सनसनीखेज खुुलासाः नेपाल में तबाही का कारण बना पेशाब ! विनाशकारी बाढ़ से कनैक्शन का खुला राज

Edited By Updated: 05 Sep, 2026 05:30 PM

mount everest base camp is melting human urine is a contributor

एक नई रिसर्च के मुताबिक, हिमालयी बेस कैंपों में पर्वतारोहियों की गतिविधियों से पैदा होने वाली गर्मी ग्लेशियरों पर स्थानीय असर डाल सकती है। 2023 में रोजाना करीब 6,766 लीटर पेशाब पैदा होने का अनुमान लगाया गया। हालांकि, स्थानीय बर्फ पिघलने में ईंधन का...

Kathmandu: नेपाल में हालिया भीषण बाढ़ और हिमालयी क्षेत्र में हुई तबाही ने पूरी दुनिया का ध्यान एक बार फिर ग्लेशियरों और पहाड़ों की बदलती स्थिति पर खींच दिया है। इसी बीच एवरेस्ट बेस कैंप से जुड़ी एक रिसर्च ने ऐसा आंकड़ा सामने रखा है, जो सुनने में बेहद चौंकाने वाला है । बेस कैंप क्षेत्र में पर्वतारोहियों से रोजाना करीब 6,766 लीटर पेशाब निकलता है। रिसर्च के मुताबिक, इसका मतलब यह नहीं है कि नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ इंसानी पेशाब की वजह से हुई। बाढ़ और हिमालयी आपदाओं के पीछे कहीं बड़े प्राकृतिक और जलवायु संबंधी कारण होते हैं। लेकिन अध्ययन ने यह जरूर दिखाया है कि दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला पर बढ़ती मानवीय गतिविधियां स्थानीय स्तर पर ग्लेशियर और बर्फ के पर्यावरण को प्रभावित कर सकती हैं। ऊंचाई वाले इलाकों में पर्वतारोहियों को शरीर में पानी की कमी से बचने के लिए ज्यादा तरल पदार्थ लेना पड़ता है।

 

इसका नतीजा यह होता है कि बेस कैंप पर बड़ी मात्रा में पेशाब भी पैदा होता है। रिसर्च में 2023 के क्लाइंबिंग सीजन का अनुमान देते हुए बताया गया कि वहां हर दिन करीब 6,766 लीटर पेशाब पैदा हुआ।मानव शरीर से निकलते समय पेशाब का तापमान करीब 37 डिग्री सेल्सियस होता है। वैज्ञानिकों ने इसी गर्मी को आधार बनाकर यह आकलन किया कि मानवीय गतिविधियों से आसपास की बर्फ पर कितना अतिरिक्त असर पड़ सकता है। अध्ययन के मुताबिक, 2023 के क्लाइंबिंग सीजन में मानवीय गतिविधियों से पैदा हुई गर्मी के कारण करीब 154 टन बर्फ पिघलने का अनुमान लगाया गया। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आंकड़े को सिर्फ पेशाब से पिघली बर्फ के रूप में समझना गलत होगा। अध्ययन ने मानवीय गतिविधियों से पैदा होने वाली कुल अतिरिक्त गर्मी का आकलन किया है और बताया कि पेशाब से मिलने वाली गर्मी का हिस्सा काफी छोटा है।  रिसर्च के अनुमान के मुताबिक इस अतिरिक्त बर्फ पिघलने में करीब 94 प्रतिशत योगदान ईंधन से पैदा हुई गर्मी का, जबकि करीब 6 प्रतिशत योगदान पेशाब की गर्मी का था। यानी सुर्खियों में भले ही पेशाब सबसे ज्यादा चौंकाता हो, लेकिन वैज्ञानिक नजरिए से ईंधन ज्यादा बड़ा स्थानीय कारक है।

 

नेपाल बाढ़ से इसका कनेक्शन क्या है?
यहीं से यह रिसर्च नेपाल की हालिया तबाही के संदर्भ में ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। हिमालय सिर्फ खूबसूरत पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है। यहां ग्लेशियर, बर्फ, झीलें, हिमस्खलन और नदियां एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। तापमान और बर्फ की स्थिति में बड़े बदलाव होने पर ग्लेशियल झीलों, हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ का जोखिम प्रभावित हो सकता है। हालिया नेपाल आपदा ने यह सवाल और गंभीर कर दिया है कि बदलते हिमालयी पर्यावरण के बीच भविष्य में ऐसी घटनाओं का जोखिम कितना बढ़ सकता है। हालांकि, इस रिसर्च को हालिया नेपाल बाढ़ का प्रत्यक्ष कारण बताना वैज्ञानिक रूप से गलत होगा। इसका महत्व इस बात में है कि यह दिखाती है कि संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में इंसानी गतिविधियां भी स्थानीय पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं।

 

सबसे बड़ा खतरा फिर भी ग्लोबल वार्मिंग
वैज्ञानिकों के लिए हिमालयी ग्लेशियरों का सबसे बड़ा खतरा जलवायु परिवर्तन और बढ़ता वैश्विक तापमान है। बेस कैंप पर ईंधन जलने या मानव गतिविधियों से पैदा होने वाली गर्मी का प्रभाव स्थानीय स्तर पर हो सकता है, लेकिन इसे पूरे हिमालयी ग्लेशियर संकट की मुख्य वजह नहीं माना जा सकता। यानी असली तस्वीर कुछ ऐसी है कि एक तरफ ग्लोबल वार्मिंग ग्लेशियरों को कमजोर कर रही है, दूसरी तरफ तेजी से बढ़ता पर्यटन और पर्वतारोहण संवेदनशील इलाकों पर स्थानीय दबाव बढ़ा रहा है। रिसर्च में बेस कैंप के बेहतर प्रबंधन की जरूरत पर जोर दिया गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल कम करना, सौर ऊर्जा जैसे स्वच्छ विकल्प बढ़ाना और संवेदनशील बर्फीले क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करना मददगार हो सकता है। जरूरत पड़ने पर बेस कैंप की लोकेशन को लेकर भी विचार किया जा सकता है, ताकि ग्लेशियर की संवेदनशील सतह पर दबाव कम हो।

 

नेपाल की बाढ़ ने चेतावनी और गंभीर कर दी
नेपाल की हालिया विनाशकारी बाढ़ ने दिखा दिया है कि हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा कितना गंभीर हो सकता है। ऐसे में एवरेस्ट बेस कैंप की यह रिसर्च एक अलग लेकिन महत्वपूर्ण चेतावनी देती है । हिमालय को बचाने की लड़ाई सिर्फ आसमान में बढ़ते तापमान के खिलाफ नहीं है, बल्कि जमीन पर बढ़ती मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करना भी जरूरी है।  

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