Gaytri Jayanti Katha : कैसे हुआ था मां गायत्री का दिव्य अवतरण, जानें उनकी पौराणिक जन्म कथा

Edited By Updated: 24 Jun, 2026 03:11 PM

gaytri jayanti katha

सनातन धर्म में मां गायत्री को समस्त ज्ञान, बुद्धि और वेदों की जननी माना गया है। हर साल ज्येष्ठ माह में शुक्ल की एकादशी तिथि के दिन गायत्री जयंत्री मनाई जाती है। मान्यताओं के अनुसार, इसी पवित्र दिन पर सृष्टि के कल्याण के लिए मां गायत्री का प्राकट्य...

Gaytri Jayanti Katha : सनातन धर्म में मां गायत्री को समस्त ज्ञान, बुद्धि और वेदों की जननी माना गया है। हर साल ज्येष्ठ माह में शुक्ल की एकादशी तिथि के दिन गायत्री जयंत्री मनाई जाती है। मान्यताओं के अनुसार, इसी पवित्र दिन पर सृष्टि के कल्याण के लिए मां गायत्री का प्राकट्य हुआ था। माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से मां गायत्री की पूजा करने से व्यक्ति को धन लाभ और सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सारे संसार को परम ज्ञाम देने वाली मां गायत्री का अवतरण कैसा हुआ था। तो आइए जानते हैं मां गायत्री के जन्म से जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में-

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ऐसे हुई थीं देवी गायत्री अवतरित
एक बार भगवान ब्रह्मा संसार के कल्याण और शुद्धि के लिए एक विशाल यज्ञ का आयोजन करना चाहते थे। उन्होंने यज्ञ के लिए पृथ्वी पर पुष्कर नामक स्थान को चुना। यज्ञ की सभी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। सभी देवी-देवता, ऋषि-मुनि और गंधर्व उस पावन स्थल पर एकत्रित हो चुके थे। शास्त्रों के अनुसार, किसी भी धार्मिक यज्ञ को पूर्ण करने के लिए यजमान के साथ उसकी पत्नी का बैठना अनिवार्य होता है। ब्रह्मा जी अपनी पत्नी माता सावित्री की प्रतीक्षा कर रहे थे। माता सावित्री को बुलावा भेजा गया, लेकिन वे अपनी सहेलियों के आने की प्रतीक्षा कर रही थीं और श्रृंगार में व्यस्त होने के कारण समय पर नहीं पहुंच सकीं।

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इधर, यज्ञ का अत्यंत शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था। यदि मुहूर्त बीत जाता, तो वह महायज्ञ निष्फल हो जाता। सभी ऋषि-मुनि और देवता असमंजस में पड़ गए कि अब क्या किया जाए। मुहूर्त की रक्षा और यज्ञ को समय पर संपन्न करने के लिए भगवान ब्रह्मा ने देवराज इंद्र से एक योग्य कन्या की व्यवस्था करने को कहा। तब वहां मौजूद नंदिनी गाय के मुख से एक परम तेजस्विनी, दिव्य और रूपवान कन्या प्रकट हुईं। यही दिव्य कन्या साक्षात 'वेदमाता गायत्री' थीं, जो आदि शक्ति का ही एक रूप थीं। भगवान ब्रह्मा ने यज्ञ को पूरा करने के लिए देवताओं की सहमति से मां गायत्री से विवाह किया और उन्हें अपने वाम भाग (पत्नी के स्थान) पर बैठाया। इसके बाद यज्ञ का कार्य बिना किसी बाधा के सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

एक अन्य मान्यता यह भी है कि सृष्टि के प्रारंभ में मां गायत्री केवल देवताओं तक सीमित थीं। वेदों के इस गुप्त ज्ञान को आम जनमानस तक पहुंचाने के लिए महर्षि विश्वामित्र ने कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां गायत्री ने उन्हें दर्शन दिए। इसके बाद महर्षि विश्वामित्र ने 'गायत्री मंत्र' को सिद्ध किया और इसे संपूर्ण संसार के कल्याण के लिए प्रकट किया। इसीलिए विश्वामित्र जी को गायत्री मंत्र का द्रष्टा माना जाता है। धार्मिक चित्रों में मां गायत्री को अक्सर पंचमुखी दिखाया जाता है, जो सूर्य के तेज, बुद्धि, विवेक और दसों दिशाओं के रक्षण का प्रतीक हैं। उनके दस हाथ भगवान विष्णु की शक्ति और उनके वाहन हंस को ज्ञान व विवेक का प्रतीक माना जाता है।

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