Edited By Niyati Bhandari,Updated: 09 Jun, 2026 11:53 AM

Inspirational Story: पढ़िए थुलथुल चुहिया और उसकी सहेली चुनमुन की यह रोचक कहानी, जो हमें सिखाती है कि जीवन में बिना परिश्रम के कुछ हासिल नहीं होता और स्वस्थ रहने के लिए मेहनत कितनी जरूरी है।
Interesting Story: थुलथुल चुहिया को बस एक ही चिंता सताती रहती कि उसको कल खाना मिलेगा या नहीं। उसे भोजन के लिए इधर-उधर भागना बिल्कुल पसंद नहीं था। उसकी इच्छा तो बस इतनी-सी थी कि उसे घर बैठे ही पेट भर खाना मिल जाए।

एक दिन उसने यह समस्या अपनी सहेली चुनमुन चुहिया को बताई। चुनमुन ने कहा, ‘‘बस इतनी-सी बात! चलो मैं अभी तुम्हारी समस्या का समाधान कर देती हूं पर तुम्हें मेरी बात माननी होगी।’’
थुलथुल ने उतावली होकर पूछा, ‘‘क्या?’ क्या करना होगा?’’
चुनमुन बोली, ‘‘तुम्हें वहां के चूहों से हमेशा सावधान रहना होगा।’’
‘‘वह कैसे...?’’

‘‘अरे कुछ नहीं, डरो मत बस वहां मेरी और सहेलियां भी रहती हैं, सभी बहुत चपल चालाक हैं। तुम्हें भी उन्हीं की तरह बिल्ली से हर समय सावधान रहना होगा। कभी-कभी बिल्ली दो-दो दिन तक वहीं डटी रहती है, तुम्हें भी भूख का मुकाबला करने की आदत डालनी होगी, संभव है कभी तेजी से दौड़ना भी पड़े। क्या तुम वहां पर रह पाओगी?’’
थुलथुल चुहिया तुरंत बोली, ‘‘न... बाबा... न! मैं नहीं जाऊंगी ऐसी जगह जहां दिन भर डर-डर कर रहना पड़े और मुझसे तो ज्यादा तेज भागा भी नहीं जाता।’’
चुनमुन ने सोचा कि चलो कोई दूसरी जगह दिखा देंगे इसे जहां वह आराम से रह सके। कुछ दिन बाद चुनमुन को एक सही जगह नजर आई तो वह दौड़ी-दौड़ी थुलथुल के पास आई बोली, ‘‘मिल गई मुझे तुम्हारे लिए अनुकूल जगह, चलो मेरे साथ।’’
फिर क्या था दोनों सखियां चल पड़ीं। चुनमुन ने अपनी सहेली को एक गोदाम दिखाते हुए कहा, ‘‘देखो तुम यहां आराम से रहना, रहने के लिए जगह भी ठीक है, सुरक्षित है। यहां खाना भी है और पीने का पानी भी है, अब तुम यहां आराम से रहोगी।’’

खुशी-खुशी थुलथुल ने हामी भरी। उसको तो जैसे मुंह मांगी मुराद ही मिल गई थी। उसका मानना था कि ‘अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काज, दास मलूका कह गए सबके दाता श्रीराम।’
गोदाम में ढेरों अनाज था जो बिखर कर उसके बिल की ओर आता रहता और थुलथुल बैठी आराम से खाती रहती, नाली में ढेर-सा पानी बहता जिसे पी कर अपनी प्यास बुझा लेती। अब उसका जीवन आराम से कटने लगा था।
कुछ दिन बाद चुनमुन जब थुलथुल से मिलने गोदाम पर गई तो वह उसका हाल देखकर दंग रह गई- ‘अरे... कितनी मोटी हो गई थी...थुलथुल!’
उसे तो अपनी सहेली की चिंता सताने लगी। उसने उसको मोटापे के नुकसान से सावधान किया और वजन पर नियंत्रण की सलाह भी दी पर थुलथुल ने ध्यान ही नहीं दिया उसकी बात पर, उल्टे वही ‘अजगर वाली कहावत’ वापस दोहरा दी। सहेली को मोटापे से बचाने के लिए चुनमुन ने उपाय खोज निकाला। उसने थुलथुल को बताए बगैर बिल के रास्ते को संकरा कर दिया, जिससे अनाज की मात्रा कम आए।

अकेलेपन से परेशान थुलथुल ने बाहर सैर पर जाने की सोची तो उसने बिल से बाहर निकलने का बहुत प्रयास किया पर वह इतनी मोटी हो गई थी कि उससे बाहर ही नहीं आया गया। अब बिखर कर कुछ दाने ही अनाज के आते और उनसे ही संतोष करना पड़ता। इस तरह से थुलथुल का वजन कम होने लगा था और उसे ज्यादा तकलीफ भी नहीं हुई।
थुलथुल को इसका पता तब चला जब उसने सैर के लिए बाहर निकलने का मन बनाया और निश्चय किया कि आज तो चाहे दम ही लगाना पड़े मैं इस बिल से बाहर निकल कर ही रहूंगी और उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, ‘‘अरे! मैं तो बिना प्रयास ही बाहर आ गई।’’ खुशी के मारे चीख निकल गई थुलथुल की।
सामने से आती चुनमुन ने उसे कहा, ‘‘देख थुलथुल भगवान ने हमें खाना खाने के लिए भूख दी है, पेट दिया है, उसके साथ ही काम करने के लिए हाथ भी दिए हैं, उसके कारण ही तो हम भोजन पचाते हैं और हम स्वस्थ रहते हैं। मनुष्य हो या जानवर, पक्षी या कीट सभी अपनी-अपनी तरह से हाथ-पांव हिलाकर अपना भोजन पचाते हैं समझी!’’ और दोनों सहेलियां खिल-खिला कर हंस पड़ीं।