Edited By Tanuja,Updated: 05 Aug, 2026 06:33 PM

अमेरिका के 80 हजार से अधिक स्कूलों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि समान उपलब्धता होने पर स्कूलों ने पिता की तुलना में मां को पहला फोन करने की संभावना करीब 1.4 गुना अधिक दिखाई। शोधकर्ताओं के अनुसार, इससे बच्चों की जिम्मेदारियों का मानसिक बोझ...
New York: बच्चों की पढ़ाई और परवरिश से जुड़ी जिम्मेदारियों को लेकर आमतौर पर यह माना जाता है कि समय के साथ पिता भी पहले की तुलना में ज्यादा सक्रिय हुए हैं। लेकिन एक नए शोध ने बच्चों के स्कूल से जुड़े कामों में लैंगिक असमानता की एक ऐसी वजह सामने रखी है, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं जाता। शोध के मुताबिक, कई बार स्कूल खुद अनजाने में माताओं को बच्चों से जुड़ी जिम्मेदारियों का मुख्य व्यक्ति बना देते हैं। इसकी एक वजह यह है कि स्कूल, पिता की तुलना में, माताओं से अधिक बार संपर्क करते हैं।
स्कूल सबसे पहले किसे फोन करते हैं?
शोधकर्ताओं ने यह पता लगाने के लिए अमेरिका में एक बड़ा प्रयोग किया। वर्ष 2022 की गर्मियों में देशभर के 80 हजार से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के प्रधानाचार्यों को एक काल्पनिक परिवार की ओर से ईमेल भेजे गए। ईमेल में बताया गया कि माता और पिता दोनों अपने बच्चे का स्कूल में दाखिला कराने में रुचि रखते हैं। दोनों के नाम और फोन नंबर दिए गए और प्रधानाचार्य से कहा गया कि वे दोनों में से किसी एक से संपर्क कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने अलग-अलग ईमेल में माता-पिता के नाम, भाषा और उपलब्धता की जानकारी बदलकर यह जांचने की कोशिश की कि क्या माता-पिता का लिंग इस बात को प्रभावित करता है कि स्कूल किसे फोन करता है। नतीजे में एक स्पष्ट अंतर सामने आया। जब ईमेल में यह संकेत नहीं था कि माता या पिता में से कोई एक दूसरे से ज्यादा उपलब्ध है, तो मां को पिता की तुलना में पहला फोन मिलने की संभावना करीब 1.4 गुना अधिक थी।
पिता ईमेल भेजें तो भी मां को फोन
जिन प्रधानाचार्यों ने माता-पिता में से किसी एक को फोन किया, उनमें लगभग 60 प्रतिशत ने पहले मां से संपर्क किया, जबकि करीब 40 प्रतिशत ने पिता को फोन किया। यानी दोनों माता-पिता की उपलब्धता समान दिखाई देने के बावजूद स्कूलों ने मां को प्राथमिक संपर्क के रूप में अधिक चुना। शोध में एक और दिलचस्प बात सामने आई। जब ईमेल में स्पष्ट रूप से बताया गया कि पिता बातचीत के लिए अधिक उपलब्ध हैं, तो स्कूलों द्वारा उन्हें फोन करने की संभावना बढ़ गई। लेकिन इसके बावजूद कई मामलों में स्कूलों ने मां को ही फोन किया। यह संकेत देता है कि सिर्फ यह बताना कि पिता उपलब्ध हैं, हमेशा स्कूल के संपर्क करने के तरीके को पूरी तरह नहीं बदलता।
मांओं पर ‘मेंटल लोड’
शोधकर्ताओं ने एक और स्थिति का परीक्षण किया। जब पिता ने स्कूल को ईमेल भेजा और उसमें मां को भी शामिल किया गया, तब स्कूल के पिता से संपर्क करने की संभावना बढ़ी। फिर भी कई मामलों में स्कूलों ने मां को ही फोन किया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इससे यह संकेत मिलता है कि बच्चों की स्कूल संबंधी जिम्मेदारियों में मां को अब भी कई संस्थान प्राथमिक संपर्क व्यक्ति के रूप में देखते हैं। बच्चों की देखभाल से जुड़ी जिम्मेदारियां केवल स्कूल जाना या बच्चे का खाना तैयार करना नहीं हैं। इसके पीछे कई ऐसी जिम्मेदारियां होती हैं जो दिखाई कम देती हैं, लेकिन लगातार दिमाग में चलती रहती हैं। जैसे डॉक्टर की अपॉइंटमेंट लेना, स्कूल के फॉर्म भरना, शिक्षकों के ईमेल का जवाब देना, स्कूल के बाद की गतिविधियों में बच्चे का नाम लिखाना, खेल की प्रैक्टिस का समय याद रखना और अलग-अलग कार्यक्रमों के बीच तालमेल बनाना। इन्हीं जिम्मेदारियों को अक्सर ‘मेंटल लोड’ यानी मानसिक बोझ कहा जाता है।
यह सिर्फ स्कूलों की समस्या नहीं
शोधकर्ताओं का कहना है कि बच्चों की जिम्मेदारियों में यह असमानता केवल स्कूलों तक सीमित नहीं है। पहले के कई अध्ययनों में भी सामने आया है कि डॉक्टर, बच्चों की देखभाल करने वाले कर्मचारी, खेल प्रशिक्षक और दूसरी सेवाएं अक्सर पिता की तुलना में माताओं से अधिक संपर्क करती हैं। इससे एक ऐसी व्यवस्था बन सकती है जिसमें मां धीरे-धीरे बच्चों से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी की मुख्य जिम्मेदार बन जाती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, स्कूल इस असमानता को कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। कई स्कूल पहले से ही परिवारों को यह विकल्प देते हैं कि वे तय करें कि सबसे पहले किस अभिभावक से संपर्क किया जरूरत यह है कि स्कूल बिना किसी धारणा के दोनों माता-पिता को समान रूप से संपर्क का विकल्प दें और परिवार की पसंद के अनुसार अलग-अलग परिस्थितियों के लिए संपर्क व्यक्ति तय करने की सुविधा दें।इससे बच्चों की जिम्मेदारियां सिर्फ एक अभिभावक के हिस्से में जाने के बजाय दोनों के बीच ज्यादा समान रूप से बांटी जा सकती हैं।