Edited By Rahul Singh,Updated: 12 Oct, 2026 06:25 PM

हूती यमन को अंसार अल्लाह के नाम से भी जाना जाता है, जोकि एक सशस्त्र राजनीतिक और धार्मिक आंदोलन है। यह संगठन 1990 के दशक में सामने आया था। इसकी जड़ें जैदी शिया समुदाय के धार्मिक और सामाजिक आंदोलन से जुड़ी हैं।
मिडिल ईस्ट : यमन में सक्रिय हूती संगठन ने मिडिल ईस्ट में में अपना कहर भरपाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यहां जब भी हालात खराब होते हैं तो हूती विद्रोही का नाम सबसे आगे आता है। फिलहाल हूतियों ने सउदी अरब के नामी एयरपोर्ट पर हवाई हमले करके अशांति फैलाने का काम किया है। हमले में रियाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के 2 टर्मिनल तबाह हो गए हैं। हूती फाइटर्स ने रियाद के अलावा दम्माम और घावर तेल-गैस फील्ड पर भी अटैक किया है। साथ ही किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर मिसाइल हमले में 13 लोगों की मौत हो गई, 300 से ज्यादा घायल हो गए जिसके सीसीटीवी फुटेज भी सामने आए हैं। आखिर हूती कौन हैं और क्यों वो हमला कर रहे हैं? आइए जानें इसका इतिहास और ईरान से कनेक्शन का असली मकसद...
आखिर कौन हैं हूती यमन?
हूती यमन को अंसार अल्लाह के नाम से भी जाना जाता है, जोकि एक सशस्त्र राजनीतिक और धार्मिक आंदोलन है। यह संगठन 1990 के दशक में सामने आया था। इसकी जड़ें जैदी शिया समुदाय के धार्मिक और सामाजिक आंदोलन से जुड़ी हैं। जब इसका उदय हुआ था इनका मकसद अपने समुदाय के अधिकारों और राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने की मांग कर रहा था। लेकिन धीरे-धीरे इसका तत्कालीन यमनी सरकार के साथ संघर्ष बढ़ता गया और इसने एक सशस्त्र संगठन का रूप ले लिया। इसके बाद हूतियों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और यमन सरकार पर दवाब बनाना शुरू कर दिया। फिर 2014 में हूतियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया, जिस कारण यमन में गृहयुद्ध और गहरा गया। हूती आज भी देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के बड़े क्षेत्र पर अपना कंट्रोल रखते हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार का प्रभाव दूसरे क्षेत्रों में है। हूतियों का मकसद यमन की सत्ता पर अपना कब्जा बनाए रखना और मध्य पूर्व की राजनीति में अपनी धाक जमाना है।

सऊदी अरब से क्यों है दुश्मनी ?
2015 में सऊदी अरब ने यमन की सरकार की मदद के लिए हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई शुरू की थी। सऊदी अरब को डर था कि उसकी सीमा के पास ईरान की मदद से चलने वाला यह गुट बहुत ताकतवर हो रहा है। इसके बाद दोनों के बीच सालों तक जंग चली। बीच-बीच में बातचीत करके शांति बनाने की कोशिशें भी हुईं, लेकिन दोनों को एक-दूसरे पर भरोसा नहीं था। हूतियों की नजर में सऊदी अरब उनके दुश्मनों का सबसे बड़ा मददगार है। वहीं, सऊदी अरब हूतियों को अपनी देश की सुरक्षा और शांति के लिए एक बड़ा खतरा मानता है।
हूतियों का ईरान से क्या है रिश्ता?
हूतियों और ईरान के बीच गहरा राजनीतिक और सैन्य संबंध है। ईरान हूतियों का सबसे बड़ा मददगार माना जाता है, जिसने उन्हें हथियार और सैन्य ताकत बढ़ाने में मदद की है। मध्य पूर्व में ईरान के कई सहयोगी संगठन हैं—जैसे लेबनान में हिजबुल्लाह और यमन में हूती। लेकिन हूती सिर्फ ईरान के इशारे पर चलने वाली कठपुतली नहीं हैं; उनके अपने स्थानीय हित और यमन पर राज करने के अपने मकसद भी हैं। फिर भी, ईरान के साथ जुड़ाव की वजह से यमन की यह लड़ाई एक बड़े क्षेत्रीय विवाद का रूप ले लेती है।

हूती लाल सागर में जहाजों पर हमले क्यों करते हैं?
यमन की भौगोलिक स्थिति बहुत खास है—यह लाल सागर और 'बाब अल-मंदेब' जलडमरूमध्य के पास बसा है। यह रास्ता यूरोप और एशिया के बीच समुद्री व्यापार का मुख्य केंद्र है। जब हूती यहाँ से गुजरने वाले जहाजों पर हमले करते हैं, तो शिपिंग कंपनियों को सुरक्षा के लिए अपना रास्ता बदलना पड़ता है। उन्हें अफ्रीका के चक्कर लगाकर लंबा रास्ता चुनना पड़ता है, जिससे तीन बड़ी समस्याएं आती हैं- किराया और लागत बढ़ना, सामान पहुंचने में देरी और महंगाई का खतरा।
हूतियों के पास इतनी ताकत कहाँ से आई?
यमन में सालों से चल रहे गृहयुद्ध के दौरान हूतियों ने खुद को मजबूत किया। इसमें ईरान से मिली तकनीक, हथियार और ड्रोन का बड़ा हाथ रहा। आज हूतियों के पास ऐसे सस्ते ड्रोन और मिसाइलें हैं, जिनसे वे यमन की सीमा के पार भी हमला कर सकते हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि एक छोटी सी सेना भी सस्ती तकनीक का इस्तेमाल करके दुनिया की बड़ी और आधुनिक सेनाओं की नाक में दम कर सकती है। ताकत के दम पर इन्होंने अमेरिका और इज़राइल पर भी मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं। इसके जवाब में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने लाल सागर में अपने जहाजों की सुरक्षा बढ़ाई और यमन में हूतियों के ठिकानों पर हवाई हमले भी किए थे। हूतियों का कहना है कि अमेरिका और इज़राइल उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं। इस वजह से यमन का अंदरूनी झगड़ा अब अमेरिका, इज़राइल, ईरान और सऊदी अरब के बीच एक बड़े युद्ध का हिस्सा बन चुका है।

हूतियों की दहशत से पड़ेगा भारत पर असर
हूती अगर नहीं रुकते हैं तो इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा क्योंकि भारत का बहुत सारा अंतरराष्ट्रीय व्यापार लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते ही होता है। अगर इस रास्ते पर खतरा बढ़ता है तो भारतीय व्यापारियों का नुकसान होगा और माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी और सामान देर से पहुंचेगा। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल बाहर से खरीदता है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने से पेट्रोल-डीजल और तेल महंगा हो सकता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।