‘द बॉडी अलार्म’ ने पाठकों को कराया ‘बॉडी लिटरेसी’ के महत्त्व से परिचित

Edited By Updated: 14 May, 2026 09:08 PM

the body alarm introduced readers to the importance of body literacy

भारत में प्रिवेंटिव हेल्थकेयर (यानी बीमारियों की शुरुआती रोकथाम) को लेकर लगातार सक्रिय आवाज़ों में शामिल चिकित्सक और लेखिका डॉ. आकांक्षा गुप्ता की नई किताब ‘द बॉडी अलार्म' इन दिनों खास चर्चा में है। डॉक्टरों का मानना है कि लोग अक्सर शरीर के लगातार...

नेशनल डेस्क : भारत में प्रिवेंटिव हेल्थकेयर (यानी बीमारियों की शुरुआती रोकथाम) को लेकर लगातार सक्रिय आवाज़ों में शामिल चिकित्सक और लेखिका डॉ. आकांक्षा गुप्ता की नई किताब ‘द बॉडी अलार्म' इन दिनों खास चर्चा में है। डॉक्टरों का मानना है कि लोग अक्सर शरीर के लगातार दिखने वाले संकेतों, यानी ‘बॉडी अलार्म्स’, को तब तक नज़रअंदाज़ करते रहते हैं जब तक वे रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करना शुरू नहीं कर देते। यही विषय इस किताब के केंद्र में है।

इस साल फरवरी में रूपा पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित ‘द बॉडी अलार्म’ उन लक्षणों पर बात करती है जिन्हें लोग आम मानकर टाल देते हैं। इनमें पेट फूलना, लगातार थकान, सिरदर्द, नींद की समस्या, मसूड़ों से खून आना, रात में ज़्यादा पसीना आना, मल त्याग की आदतों में बदलाव, अचानक तिल दिखाई देना या वज़न का तेज़ी से घटना-बढ़ना जैसे संकेत शामिल हैं। किताब का मुख्य तर्क यह है कि ऐसे लक्षणों को अक्सर तनाव, खराब खानपान, अनियमित दिनचर्या या बदलती जीवनशैली का नतीजा मान लिया जाता है, जबकि कई बार यही संकेत किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या की शुरुआती चेतावनी भी हो सकते हैं, जिनकी समय रहते जाँच ज़रूरी होती है।

हालाँकि डॉक्टर लंबे समय से लोगों को यह सलाह देते आए हैं कि शरीर में होने वाली किसी भी असहजता को सामान्य मानकर न टालें, लेकिन यह किताब एक अलग और ज़्यादा व्यावहारिक कोशिश करती है। इसका उद्देश्य मेडिकल साइंस की समझ और आम लोगों की वास्तविक आदतों के बीच मौजूद दूरी को कम करना है। यानी जब शरीर कोई संकेत देता है, तब लोग उसे किस तरह समझते हैं या अनदेखा कर देते हैं, किताब उसी व्यवहार पर सवाल उठाती है।

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भारत में प्रिवेंटिव हेल्थकेयर के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है बीमारी की देर से पहचान होना। आँकड़ों के मुताबिक, करीब 75 प्रतिशत भारतीय तब तक नियमित हेल्थ चेकअप या डायग्नोस्टिक टेस्ट नहीं करवाते जब तक कोई गंभीर लक्षण सामने न आ जाए या डॉक्टर विशेष रूप से सलाह न दें। ज़्यादातर लोग तब डॉक्टर के पास पहुँचते हैं जब लक्षण भूख, नींद, चलने-फिरने या रोज़मर्रा के कामकाज को प्रभावित करने लगते हैं। एनीमिया, थायरॉइड, डायबिटीज़, पाचन संबंधी बीमारियाँ, हाई ब्लड प्रेशर और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याएँ धीरे-धीरे विकसित होती हैं, जबकि उनके शुरुआती संकेत महीनों पहले दिखने शुरू हो जाते हैं। यही वह दौर है जिस पर ‘द बॉडी अलार्म’ खास तौर पर ध्यान केंद्रित करती है।

अपने क्लीनिकल अनुभव के आधार पर डॉ. आकांक्षा गुप्ता कहती हैं कि किसी लक्षण की गंभीरता जितनी महत्त्वपूर्ण है, उतनी ही महत्त्वपूर्ण उसकी अवधि और बार-बार लौटना भी है। उदाहरण के तौर पर, भारी खाना खाने के बाद कभी-कभार एसिडिटी होना सामान्य हो सकता है, लेकिन अगर यही समस्या हफ़्ते में कई बार होने लगे और उसके साथ मतली, पेट में तकलीफ़ या भूख कम लगने जैसे संकेत भी जुड़ जाएँ तो जाँच करवाना ज़रूरी हो जाता है। इसी तरह पर्याप्त नींद लेने के बावजूद लगातार थकान महसूस होना कई बार पोषण की कमी, थायरॉइड की समस्या, किसी पुरानी इंफेक्शन या मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानी की ओर इशारा कर सकता है। किताब के अनुसार, जो लक्षण गुज़र जाते हैं और जो लगातार बने रहते हैं, उनके बीच का फ़र्क पहचानने की आदत लोगों में कम होती है।

किताब का एक और अहम विषय है ‘बॉडी लिटरेसी’, यानी अपने शरीर के सामान्य व्यवहार को समझना और यह पहचान पाना कि कब उसमें बदलाव शुरू हो रहे हैं। यहाँ ‘लिटरेसी’ का मतलब किसी डर या आत्म-निदान से नहीं, बल्कि शरीर के संकेतों को पढ़ पाने की बुनियादी समझ से है। किताब लोगों को अनावश्यक घबराहट की तरफ़ नहीं ले जाती, बल्कि यह सलाह देती है कि यदि कोई लक्षण लंबे समय तक बना रहे या बार-बार लौटे, तो समय रहते डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
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डॉ. गुप्ता की यह किताब ऐसे समय में आई है जब भारत में प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को लेकर सार्वजनिक जागरूकता पहले से कहीं अधिक बढ़ी है। कोविड महामारी के बाद नियमित जाँच और लंबे समय तक स्वास्थ्य प्रबंधन को लेकर बातचीत अब सिर्फ़ अस्पतालों तक सीमित नहीं रही, बल्कि घरों और कार्यस्थलों तक पहुँच चुकी है। इसके बावजूद स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़ी संख्या में लोग आज भी इंटरनेट सर्च या सेल्फ-मेडिकेशन पर निर्भर रहते हैं। लंबे काम के घंटे, परिवार की ज़िम्मेदारियाँ, आर्थिक दबाव और लगातार बनी रहने वाली तकलीफ़ों को ‘सामान्य’ मान लेने की आदत समय पर इलाज लेने में बाधा बनती है। कई सार्वजनिक स्वास्थ्य अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि महिलाएँ थकान, पीरियड्स की अनियमितता, हार्मोनल बदलाव या लंबे समय तक रहने वाले दर्द जैसी समस्याओं को लेकर इलाज टालने की अधिक संभावना रखती हैं।

इस किताब को स्वास्थ्य और अकादमिक जगत से जुड़े कई प्रमुख लोगों ने सराहा है। इनमें कवि और पूर्व राजनेता कुमार विश्वास, सांसद और गायक-अभिनेता मनोज तिवारी, दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति योगेश सिंह, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी के कुलपति राज कुमार मित्तल, जीवा आयुर्वेद के निदेशक प्रताप चौहान, ग्रीनहॉक कॉर्पोरेशन के चेयरमैन और मुख्य कार्यकारी अधिकारी सज्जन अग्रवाल, और सनसिटी प्रोजेक्ट्स के चेयरमैन लक्ष्मी नारायण गोयल शामिल हैं।

दरअसल, यह किताब एक बड़े बदलाव की ओर भी इशारा करती है। हाल के वर्षों में आम पाठकों के लिए लिखे जा रहे भरोसेमंद मेडिकल साहित्य की माँग तेज़ी से बढ़ी है। लोग अब अपनी पुरानी और बार-बार लौटने वाली स्वास्थ्य समस्याओं को ऐसी भाषा में समझना चाहते हैं जो जानकारीपूर्ण हो, लेकिन अत्यधिक तकनीकी या जटिल न लगे।

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