्र श्रीवास्तव ने बताया कि लगभग 80 प्रतिशत कंटेनर समुद्री मार्ग में ही अटके हुए हैं और हवाई व समुद्री दोनों मार्गों पर करीब 1-1.5 अरब डॉलर का माल फंसा हुआ है।
इस स्थिति का सबसे ज्यादा नुकसान उन निर्यातकों को हो रहा है जिनका सामान जल्दी खराब हो सकता है। इसके अलावा युद्ध जोखिम अधिभार, आपातकालीन लागत वसूली शुल्क और पीक सीजन शुल्क जैसे अतिरिक्त खर्च भी निर्यातकों के मुनाफे को प्रभावित कर रहे हैं। कई निर्यातक अब बैक-टू-टाउन (BTT) विकल्प पर विचार कर रहे हैं, जिसके तहत बंदरगाह से माल वापस लेकर घरेलू बाजार में बेचा जा सकता है।
अतिरिक्त शुल्क से निर्यातकों की मुश्किलें बढ़ीं
व्यापार नीति विशेषज्ञ एस. चंद्रशेखरन के मुताबिक निर्यातकों को प्रति कंटेनर 3,000 से 5,000 डॉलर तक अतिरिक्त शुल्क देना पड़ रहा है। यह सामान्य माल ढुलाई लागत के अतिरिक्त है, जो आमतौर पर 800 से 1,500 डॉलर प्रति कंटेनर के बीच रहती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के बाद फ्रांसीसी शिपिंग कंपनी CMA CGM ने माल ढुलाई पर 2,000 से 4,000 डॉलर तक का आपातकालीन अधिभार लगाया, जिसके बाद अन्य शिपिंग कंपनियों ने भी इसी तरह के शुल्क लागू कर दिए। वहीं बीमा कंपनियों द्वारा युद्ध जोखिम कवर हटाने से भी उद्योग के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
खाड़ी देशों में माल उतारना मुश्किल, जहाज बदल सकते हैं रास्ता
कंटेनर शिपिंग लाइन्स एसोसिएशन के प्रतिनिधियों के अनुसार कई कंटेनर समुद्र में या आसपास के बंदरगाहों पर अटके हुए हैं। अगर खाड़ी देशों में माल उतारना संभव नहीं हुआ तो जहाज सलालाह जैसे बंदरगाहों की ओर रुख कर सकते हैं या फिर भारत लौट सकते हैं।
इस बीच, कुछ कंपनियां माल की डिलीवरी जारी रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएं भी कर रही हैं। वैश्विक टर्मिनल ऑपरेटर डीपी वर्ल्ड ने अपने ग्राहकों को बताया है कि कंटेनर को खोरफक्कन या फुजैराह बंदरगाह पर उतारकर बाद में सड़क मार्ग से जेबेल अली बंदरगाह तक पहुंचाया जा सकता है।
संकट लंबा चला तो शिपिंग दरों में बढ़ोतरी संभव
विशेषज्ञों का कहना है कि संकट अगर लंबा चला तो वैश्विक स्तर पर माल ढुलाई दरों में भी बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इससे शिपिंग समय बढ़ेगा, क्षमता कम होगी और प्रमुख व्यापार मार्गों पर माल ढुलाई दरों में अस्थिरता बढ़ सकती है।