Edited By Niyati Bhandari,Updated: 23 May, 2026 11:38 AM

सुखी जीवन के सूत्र
सुखी जीवन के चार सूत्र हैं। पहला : वस्तु का ‘आग्रह’ मत करो। जो मिले उसे प्रसाद समझकर स्वीकार कर लो।
सुखी जीवन के सूत्र
सुखी जीवन के चार सूत्र हैं। पहला : वस्तु का ‘आग्रह’ मत करो। जो मिले उसे प्रसाद समझकर स्वीकार कर लो।
दूसरा : जुबान में ‘विग्रह’ मत करो क्योंकि मुख से एक गलत शब्द निकल जाए तो रामायण होते-होते महाभारत हो जाता है।
तीसरा : सम्पत्ति के लिए ‘परिग्रह’ मत करो, क्योंकि अति परिग्रह और अति परिचय अंतत: दुख का कारण बनता है।
चौथा : किसी भी व्यक्ति के प्रति ‘पूर्वाग्रह’ से ग्रसित होकर व्यवहार मत करो क्योंकि रात भर में दोस्त दुश्मन और दुश्मन दोस्त बन सकता है।
मां-बाप : सबसे बड़े देवता
अगर आप बेटे हैं तो मेरी तीन बातें ध्यान में रखिए।
पहली बात : मां-बाप तुम्हारे लिए सबसे बड़े देवता हैं, उनकी दुआएं और आशीर्वाद लेना मत भूलना।
दूसरी बात : मां-बाप की सेवा स्वयं करना, क्योंकि पत्नी से प्रेम करने और मां-बाप की सेवा करने के लिए नौकर नहीं रखे जाते।
तीसरी बात : मां-बाप की जो कमाई है उसे दान-धर्म में खर्च करना, अपने उपयोग में नहीं लाना क्योंकि मां-बाप की कमाई तुम्हारे लिए ‘बहन’ जैसी है और बहन का उपभोग नहीं किया जाता। उसका तो ‘कन्या-दान’ ही होता है।

सद्गुरु का साथ
चींटी बहुत छोटा जीव है। घर-आंगन की छोटी-छोटी यात्रा में ही उसका पूरा दिन चला जाता है। चींटी को अगर पूना से चलकर दिल्ली जाना हो तो कितने दिन लगेंगे, हम कल्पना कर सकते हैं लेकिन वही नन्ही-सी चींटी यदि किसी व्यक्ति का पल्ला पकड़ ले या किसी व्यक्ति के वस्त्रों पर चढ़ जाए और वह व्यक्ति दिल्ली जाने वाली ट्रेन में जा बैठे तो बिना प्रयास के चींटी अगले दिन दिल्ली पहुंच जाती है। इसी प्रकार सद्गुरु का पल्ला पकड़कर हम भी भव-सागर की दुर्गम यात्रा बिना प्रयास के पूरी कर सकते हैं।
