Edited By Niyati Bhandari,Updated: 25 Jun, 2026 11:12 AM

Nirjala Ekadashi Vrat Katha: सनातन धर्म में निर्जला एकादशी को सभी 24 एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए भगवान विष्णु का व्रत करता है, उसे वर्षभर की सभी एकादशियों का फल...
Nirjala Ekadashi 2026 Vrat Katha: सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी को सबसे कठिन और फलदायी माना गया है। इसे 'मोक्षदायिनी एकादशी' भी कहा जाता है, क्योंकि यह मात्र एक दिन के कठिन तप से पूरे वर्ष की 24 एकादशियों का पुण्य फल प्रदान करती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस व्रत की शुरुआत पांडु पुत्र भीमसेन की एक जिज्ञासा और महर्षि वेदव्यास के अमूल्य सुझाव से हुई थी। आइए जानते हैं, कैसे 'गदाधारी भीम' ने अपनी भूख पर विजय पाकर इस महान व्रत को सिद्ध किया और क्यों इसे 'भीमसेनी एकादशी' के नाम से जाना जाता है।
निर्जला एकादशी व्रत संबंधी महाभारत काल की एक प्रसिद्ध कथा इस प्रकार है :
एक बार पाण्डु पुत्र भीम सेन ने श्रील वेदव्यास जी से पूछा," हे परम पूजनीय विद्वान पितामह! मेरे परिवार के सभी लोग एकादशी व्रत करते हैं व मुझे भी करने के लिए कहते हैं। किन्तु मुझ से भूखा नहीं रहा जाता। आप कृपा करके मुझे बताएं कि उपवास किए बिना एकादशी का फल कैसे मिल सकता है?"
श्रील वेदव्यास जी बोले,"पुत्र भीम ! यदि आपको स्वर्ग बड़ा प्रिय लगता है, वहां जाने की इच्छा है और नरक से डर लगता है तो हर महीने की दोनों एकादशी को व्रत करना ही होगा।"

भीम सेन ने जब ये कहा कि यह उनसे नहीं हो पाएगा तो श्रील वेद व्यास जी बोले,"ज्येष्ठ महीने के शुल्क पक्ष की एकादशी को व्रत करना। उसे निर्जला कहते हैं। उस दिन अन्न तो क्या, पानी भी नहीं पीना। एकादशी के अगले दिन प्रातः काल स्नान करके, स्वर्ण व जल दान करना। वह करके पारण के समय (व्रत खोलने का समय) ब्राह्मणों व परिवार के साथ अन्नादि ग्रहण करके अपने व्रत को विश्राम देना। जो एकादशी तिथि के सूर्योदय से द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक बिना पानी पीए रहता है तथा पूरी विधि से निर्जला व्रत का पालन करता है, उसे साल में जितनी एकादशियां आती हैंं उन सब एकादशियों का फल इस एक एकादशी का व्रत करने से सहज ही मिल जाता है।"
यह सुनकर भीम सेन उस दिन से इस निर्जला एकादशी के व्रत का पालन करने लगे और वे पाप मुक्त हो गए। इस एकादशी को पांडव एकादशी, भीम एकादशी, भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
