Premanand Maharaj Viral Video: भजन में मन न लगे तो क्या करें? महाराज का जवाब हुआ वायरल

Edited By Updated: 21 Jan, 2026 09:25 AM

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Premanand Maharaj Ke Pravachan: अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले भक्तों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि जब मन भजन या नाम जप में नहीं लगता, तो क्या करना चाहिए? कई लोग मानते हैं कि यदि सुख-सुविधाएं बेहतर हों, वातावरण शांत हो और साधन पूरे हों, तभी...

Premanand Maharaj Ke Pravachan: अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले भक्तों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि जब मन भजन या नाम जप में नहीं लगता, तो क्या करना चाहिए? कई लोग मानते हैं कि यदि सुख-सुविधाएं बेहतर हों, वातावरण शांत हो और साधन पूरे हों, तभी भक्ति ठीक से हो सकती है। लेकिन वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज ने इस सोच को पूरी तरह बदल देने वाला गहरा आध्यात्मिक संदेश दिया है।

हाल ही में उनके एक प्रवचन का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने इस विषय पर भक्तों की दुविधा को बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों में समझाया।

भक्त का सवाल: सुविधा होती तो भजन और अच्छा होता?

प्रवचन के दौरान एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज से पूछा कि “मन कहता है कि अगर व्यवस्था अच्छी होती, सुविधाएं ज्यादा होतीं, तो भजन और अच्छे से हो पाता।”

यह सवाल आज के समय में लगभग हर साधक के मन में उठता है। इस पर प्रेमानंद महाराज ने जो उत्तर दिया, वह केवल जवाब नहीं बल्कि भक्ति का मूल सिद्धांत है। असुविधा में ही जागता है सच्चा भक्ति भाव।

प्रेमानंद महाराज ने कहा कि मन अक्सर हमें यह भ्रम देता है कि सुख-सुविधाएं मिलने पर भक्ति बेहतर होगी, जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। उन्होंने कहा, “जब व्यक्ति अभाव में होता है, तब उसका भगवान से जुड़ाव सबसे गहरा होता है।”

महाराज ने उदाहरण देते हुए बताया कि जब किसी के पास केवल सूखी रोटी और साधारण सब्जी होती है, तो वह प्रभु को भोग लगाते समय भावुक हो उठता है और कहता है, ‘प्रभु, मैं गरीब हूं, मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है।’

यही दीनता और विनम्रता भगवान को सबसे प्रिय होती है।

सुविधा से जन्म लेता है अहंकार
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, जब व्यक्ति के पास अधिक धन और साधन आ जाते हैं और वह भगवान को भव्य भोग अर्पित करता है, तो अनजाने में मन में अहंकार आ जाता है, “मैं इतना कुछ कर रहा हूं।”

उन्होंने स्पष्ट कहा कि भगवान को छप्पन भोग की आवश्यकता नहीं, उन्हें केवल भक्त का भाव चाहिए। सुविधा यदि सावधानी से न संभाली जाए, तो वह भक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है।

कठिन समय में ईश्वर का साक्षात्कार
महाराज ने एक मार्मिक बात कही, जब कोई भूखा व्यक्ति अचानक किसी के द्वारा भोजन पा जाता है, तो उसे उसमें ईश्वर का साक्षात अनुभव होता है। उस क्षण मनुष्य का भरोसा केवल भगवान पर होता है, न कि व्यवस्था या साधनों पर। यही स्थिति सच्ची भक्ति को जन्म देती है।

संपन्न लोग कैसे करें सच्ची भक्ति?
प्रेमानंद महाराज ने यह भी स्पष्ट किया कि धन होना भक्ति में बाधा नहीं है, लेकिन उससे जुड़ा अहंकार बाधक है।
उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास जी की पंक्तियों का उल्लेख किया, “नाथ सकल संपदा तुम्हारी, मैं सेवक समेत सुत नारी।”

अर्थात व्यक्ति को स्वयं को संपत्ति का स्वामी नहीं, बल्कि भगवान का सेवक मानना चाहिए। जैसा अन्न, वैसा भजन

भोजन और भक्ति के संबंध पर प्रेमानंद महाराज ने एक कठोर लेकिन सच्चा संदेश दिया। उन्होंने कहा, जिसका भोजन जितना अधिक विलासी और स्वादिष्ट होगा। उसका भजन उतना ही फीका हो सकता है। जो व्यक्ति रूखा-सूखा खाकर संतोष रखता है, वह भगवान के चरणों में अधिक गहराई से उतर पाता है।

भक्तों के लिए महाराज की सीख
प्रेमानंद महाराज ने भक्तों को अंतिम संदेश देते हुए कहा कि परिस्थिति बदलने की चिंता न करें। व्यवस्था के पीछे न भागें केवल नाम जप और भक्ति पर ध्यान दें। यदि कोई व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भजन करना सीख गया, तो अनुकूल समय आने पर भी वह कभी अपने मार्ग से विचलित नहीं होगा।

प्रेमानंद महाराज का संदेश स्पष्ट है- भक्ति सुविधाओं की मोहताज नहीं होती। सच्चा भजन वही है, जो अभाव, विनम्रता और समर्पण से किया जाए। जब मन भगवान के नाम में रम जाता है, तब व्यवस्था अपने आप पीछे छूट जाती है।

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