Edited By Sarita Thapa,Updated: 02 Aug, 2026 11:09 AM

एक बार महात्मा गांधी चरखे पर सूत कातने के बाद उसे लपेटने ही वाले थे कि उन्हें एक आवश्यक कार्य के लिए बुला लिया गया। गांधी जी वहां से जाते समय आश्रम के साथी सुबैया से बोले, 'मैं पता नहीं कब लौटूं, तुम सूत 'लपेटे' पर उतार लेना, तार गिन लेना और...
Mahatma Gandhi Story : एक बार महात्मा गांधी चरखे पर सूत कातने के बाद उसे लपेटने ही वाले थे कि उन्हें एक आवश्यक कार्य के लिए बुला लिया गया। गांधी जी वहां से जाते समय आश्रम के साथी सुबैया से बोले, ''मैं पता नहीं कब लौटूं, तुम सूत 'लपेटे' पर उतार लेना, तार गिन लेना और प्रार्थना के समय से पहले मुझे बता देना।''
सुबैया बोला, 'जी बापू, मैं कर लूंगा।' इसके बाद गांधी जी चले गए।
प्रार्थना के समय आश्रमवासियों की हाजिरी होती थी। उस समय किस व्यक्ति ने कितने सूत के तार काते हैं, यह पूछा जाता था। उस सूची में सबसे पहला नाम गांधी जी का था। जब उनसे उनके सूत के तारों की संख्या पूछी गई तो वह चुप हो गए। उन्होंने सुबैया की ओर देखा। सुबैया ने सिर झुका लिया। हाजिरी समाप्त हो गई। प्रार्थना समाप्त होने के बाद गांधीजी कुछ देर के लिए आश्रमवासियों से बातें किया करते थे। उस दिन वह काफ़ी गंभीर थे। उन्हें देखकर लग रहा था जैसे कि उनके भीतर कोई गहरी वेदना है।
उन्होंने दुख भरे स्वर में कहना शुरू किया, ''मैंने आज सुबैया से कहा था कि मेरा सूत उतार लेना और मुझे तारों की संख्या बता देना। मैं मोह में फंस गया। सोचा था, सुबैया मेरा काम कर लेंगे, लेकिन यह मेरी भूल थी। मुझे अपना काम स्वयं करना चाहिए था। सुबैया का इसमें कोई दोष नहीं, दोष मेरा है। मैंने क्यों अपना काम उनके भरोसे छोड़ा?
इस भूल से मैंने सीख ली है कि हमें दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।'' गांधी जी की बात सुनकर सुबैया को बड़ा पछतावा हुआ और उन्होंने निश्चय किया कि यदि आगे से वह कोई जिम्मेदारी लेंगे तो उसे अवश्य समय पर पूरा करेंगे।

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