Edited By Tanuja,Updated: 22 Aug, 2026 06:07 PM

PoK में विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा बलों की कार्रवाई की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार दानिश इरशाद को पाकिस्तान ने आतंकवाद से जुड़ी फोर्थ शेड्यूल निगरानी सूची में डाल दिया है। रिपोर्टों के अनुसार उनकी यात्रा और वित्तीय गतिविधियों पर पाबंदियां लगी हैं।...
Islamabad: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा बलों की कार्रवाई की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार और रिसर्चर दानिश इरशाद पर पाकिस्तान सरकार ने कड़ा शिकंजा कस दिया है। उनका नाम आतंकवाद से जुड़ी निगरानी सूची यानी ‘फोर्थ शेड्यूल’ में डाल दिया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक, इसके बाद उनकी आवाजाही, वित्तीय गतिविधियों और विदेश यात्रा पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। हैरानी की बात यह है कि इरशाद के खिलाफ किसी आतंकी गतिविधि में शामिल होने का कोई सार्वजनिक अदालत का फैसला सामने नहीं आया है। दानिश इरशाद करीब एक दशक से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान से जुड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते रहे हैं।
बताया जाता है कि उन्होंने 2015 में इस्लामाबाद से पत्रकारिता शुरू की थी। वह लाहौर स्थित नियो न्यूज से जुड़े रहे हैं और जम्मू से प्रकाशित कश्मीर टाइम्स में कॉलम भी लिखते हैं। उन्होंने 1947 के बाद जम्मू-कश्मीर के इतिहास पर एक किताब भी लिखी है। हाल के महीनों में इरशाद का फोकस खास तौर पर PoK में चल रहे विरोध प्रदर्शनों, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और उससे प्रभावित लोगों एवं उनके परिवारों पर रहा है। इरशाद के मुताबिक, उन्हें 18 अगस्त को सोशल मीडिया के जरिए पता चला कि उनका नाम फोर्थ शेड्यूल में शामिल किया गया है। इसके बाद उन्होंने PoK के गृह विभाग के एक सूत्र से इसकी पुष्टि की। रिपोर्टों के मुताबिक, PoK के 24 वांछित लोगों की सूची में इरशाद का नाम 12वें स्थान पर है। इसी कार्रवाई में जम्मू-कश्मीर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) से जुड़े कार्यकर्ताओं का भी उल्लेख किया गया है। इरशाद का कहना है कि उन्हें न तो किसी मामले में अदालत के सामने पेश किया गया और न ही किसी अपराध में दोषी ठहराया गया है। सरकार की ओर से उनके खिलाफ कार्रवाई का विस्तृत कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है।
पाकिस्तान में फोर्थ शेड्यूल आतंकवाद रोधी कानून के तहत निगरानी व्यवस्था है। इसमें उन लोगों को रखा जा सकता है जिन्हें सरकार आतंकवाद, प्रतिबंधित संगठनों या संबंधित गतिविधियों से जुड़ा मानती है। इस सूची में शामिल किए जाने के बाद व्यक्ति को कई तरह की पाबंदियों और निगरानी का सामना करना पड़ सकता है। इनमें यात्रा पर प्रतिबंध, वित्तीय गतिविधियों की निगरानी और बैंकिंग संबंधी परेशानियां शामिल हो सकती हैं। यही वजह है कि किसी पत्रकार को इस सूची में डालना सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई से कहीं ज्यादा गंभीर माना जाता है। दानिश इरशाद पर कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब PoK में JAAC के नेतृत्व में लंबे समय से विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं।प्रदर्शनकारी राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सब्सिडी, शासन व्यवस्था और स्थानीय अधिकारों समेत कई मुद्दे उठा रहे हैं।
उनकी मांगों में पाकिस्तान में बसे कश्मीरी शरणार्थियों के लिए PoK विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों को खत्म करना भी शामिल है। पाकिस्तान सरकार ने 5 जून को JAAC पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच तनाव बढ़ गया। प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट बंद करने और मीडिया की गतिविधियों पर प्रतिबंध जैसी कार्रवाई की खबरें भी सामने आई थीं। इरशाद ने इन प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों और प्रभावित परिवारों की स्थिति पर लगातार रिपोर्टिंग की। JAAC का दावा है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 80 से ज्यादा नागरिक मारे गए। हालांकि, ऐसे आंकड़ों और आरोपों को संबंधित पक्षों के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए, जब तक स्वतंत्र रूप से उनकी पूरी पुष्टि न हो।
पाकिस्तानी पत्रकार सालेह सफीर अब्बासी ने इसे प्रेस की आजादी के लिए गंभीर मामला बताया। उनका तर्क है कि सरकार से असहमति रखना अपने आप में अपराध नहीं होना चाहिए। ब्रिटेन में रहने वाले पाकिस्तानी कार्यकर्ता अजहर अहमद ने भी सवाल उठाया कि किसी पत्रकार के खिलाफ आतंकवाद रोधी कानून का इस्तेमाल प्रेस की स्वतंत्रता और स्वतंत्र रिपोर्टिंग के लिए डर का माहौल पैदा कर सकता है। वहीं, न्यूयॉर्क की पाकिस्तानी खोजी पत्रकार अरीबा फातिमा ने भी सवाल किया कि यदि इरशाद के खिलाफ कोई सार्वजनिक मुकदमा या अदालत का फैसला नहीं है, तो उन्हें आतंकवाद से जुड़ी निगरानी व्यवस्था में शामिल करने का आधार क्या है। इस पूरे मामले ने पाकिस्तान में पत्रकारिता, असहमति और सुरक्षा कानूनों के इस्तेमाल को लेकर बहस तेज कर दी है।