Edited By Sarita Thapa,Updated: 11 Oct, 2026 04:01 PM
भारत स्वस्तिक यात्रा के अंतर्गत पूज्य मोरारी बापू की श्रीराम कथा का दूसरा दिन केरल के कालाडी में आयोजित हुआ। 10 अक्टूबर को कन्याकुमारी से रवाना हुई यात्रा आज कालाडी पहुंची, जो आदि गुरु शंकराचार्य की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध है।
Morari Bapu Kalady Ram Katha Day 2 : भारत स्वस्तिक यात्रा के अंतर्गत पूज्य मोरारी बापू की श्रीराम कथा का दूसरा दिन केरल के कालडि में आयोजित हुआ। 10 अक्टूबर को कन्याकुमारी से रवाना हुई यात्रा आज कालडि पहुंची, जो आदि गुरु शंकराचार्य की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध है। कथा की शुरुआत परंपरा के अनुसार हनुमान चालीसा के पाठ से हुई। इसके बाद ब्राह्मणों ने मंगलाचरण किया और मोरारी बापू ने आदि गुरु शंकराचार्य की पावन धरती, पूर्णा नदी तथा शंकराचार्य की माता को नमन करते हुए अपने प्रवचन की शुरुआत की। बापू ने स्थानीय विद्वानों, पंडितों, पुजारियों और उपस्थित श्रद्धालुओं का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि इस पवित्र भूमि से जुड़ना सभी के लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने पिछले वर्ष के आयोजन की तुलना में इस बार क्षेत्र में हुए विकास का भी उल्लेख किया।
भगवद्गीता का सार है प्रेम
मोरारी बापू ने अपने प्रवचन में प्रेम को भगवद्गीता का मूल भाव बताया। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद के माध्यम से समझाया कि परमात्मा से प्रेम करने के लिए मन का जुड़ना आवश्यक है। केवल धार्मिक आयोजन में उपस्थित होना पर्याप्त नहीं, बल्कि कथा सुनते समय मन और ध्यान भी उसी में लगना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब हम कथा में आते हैं, तो हमें अपना मन भी अर्पित करना चाहिए। गोस्वामी तुलसीदास की पंक्ति निज मन मुकुर सुधारि का संदर्भ देते हुए उन्होंने मन को निर्मल बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। बापू के अनुसार, वक्ता अपनी ओर से श्रोताओं को कथा से जोड़ने का प्रयास करता है, लेकिन श्रद्धालुओं को भी पूरी एकाग्रता और भाव के साथ कथा का श्रवण करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कई लोग यात्रा में साथ चलने की इच्छा जताते हैं, लेकिन कथा के समय इधर-उधर घूमते रहते हैं। उनके मुताबिक, कथा में आने का वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब व्यक्ति अपने मन को स्थिर करके प्रवचन सुने।
स्वस्ति का अर्थ है मंगल और कल्याण
प्रवचन के दौरान मोरारी बापू ने स्वस्तिक और स्वस्तिवाचन के आध्यात्मिक अर्थ पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि स्वस्ति का भाव मंगल, कल्याण और शुभता से जुड़ा है। स्वस्तिवाचन में विभिन्न देवताओं और गुरुजनों से जीवन में मंगल की कामना की जाती है। उन्होंने स्वस्तिवाचन में आने वाले शब्दों और संदर्भों का उल्लेख करते हुए गरुड़ जी की महिमा तथा बृहस्पति से जुड़ी प्रार्थना का भाव समझाया। बापू ने कहा कि श्रद्धा और विश्वास के साथ गुरु का स्मरण करने से मन में भरोसा मजबूत होता है। स्वस्तिवाचन का उद्देश्य केवल शब्दों का उच्चारण करना नहीं, बल्कि जीवन में शुभ विचारों और कल्याण की भावना को स्थान देना भी है।
परमात्मा तक पहुंचने के लिए मन और श्रद्धा जरूरी
मोरारी बापू ने अपने प्रवचन में कहा कि परमात्मा को अपनी सीमित बुद्धि से पूरी तरह समझ लेना आसान नहीं है। मनुष्य को अपने भीतर खोज की भावना बनाए रखनी चाहिए। यदि वह स्वयं सत्य तक पहुंचने में सक्षम न हो, तो कम से कम संतों और विद्वानों के विचारों को ध्यान से सुनने का प्रयास करे। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को चुने जाने और शुकदेव जी तथा राजा परीक्षित के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए समझाया कि आध्यात्मिक जीवन में उचित मार्गदर्शन और पात्रता का विशेष महत्व है। उन्होंने इंद्र और गौतम ऋषि से जुड़ी कथा का संदर्भ भी दिया, जिसमें भगवान श्रीराम के दर्शन से इंद्र के शाप का प्रभाव समाप्त होने की बात आती है। बापू ने कहा कि भगवान की कृपा और उनके दर्शन का महत्व केवल बाहरी परिस्थितियों तक सीमित नहीं है। सच्ची श्रद्धा मनुष्य के जीवन और दृष्टिकोण को बदलने की क्षमता रखती है।
राम नाम की महिमा कभी कम नहीं होती
मोरारी बापू ने राम नाम के महत्व को समझाते हुए कहा कि संसार में अनेक प्रकार की शक्तियां और उपलब्धियां हो सकती हैं, लेकिन भगवान के नाम की महिमा अपनी जगह विशेष है। उन्होंने रावण के प्रसंग के माध्यम से समझाया कि कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, भक्ति और नाम-स्मरण की महत्ता को समाप्त नहीं कर सकता। उन्होंने रामचरितमानस की चौपाइयों और भगवान श्रीराम के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा कि प्रभु के हाथों में धनुष-बाण भक्तों की विपत्तियों को दूर करने और धर्म की रक्षा का प्रतीक हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान के अनेक नामों में राम नाम की विशेष महिमा का वर्णन किया है। बापू ने समझाया कि भगवान के हजारों नाम हैं और श्रद्धालु को जिस नाम से प्रेम और जुड़ाव महसूस हो, उसका स्मरण करना चाहिए। अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों और कथाओं का श्रवण करने से भक्तों के मन में कभी श्रीकृष्ण, कभी मां भगवती और कभी भगवान श्रीराम के नाम का स्मरण जागता है। उन्होंने नाम-स्मरण और मंत्र की दीक्षा के बीच अंतर समझाते हुए कहा कि भगवान के नाम का स्मरण श्रद्धा के साथ कोई भी कर सकता है। इसके लिए किसी को नाम लेने से रोकना उचित नहीं है।
काशी में भगवान शिव के राम नाम का स्मरण कराने की मान्यता
प्रवचन के दौरान बापू ने काशी की महिमा का उल्लेख किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, काशी में भगवान शिव अंतिम समय में जीव को तारक मंत्र के रूप में राम नाम का उपदेश देते हैं। उन्होंने इस मान्यता को समझाते हुए कहा कि राम नाम को जीवन की नैया पार लगाने वाला माना गया है। बापू ने कहा कि यदि किसी से कुछ मांगना हो, तो काशी जैसी पवित्र नगरी में भगवान की कृपा की कामना करनी चाहिए। उन्होंने राम नाम को ऐसा आध्यात्मिक सहारा बताया, जो कठिन समय में भी मनुष्य को विश्वास और शांति प्रदान कर सकता है। उन्होंने अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ लोग उनसे अपने ऊपर भी राम नाम लिखने का आग्रह करते हैं। बापू ने इस प्रसंग के जरिए राम नाम के प्रति श्रद्धा और उसके आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित किया।
भक्तों के मुख पर राम नाम लाना ही कथा का उद्देश्य
मोरारी बापू ने मां और बच्चे के संबंध का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह मां अपने बच्चे को दूध पिलाने के लिए अलग-अलग उपाय करती है, उसी तरह संत भी अनेक तरीकों से लोगों को भगवान के नाम से जोड़ने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कहा कि कथा का उद्देश्य केवल धार्मिक प्रसंग सुनाना नहीं, बल्कि लोगों के हृदय में भक्ति, प्रेम और सद्भाव की भावना जगाना है। यदि कथा सुनने के बाद किसी व्यक्ति के मुख पर राम नाम आ जाए और उसके मन में अच्छे विचार उत्पन्न हों, तो यह भी आध्यात्मिक प्रयास की सार्थकता है। कालडि में आयोजित श्रीराम कथा के दूसरे दिन मोरारी बापू का मुख्य संदेश मन की शुद्धि, कथा के प्रति एकाग्रता, गुरु में विश्वास, स्वस्ति की भावना और राम नाम के निरंतर स्मरण पर केंद्रित रहा। भारत स्वस्तिक यात्रा के माध्यम से उन्होंने आध्यात्मिक चेतना और लोककल्याण के विचार को आगे बढ़ाने का संदेश दिया।
- परविंदर कुमार, पत्रकार
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