Edited By Tanuja,Updated: 20 Oct, 2026 11:32 AM

27 देशों के प्रमुख विश्वविद्यालयों से जुड़े भारतीय मूल के 400 से अधिक छात्रों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों ने ‘भारत को अराजकता से बचाएं’ बयान पर हस्ताक्षर किए हैं। उन्होंने चुनाव नतीजों को नकारने और संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास जताने की प्रवृत्ति पर...
London: भारत में चुनाव प्रक्रिया, संवैधानिक संस्थाओं और विरोध प्रदर्शनों को लेकर जारी बहस के बीच 27 देशों के प्रमुख विश्वविद्यालयों से जुड़े भारतीय मूल के 400 से अधिक छात्रों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और पूर्व छात्रों ने चिंता जताई है। उन्होंने अप्रत्यक्ष तौर पर कॉकरोच जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए ‘भारत को अराजकता से बचाएं’ शीर्षक के तहत जारी संयुक्त बयान में चुनाव नतीजों को नकारने, संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने और संसद के बजाय सड़क को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की है। एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर वाले इस बयान में कहा गया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सम्मान जरूरी है।
यह बयान ऐसे समय आया है, जब चुनाव आयोग की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। हालांकि, बयान में इन प्रदर्शनों या किसी अन्य आंदोलन का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है। बयान पर हस्ताक्षर करने वाले लोग अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड, आयरलैंड, इटली, स्पेन, स्वीडन, नॉर्वे, पोलैंड, रूस, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, मलेशिया, इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात सहित 27 देशों में रहते हैं। इनमें मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी), ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, प्रिंसटन विश्वविद्यालय, हार्वर्ड विश्वविद्यालय, येल विश्वविद्यालय, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, कोलंबिया विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर और टोरंटो विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों से जुड़े लोग शामिल हैं।
संयुक्त बयान में कहा गया है कि आजादी के बाद के सात दशकों में भारतीय लोकतंत्र ने कई बार अपनी मजबूती साबित की है। इसमें संस्थाओं के विकास, विभिन्न संस्थाओं के बीच संतुलन और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण को लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं बताया गया है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने चिंता जताई कि चुनाव नतीजे मनमुताबिक नहीं आने पर चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाते हैं। उनके अनुसार, संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास जताने और संसद के बजाय सड़क पर विरोध को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।बयान में न्यायालयों के फैसलों पर होने वाली टिप्पणियों का भी उल्लेख किया गया है। हस्ताक्षरकर्ताओं का कहना है कि ऐसी टिप्पणियां न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर कर सकती हैं। उन्होंने सशस्त्र बलों को राजनीतिक विवादों में घसीटे जाने पर भी चिंता जताई।