देर से माता-पिता बनने का निर्णय बढ़ा सकता है चुनौतियाँ : डॉ. निशी सिंह

Edited By Updated: 24 Mar, 2026 04:55 PM

decision to become parents later in life can increase challenges dr nishi singh

भारत के शहरी समाज में करियर और जीवनशैली के कारण देर से माता-पिता बनने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिससे प्रजनन क्षमता पर असर पड़ सकता है। उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं में अंडों की गुणवत्ता घटती है और गर्भधारण कठिन हो सकता है। आधुनिक तकनीकें जैसे आईवीएफ...

दिल्ली : पिछले कुछ वर्षों में भारत के शहरी समाज में परिवार शुरू करने की उम्र धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। उच्च शिक्षा, करियर प्राथमिकताएँ, आर्थिक स्थिरता और बदलती जीवनशैली के कारण कई दंपति पहले की तुलना में अधिक उम्र में माता-पिता बनने का निर्णय ले रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रवृत्ति कुछ मामलों में प्रजनन संबंधी चुनौतियों को भी बढ़ा सकती है। फर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. निशी सिंह, मेडिकल डायरेक्टर, Prime IVF Centre, का कहना है कि उम्र बढ़ने के साथ पुरुष और महिला दोनों की प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है। विशेष रूप से महिलाओं में अंडों की गुणवत्ता और संख्या समय के साथ कम होने लगती है, जिससे प्राकृतिक गर्भधारण की संभावना घट सकती है। डॉ. सिंह बताती हैं, “आज कई दंपति अपने तीसवें दशक के अंत या चालीस की शुरुआत में परिवार की योजना बनाते हैं। ऐसे मामलों में गर्भधारण में अधिक समय लग सकता है और कभी-कभी चिकित्सा सहायता की आवश्यकता भी पड़ सकती है।”

उम्र और प्रजनन क्षमता का संबंध

चिकित्सकीय दृष्टि से महिलाओं की प्रजनन क्षमता उनके शुरुआती तीसवें दशक तक अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती है। इसके बाद अंडाशय की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। यही कारण है कि देर से गर्भधारण की कोशिश करने वाले कई दंपतियों को आईवीएफ जैसी तकनीकों का सहारा लेना पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार उम्र बढ़ने के साथ गर्भपात का जोखिम भी कुछ मामलों में बढ़ सकता है। इसके पीछे मुख्य कारण अंडों की गुणवत्ता में गिरावट और भ्रूण के विकास में संभावित क्रोमोसोमल असामान्यताएँ हो सकती हैं। हालाँकि डॉक्टर यह भी स्पष्ट करते हैं कि हर देर से गर्भधारण करने वाली महिला को समस्या होगी, ऐसा आवश्यक नहीं है। कई महिलाएँ 35 वर्ष के बाद भी स्वस्थ गर्भावस्था का अनुभव करती हैं। अंतर केवल यह है कि ऐसे मामलों में चिकित्सा निगरानी और योजना अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

आधुनिक प्रजनन तकनीकों की भूमिका

फर्टिलिटी चिकित्सा में पिछले दशक में काफी प्रगति हुई है। आज आईवीएफ, आईसीएसआई और भ्रूण चयन जैसी तकनीकों ने उन दंपतियों के लिए नई संभावनाएँ खोल दी हैं जिन्हें प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करने में कठिनाई होती है। डॉ. निशी सिंह के अनुसार, “फर्टिलिटी उपचार का उद्देश्य केवल गर्भधारण कराना नहीं है, बल्कि एक स्वस्थ गर्भावस्था और सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित करना भी है। सही समय पर परामर्श लेने से कई दंपतियों के लिए उपचार अधिक प्रभावी हो सकता है।” विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि यदि कोई दंपति लंबे समय तक परिवार शुरू करने की योजना टालना चाहता है, तो उन्हें अपने प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में समय-समय पर चिकित्सकीय सलाह लेते रहना चाहिए।

जागरूकता और समय पर सलाह महत्वपूर्ण

डॉक्टरों का मानना है कि आज समाज में प्रजनन स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन अभी भी कई दंपति समस्या होने के बाद ही विशेषज्ञ से संपर्क करते हैं। डॉ. सिंह कहती हैं कि यदि किसी दंपति को 12 महीनों तक प्रयास करने के बाद गर्भधारण नहीं होता, तो उन्हें फर्टिलिटी विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। वहीं 35 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए यह अवधि छह महीने तक मानी जाती है।

बदलती जीवनशैली का प्रभाव

चिकित्सक यह भी बताते हैं कि केवल उम्र ही नहीं, बल्कि आधुनिक जीवनशैली भी प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकती है। तनाव, अनियमित दिनचर्या, मोटापा, धूम्रपान और नींद की कमी जैसे कारक भी गर्भधारण की संभावना को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि स्वस्थ आहार, नियमित व्यायाम और समय पर चिकित्सा परामर्श से प्रजनन स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखा जा सकता है।

संतुलित निर्णय की आवश्यकता

डॉक्टरों के अनुसार करियर और परिवार दोनों ही जीवन के महत्वपूर्ण पहलू हैं, और हर व्यक्ति को अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने का अधिकार है। लेकिन इन निर्णयों के साथ प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े वैज्ञानिक तथ्यों को समझना भी उतना ही आवश्यक है। फर्टिलिटी विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर जानकारी और सही मार्गदर्शन से कई दंपति अपने माता-पिता बनने के सपने को सुरक्षित और स्वस्थ तरीके से पूरा कर सकते हैं।

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