Edited By Tanuja,Updated: 11 Apr, 2026 06:29 PM

इस्लामाबाद में शांति वार्ता से पहले अमेरिका और ईरान के अधिकारियों ने अलग-अलग बैठकों में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से मुलाकात की। दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी शर्तें रखीं। पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए स्थायी समाधान की उम्मीद जताई, लेकिन...
International Desk: इस्लामाबाद में होने वाली अहम अमेरिका-ईरान शांति वार्ता से पहले कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत शुरू होने से पहले जो तस्वीर सामने आई है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। वार्ता शुरू होने से पहले अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों ने अलग-अलग बैठकों में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात की। अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जे डी वेंस ने अपनी टीम के साथ प्रधानमंत्री से बातचीत की। इस बैठक में स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनेर भी मौजूद रहे। अमेरिकी पक्ष ने क्षेत्रीय सुरक्षा, परमाणु मुद्दे और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही को प्राथमिकता बताया।
दूसरी ओर, ईरान के प्रतिनिधिमंडल ने भी अलग बैठक में प्रधानमंत्री से मुलाकात की। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मोहम्मद बगेर गालिबफ कर रहे हैं, जबकि विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी इसमें शामिल हैं। ईरान ने बातचीत के लिए अपनी शर्तें साफ रखीं खासतौर पर लेबनान में युद्धविराम और विदेशों में फंसी अपनी संपत्तियों को मुक्त करने की मांग। पाकिस्तान ने दोनों पक्षों से अलग-अलग बातचीत करके खुद को एक सक्रिय मध्यस्थ के रूप में पेश किया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उम्मीद जताई कि ये वार्ताएं क्षेत्र में स्थायी शांति का रास्ता खोल सकती हैं।
हालांकि, दोनों पक्षों के बीच गहरे मतभेद अभी भी बने हुए हैं। अमेरिका जहां ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त है, वहीं ईरान सुरक्षा और आर्थिक शर्तों को प्राथमिकता दे रहा है। अलग-अलग बैठकों से साफ है कि विश्वास की कमी अभी भी बरकरार। दोनों पक्ष अपने-अपने हितों को पहले रख रहे हैं। इस्लामाबाद में अलग-अलग बैठकों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वार्ता आसान नहीं होगी। अब यह देखना अहम होगा कि क्या ये प्रारंभिक बातचीत आगे चलकर किसी ठोस समझौते में बदलती है या नहीं।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने जे डी वेंस और ईरानी प्रतिनिधिमंडल से अलग-अलग कमरों में मुलाकात की यानी आमने-सामने बातचीत से पहले ही दूरी साफ दिख गई। क्या यह अविश्वास का संकेत है? या फिर पर्दे के पीछे कोई बड़ी रणनीति तैयार हो रही है? जब शांति की बात हो और पक्ष एक साथ बैठने से भी बचें, तो “दाल में काला” होने का शक और गहरा जाता है।