Swami Prabhupada : सच्चे भक्त की पहचान क्या है,  श्रीकृष्ण ने बताया कृपा पाने का अचूक मंत्र

Edited By Updated: 24 Jun, 2026 03:43 PM

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नित्य सुख के लिए स्थायी, आनन्दमय धाम प्राप्त करने हेतु बुद्धिमान व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह कृष्णभावनाभावित होकर भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में तत्पर रहे।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:॥9.26॥

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अनुवाद : यदि कोई प्रेम तथा भक्ति के साथ मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल प्रदान करता है, तो मैं उसे स्वीकार करता हूं।

तात्पर्य : नित्य सुख के लिए स्थायी, आनन्दमय धाम प्राप्त करने हेतु बुद्धिमान व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह कृष्णभावनाभावित होकर भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में तत्पर रहे। ऐसा आश्चर्यमय फल प्राप्त करने की विधि इतनी सरल है कि निर्धन से निर्धन व्यक्ति को योग्यता का विचार किए बिना इसे पाने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए एकमात्र योग्यता इतनी ही है कि वह भगवान् का शुद्धभक्त हो। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि कोई क्या है और कहां स्थित है।

यह विधि इतनी सरल है कि यदि प्रेमपूर्वक एक पत्ती, थोड़ा-सा जल या फल ही भगवान को अर्पित किया जाता है तो भगवान् उसे सहर्ष स्वीकार करते हैं। अत: किसी को भी कृष्णभावनामृत से रोका नहीं जा सकता, क्योंकि यह सरल है और व्यापक है। ऐसा कौन मूर्ख होगा जो इस सरल विधि से कृष्णभावनाभावित नहीं होना चाहेगा और सच्चिदानन्दमय जीवन की परम सिद्धि नहीं चाहेगा?

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कृष्ण को केवल प्रेमाभक्ति चाहिए और कुछ भी नहीं। कृष्ण तो अपने शुद्धभक्त से एक छोटा-सा फूल तक ग्रहण करते हैं। किंतु अभक्त से वह कोई भेंट नहीं चाहते। उन्हें किसी से कुछ भी नहीं चाहिए, क्योंकि वह आत्मतुष्ट हैं, तो भी वह अपने भक्त की भेंट प्रेम तथा स्नेह के विनिमय में स्वीकार करते हैं।

कृष्णभावनामृत विकसित करना जीवन का चरमलक्ष्य है। इस श्लोक में भक्ति शब्द का उल्लेख दो बार यह घोषित करने के लिए हुआ है कि भक्ति ही कृष्ण के पास पहुंचने का एकमात्र साधन है। किसी अन्य शर्त से, यथा ब्राह्मण, विद्वान, धनी या महान् विचारक होने से, कृष्ण, किसी प्रकार की भेंट लेने को तैयार नहीं होते। भक्ति ही मूलसिद्धान्त है, जिसके बिना वह किसी से कुछ भी लेने के लिए प्रेरित नहीं किए जा सकते। भक्ति कभी हैतुकी नहीं होती, यह शाश्वत विधि है।  यह परमब्रह्म की सेवा में प्रत्यक्ष कर्म है।

Swami Prabhupada   

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