यूएस द्वारा नाम वापस लिए जाने के बाद डब्लूएचओ की वैश्विक प्रासंगिकता पर उठे सवाल- क्या भारत अपने पक्ष पर पुनर्विचार करेगा?

Edited By Updated: 13 Mar, 2026 12:01 AM

the us withdrawal raises questions about the who s global relevance

•    विश्व स्वास्थ्य संगठन से यूएस के हटने के बाद डब्लूएचओ की वित्तीय स्थिरता और ग्लोबल हैल्थ लीडरशिप को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं तथा इसकी संरचनागत कमजोरियाँ उजागर हुई हैं।  •    यूएस के हटने से डब्लूएचओ की फडिंग को होगा खतरा, जिससे सुधार, एफिशियंसी...

(वेब डेस्क): हाल ही में यूएस के स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग तथा यूएस डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) से यूएस का नाम वापस लिए जाने की आधिकारिक घोषणा कर दी। यूएस ने अपना नाम इसलिए वापस लिया क्योंकि डब्लूएचओ के सदस्य देशों के अनुचित राजनैतिक प्रभाव से संगठन खुद को स्वतंत्र रखने में असमर्थ पाया गया। इसके बाद पूरे विश्व के देश अब यह आकलन कर रहे हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए घरेलू डिसीज़न मेकिंग में अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य फ्रेमवर्क का क्या प्रभाव होगा।
ग्लोबल हैल्थ सिस्टम में अक्सर राष्ट्रीय संदर्भों को नजरंदाज किया जाता है, एक फ्लेक्सिबल पॉलिसीमेकिंग संभव नहीं हो पाती है तथा नतीजों के बजाय सिद्धांतों को प्राथमिकता दी जाती है। बदलाव के इस दौर में भारत के पास सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की अपनी लंबी परंपरा पर पुनर्विचार करने का अवसर है। भारत ने ऐतिहासिक रूप से स्थानीय प्रमाणों के आधार पर निर्णय लेकर जन-स्वास्थ्य में एक मजबूत नेतृत्व पेश किया है। स्थानीय स्तर पर बनाई गई किफायती जेनेरिक दवाओं से एच.आई.वी/एड्स के इलाज का विस्तार करने से लेकर दुनिया के सबसे बड़े वैक्सीन अभियानों में से एक के लिए CoWIN जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का क्रियान्वयन करने तक भारत ने एक स्वस्थ राष्ट्र का ब्लूप्रिंट सफलतापूर्वक तैयार किया है।

डोनर की प्राथमिकताओं से ग्लोबल पॉलिसी किस प्रकार आकार ले सकती हैं, इसका एक मुख्य उदाहरण तम्बाकू नियंत्रण है। 20 जनवरी, 2025 को प्रेसिडेंट ट्रंप ने डब्लू.एच.ओ से बाहर होने के यूएस के प्लान की घोषणा की थी। इस एक साल लंबी प्रक्रिया के दौरान डब्लूएचओ को अपने सबसे बड़े डोनर से फंड मिलना बंद हो गया। इससे ब्लूमबर्ग फिलॉन्थ्रोपीज़ और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन जैसी समाजसेवी संस्थाओं को आगे आकर विशेष हैल्थ एजेंडा में अपना सहयोग देने का अवसर मिला। प्रभाव के एक तरफ झुकाव से एक बार फिर यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या ग्लोबल फ्रेमवर्क ग्लोबल साउथ की विभिन्न जरूरतों का प्रतिनिधित्व ठीक से करते हैं या नहीं। 

भारत में तम्बाकू की पॉलिसी से प्रदर्शित होता है कि ये ग्लोबल असंतुलन क्या प्रभाव उत्पन्न करते हैं। भारत में तम्बाकू का सेवन करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी आबादी रहती है, जो सबसे अधिक विस्तृत तम्बाकू उत्पादों की सेवन करती है। यहाँ पर 267 मिलियन से अधिक यूज़र्स हैं, जिनमें से अधिकांश धूम्ररहित और असंगठित क्षेत्र के उत्पादों पर निर्भर हैं। पिछले दशक में भारत में डब्लूएचओ के फ्रेमवर्क में तम्बाकू नियंत्रण की नीतियों को अपनाया गया, जो स्थानीय स्तर पर प्रमाण आधारित न होकर बाहरी प्रभावों के अनुरूप थीं।
डब्लूएचओ का अनुपालन करने के लिए भारत ने साल 2019 में प्रोहिबिशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट्स एक्ट (PECA) के तहत सिगरेट के विकल्पों को प्रतिबंधित कर दिया। यह निर्णय लेने से पहले इस मामले में न तो कोई घरेलू अध्ययन किया गया और न ही तुलनात्मक जोखिमों का आकलन किया गया। इन उत्पादों के मामले में प्राप्त होने वाले बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक प्रमाणों को भी नजरंदाज कर दिया गया। नतीजा यह निकला कि भारत में सिगरेट का सेवन करने वाले व्यस्क लोगों को रैगुलेटेड, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित विकल्प उपलब्ध नहीं हो पाए, और उन्हें कम नुकसान वाले ओरिज़नल उत्पादों को चुनने की स्वतंत्रता से वंचित होना पड़ा। इस कमी ने गैरकानूनी बाजारों को बढ़ावा दिया, तथा जन स्वास्थ्य को सबसे निचले पायदान में पहुँचा दिया।

डॉ. लैंसेलॉट मार्क पिंटो, पल्मोनोलॉजिस्ट एवं एपिडेमियोलॉजिस्ट कंसल्टैंट, पी.डी हिंदुजा हॉस्पिटल एवं मेडिकल रिसर्च सेंटर ने कहा, ‘‘हैल्थ पॉलिसी को डेटा पर आधारित होना चाहिए, जो स्थानीय रूप के अनुकूलित, किफायती और सामाजिक नियमों के अनुरूप हो। ओआरएस जैसे सरल से उपाय ने फार्मा लॉबी या हितधारकों के बिना ही जितनी जानें बचाई हैं, उतनी जानें कई दवाईयों ने मिलकर नहीं बचाई हैं। यह इस बात का एक मजबूत उदाहरण है कि स्थानीय समाधानों को प्राथमिकता क्यों दी जानी चाहिए। सीधा प्रतिबंध सिगरेट का सेवन करने वालों को कम नुकसान वाले विकल्पों से वंचित करता है। इसलिए विज्ञान के लिहाज से यह ठीक नहीं है। अब इस दिशा में फंड और डब्लूएचओ के दिशानिर्देशों की कमी होगी, इसलिए हमारे पास स्थानीय शोध को बढ़ाने और शोध के नतीजों के आधार पर पॉलिसी बनाने का अवसर है।’’

प्रोफेसर डॉ कॉन्सटैनटिनोस फर्सालिनोस, कार्डियोलॉजिस्ट और सबसे ज्यादा कोट किए जाने वाले हार्म रिडक्शन शोधकर्ता  ने कहा, "आज भी दुनिया में 1.2 बिलियन धूम्रपान करने वाले हैं और भारत और ब्राज़ील जैसे बड़े देश जोखिम घटाने की रणनीति में शामिल होने के अवसर से वंचित हैं। धूम्रपान करने वालों को कम हानिकारक विकल्पों के उनके अधिकार से वंचित करना एक गंभीर मुद्दा है। इसका विज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि विज्ञान बिल्कुल स्पष्ट है। इससे कई नैतिक सवाल उठते हैं कि धूम्रपान करने वालों को वह क्यों नहीं दिया जाता जिसकी उन्हें ज़रूरत है और जिसके वे हकदार हैं।"

अंतर्राष्ट्रीय वातावरण में बड़े परिवर्तन हो रहे हैं। भारत के पास अपना स्वयं का स्वास्थ्य मॉडल तैयार करने का अवसर है, जो वैज्ञानिक मूल्यांकन, स्थानीय आबादी की वास्तविकताओं, और कम नुकसान वाले विकल्पों का सेवन करने के व्यस्कों के अधिकार पर आधारित हो। घरेलू शोध को मजबूत बनाकर, रैगुलेशन का आधुनिकीकरण करके और पॉलिसी में हितधारकों को शामिल करके जन स्वास्थ्य की एक ऐसी पॉलिसी बनाई जा सकती है, जो भारत की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप हो।

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