3rd day of Shardiya Navratri 2026: साधक के लिए अत्यंत सजगता का समय है नवरात्रि का तीसरा दिन, जानिए मां चंद्रघंटा को प्रसन्न करने का शास्त्रीय पूजा-विधान

Edited By Updated: 13 Oct, 2026 12:34 PM

3rd day of shardiya navratri 2026

3rd day of Shardiya Navratri 2026: नवरात्रि के तीसरे दिन करें मां चंद्रघंटा की पूजा। जानिए मां के दसों हाथों के अस्त्र-शस्त्र, महिषासुर वध की पौराणिक कथा, प्रिय भोग, दूध-केसर स्नान की विशेष विधि और आध्यात्मिक महत्व।

3rd day of Shardiya Navratri 2026: मां दुर्गा जी की तीसरी शक्ति का नाम “चंद्रघंटा” है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं और प्रत्येक हाथ में खड्ग, बाण आदि शस्त्र-अस्त्र सुशोभित हैं। इनका वाहन सिंह है और इनकी मुद्रा युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहने की होती है। इनके घंटे की भयानक ध्वनि से दुष्ट दानव, दैत्य और राक्षस सदैव भयभीत रहते हैं। मान्यता है कि मां चन्द्रघण्टा की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंध का अनुभव होता है और अनेक प्रकार की दिव्य ध्वनियां सुनाई देती हैं। यह समय साधक के लिए अत्यंत सावधानी और सजगता के होते हैं।

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मां चंद्रघंटा की विशेष पूजा विधि का महत्व
माता रानी के नौ रूप होते हैं, जिन्हें नवरात्रि में पूजा जाता है। मां अंबे के हर एक रूप की एक अलग महिमा बताई गई है। माता के इन नौ स्वरूपों की पूजा करके साधक जीवन में शक्ति, साहस, निडरता, लीडरशिप जैसे गुणों की प्राप्ति कर सकता है। हर शक्ति को पूजने की एक विधि है, जिसमें उनके प्रिय भोग, नियम और सावधानियां बताई गई हैं ताकि साधक को अपनी पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। इसी तरह मां चंद्रघंटा की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाना शुभ माना जाता है। अगर घर में मूर्ति स्थापित है तो उसे दूध, केसर और केवड़े के जल से स्नान कराना चाहिए। इसके बाद सफेद कमल या पीले गुलाब अर्पित कर विधिवत पूजा की जाती है, जिससे देवी की कृपा प्राप्त होती है। 

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मां चंद्रघंटा का स्वरूप
देवी भागवत पुराण के अनुसार, मां चंद्रघंटा का शरीर सोने के समान चमकीला है। उनके दस हाथ हैं, जिनमें वे धनुष, बाण, तलवार, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं। वे सिंह (शेर) पर सवार हैं, जो साहस का प्रतीक है। मां का यह रूप हमें सिखाता है कि शांत रहते हुए भी अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

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मां चंद्रघंटा की व्रत कथा 
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब महिषासुर ने अपनी अपार शक्ति के बल पर तीनों लोकों में उत्पात मचाना शुरू किया, तब उसका अहंकार इतना बढ़ गया कि उसने स्वयं को अजेय मान लिया। उसने इंद्रदेव को परास्त कर स्वर्ग लोक पर अधिकार कर लिया और देवताओं को चारों ओर से त्रस्त कर दिया। उसके अत्याचार से न केवल देवता बल्कि मानव और ऋषि-मुनि भी भयभीत रहने लगे। चारों ओर हाहाकार मच गया और धर्म-व्यवस्था पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई। इस संकट की घड़ी में सभी देवता एकत्र होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे। उन्होंने महिषासुर के आतंक और अत्याचारों की कथा सुनाई। देवताओं की पीड़ा सुनकर त्रिदेव अत्यंत क्रोधित हो उठे। उनके क्रोध की ज्वाला से उनके मुखमंडल से एक प्रचंड और दिव्य ऊर्जा प्रकट हुई। यह ऊर्जा तेजोमय प्रकाश के रूप में एकत्रित होकर एक अद्वितीय और अलौकिक स्वरूप वाली देवी में परिणत हुईं। यही देवी आगे चलकर मां दुर्गा के नाम से विख्यात हुईं।

देवी को युद्ध के लिए सशक्त करने हेतु सभी देवताओं ने अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र उन्हें अर्पित किए। भगवान शंकर ने उन्हें अपना त्रिशूल प्रदान किया, भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र, इंद्रदेव ने दिव्य घंटा, सूर्य ने तेज और तलवार दी। वायु देव ने उन्हें वेग, वरुण देव ने शंख, अग्निदेव ने शक्ति, यमराज ने गदा और कुबेर ने अमोघ अस्त्र दिए। अन्य देवताओं ने भी अपनी-अपनी शक्तियां और शस्त्र मां को अर्पित कर उन्हें अद्वितीय सामर्थ्य से संपन्न किया। साथ ही, हिमालय ने देवी को सिंह रूपी दिव्य वाहन प्रदान किया, जिससे वे रणभूमि की ओर प्रस्थान कर सकें।

सभी दिव्य शक्तियों से सुसज्जित होकर मां दुर्गा ने मां चंद्रघंटा के रूप में प्रकट होकर महिषासुर को ललकारा। एक ओर असुरों की विशाल सेना थी और दूसरी ओर मां का अद्वितीय तेज। युद्ध कई दिनों तक चलता रहा। अंततः मां ने अपने त्रिशूल और अन्य दिव्य अस्त्रों के प्रभाव से महिषासुर का वध कर दिया।

महिषासुर के वध के पश्चात देवताओं और ऋषि-मुनियों ने देवी का धन्यवाद किया और उनकी स्तुति की। देवताओं को उनके भय से मुक्ति मिली और तीनों लोकों में शांति और धर्म की पुनः स्थापना हुई। इस प्रकार, मां दुर्गा ने न केवल महिषासुर के आतंक से मुक्ति दिलाई, बल्कि यह संदेश भी दिया कि जब-जब अधर्म और अत्याचार बढ़ेगा, तब-तब दिव्य शक्ति धर्म और सत्य की रक्षा के लिए अवश्य अवतरित होगी। सभी दिव्य शक्तियों से सुसज्जित होकर मां दुर्गा ने मां चंद्रघंटा के रूप में प्रकट होकर महिषासुर को ललकारा। एक ओर असुरों की विशाल सेना थी और दूसरी ओर मां का अद्वितीय तेज। युद्ध कई दिनों तक चलता रहा। अंततः मां ने अपने त्रिशूल और अन्य दिव्य अस्त्रों के प्रभाव से महिषासुर का वध कर दिया।

महिषासुर के वध के पश्चात देवताओं और ऋषि-मुनियों ने देवी का धन्यवाद किया और उनकी स्तुति की। देवताओं को उनके भय से मुक्ति मिली और तीनों लोकों में शांति और धर्म की पुनः स्थापना हुई। इस प्रकार, मां दुर्गा ने न केवल महिषासुर के आतंक से मुक्ति दिलाई, बल्कि यह संदेश भी दिया कि जब-जब अधर्म और अत्याचार बढ़ेगा, तब-तब दिव्य शक्ति धर्म और सत्य की रक्षा के लिए अवश्य अवतरित होगी।

यूपी रत्न विभूषित, ज्योतिषाचार्य 
महंत पं. सुधांशु तिवारी 
मुख्य प्रवक्ता व टीवी पैनलिस्ट
संपर्क सूत्र - 9005804317, 7054594317

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