Edited By Niyati Bhandari,Updated: 02 Jun, 2026 12:52 PM

Sant Prahlad Jani, Chunriwale Mataji News: जानें गुजरात के प्रसिद्ध संत प्रह्लाद जानी (चुनरी वाले माताजी) की अनसुनी कहानी, जिन्होंने 76 साल तक बिना भोजन और पानी के जीवित रहकर विज्ञान को चुनौती दी। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के परीक्षणों...
Sant Prahlad Jani, Chunriwale Mataji News: वर्तमान समय में जहां चिकित्सा विज्ञान आए दिन कुछ न कुछ नया चमत्कार कर रहा है। वहीं आज भी कुछ ऐसे गुप्त राज हैं, जो अभी भी वैज्ञानिकों को मात दे रहे हैं। उनकी समझ से परे हैं भारत के गुजरात जिले के संत प्रह्लाद जानी (चुनरी वाले माताजी) की अनसुनी गाथा। जो उनके जीवनकाल से लेकर मृत्यु प्राप्त करने तक रहस्य ही बना हुआ है। मानो या न मानो ये हकीकत है, कोई अफसाना नहीं है। गुजरात के इन संत ने अपने जीवनकाल के 76 वर्षों तक बिना कुछ खाए और बिना एक बूंद पानी का पिए जीवनयापन किया।
कौन थे चुनरी वाले माताजी?
13 अगस्त 1929 को गुजरात के मेहसाणा जिले के चराड़ा गांव में जन्मे थे प्रह्लाद जानी। जिन्होंने बहुत ही अल्प आयु में सांसारिक मोह-माया का त्याग कर देवी महामाया की भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया। सदैव लाल रंग की चुनरी धारण करते थे, जिस कारण उनके अनुयायी उन्हें आदर से 'माताजी' बुलाते थे। जिससे वो 'चुनरी वाले माताजी' के नाम से प्रसिद्ध हुए।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन डीआरडीओ (DRDO) ने बंद कमरे में लिया इम्तिहान
जब संत प्रह्लाद जानी के बिना अन्न-जल ग्रहण करने का मामला चर्चित होने लगा तो बहुत सारे लोगों ने इसे कोरा अंधविश्वास माना। जब मामले ने अधिक ही तूल पकड़ी तो ये बात देश-विदेश के वैज्ञानिकों तक जा पहुंची। तब साल 2010 में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ फिजियोलॉजी एंड एलाइड सिपांसेज (DIPAS) की एक टीम ने उन पर 15 दिनों तक गहन परीक्षण किया।
माता जी को एक ऐसे कमरे में रखा गया, जहां हर समय सीसीटीवी कैमरों से उनकी निगरानी होने लगी। यहां तक की विशेषज्ञों ने उनके कई अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे और चिकित्सकीय परीक्षण भी किए।

15 दिन की निगरानी और चौंकाने वाले नतीजे
जब 15 दिन बीत जाने के बाद भी संत प्रह्लाद जानी के शारीरिक स्वास्थ्य पर किसी भी तरह का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा तो वैज्ञानिकों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। इन 15 दिनों के दौरान उन्होंने न तो कुछ खाया, न पिया और न ही मलमूत्र का त्याग किया। वैज्ञानिकों ने इसे मानव शरीर की असाधारण अनुकूलन क्षमता करार दिया, लेकिन उनके जीवित रहने के मूल कारण का सटीक जवाब उन्हें भी नहीं मिल सका।
तालु से टपकता था 'दिव्य रस'!
संत प्रह्लाद जानी अपने मुखारविंद से कहते थे की देवी महामाया के आशीर्वाद से उनके तालु से एक विशेष प्रकार का 'दिव्य रस' निकलता है। जिससे उन्हें अपना शरीर चलाने की अद्भुत ऊर्जा की प्राप्ति होती है। विज्ञान ने उनके कहे अनुसार इस दिव्य रस पर भी शोध किए लेकिन वे इसके विषय में कुछ भी बताने में असमर्थ रहे। यह गुत्थी आज भी रहस्य ही बनी हुई है। सेना के लिए भी यह शोध इसलिए महत्वपूर्ण था ताकि कठिन परिस्थितियों में सैनिकों की कार्यक्षमता को बढ़ाने में मदद मिल सके।
विरासत और महाप्रयाण
90 वर्ष की आयु में 26 मई 2020 को इस रहस्यमयी संत ने अपनी अंतिम सांस ली। उनके निधन के बाद भी उनका जीवन विज्ञान और आध्यात्मिकता के बीच एक सेतु की तरह खड़ा है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि मानव शरीर की सीमाएं आखिर कहां तक हैं।
