Edited By Niyati Bhandari,Updated: 03 Jul, 2026 10:15 AM

Krishnapingal Sankashti Chaturthi Katha: जानें, आषाढ़ मास की कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का महत्व और राजा महीजित की पौराणिक व्रत कथा। निसंतान दंपत्तियों के लिए क्यों विशेष है यह गणेश व्रत?
Krishnapingal Sankashti Chaturthi Katha: हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना गया है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि जो भक्त इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखता है और भगवान गणेश की उपासना करता है, उसके जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उसे सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
संतान प्राप्ति के लिए विशेष महत्व धार्मिक दृष्टिकोण से इस व्रत का अत्यधिक महत्व है। विशेष रूप से वे लोग जो संतान सुख से वंचित हैं, उनके लिए यह व्रत किसी वरदान से कम नहीं माना जाता। शास्त्रों के अनुसार, आषाढ़ की इस संकष्टी चतुर्थी पर विधि-विधान से पूजा करने और व्रत कथा सुनने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

Krishnapingal Sankashti Chaturthi vrat Katha कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी पौराणिक व्रत कथा: राजा महीजित और लोमश ऋषि का वृत्तांत पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में माहिष्मति नगरी में महीजित नाम के एक अत्यंत प्रतापी और धर्मपरायण राजा शासन करते थे। प्रजा उनके शासन में सुखी थी, लेकिन राजा स्वयं एक गहरे दुख में डूबे रहते थे। उनके पास कोई संतान नहीं थी। पुत्र प्राप्ति के लिए राजा ने कई यज्ञ और दान-पुण्य किए पर सफलता नहीं मिली।

अंततः राजा और उनके प्रजाजन समाधान की खोज में वन की ओर निकले, जहां उनकी भेंट परम तपस्वी लोमश ऋषि से हुई। राजा की व्यथा सुनकर महर्षि लोमश ने उन्हें आषाढ़ मास की कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने का सुझाव दिया। उन्होंने राजा से भगवान एकदंत गणेश की विधिपूर्वक पूजा करने, व्रत रखने और ब्राह्मणों को भोजन कराने व दान देने का निर्देश दिया।

ऋषि के बताए मार्ग पर चलते हुए राजा महीजित ने पूरी निष्ठा के साथ यह व्रत किया। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से कुछ समय पश्चात रानी सुदक्षिणा ने एक सुंदर और भाग्यशाली पुत्र को जन्म दिया। तब से यह व्रत संकटों को हरने और मनोकामना पूर्ति के लिए विख्यात हो गया।
