Edited By Radhika,Updated: 04 Jul, 2026 10:23 AM

भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा का आयोजन हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को किया जाता है।इस यात्रा पर लाखों श्रद्धालु देश- विदेश से यहां पर पहुंचते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस यात्रा में शामिल होने से भक्तों को मोक्ष की...
Jagannath Rath Yatra: भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा का आयोजन हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को किया जाता है।इस यात्रा पर लाखों श्रद्धालु देश- विदेश से यहां पर पहुंचते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस यात्रा में शामिल होने से भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और व्यक्ति सांसारिक विकारों से मुक्त हो जाते हैं। पुरी का जगन्नाथ मंदिर अपने कई अनूठे और विस्मयकारी रहस्यों के लिए जाना जाता है। यहाँ स्थापित भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाएँ अधूरी और काष्ठ (लकड़ी) की बनी हुई हैं। इस मंदिर में एक बेहद खास परंपरा निभाई जाती है, जिसे 'नवकलेवर' कहा जाता है। आइए जानते हैं इस रहस्यमयी परंपरा से जुड़ी मुख्य बातें:
क्या है 'नवकलेवर' परंपरा?
नवकलेवर का शाब्दिक अर्थ है 'नया शरीर धारण करना'। मंदिर में मौजूद मूर्तियां लकड़ी की बनी होती हैं। एक समय के बाद उनके खराब होने की संभावना रहती है, इसलिए इन्हें बदला जाता है। यह प्रक्रिया हर साल नहीं होती, बल्कि हिंदू पंचांग के अनुसार जिस वर्ष आषाढ़ मास में 'अधिकमास' या 'मलमास' (एक ही महीने का दो बार आना) पड़ता है, तब यह अनुष्ठान किया जाता है। आमतौर पर यह अंतराल 12 से 19 वर्ष के बीच का होता है।
इस लकड़ी से बनती हैं प्रतिमाएं
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की नई मूर्तियों के निर्माण के लिए विशेष रूप से नीम के पेड़ों को चुना जाता है। मंदिर के मुख्य पुजारियों द्वारा बेहद कड़े नियमों के तहत करीब 100 वर्ष पुराने और दोषमुक्त पेड़ों को खोजा जाता है, जिनसे इन पवित्र विग्रहों का निर्माण होता है।
'ब्रह्म पदार्थ' और महाअंधकार का रहस्य
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे रोमांचक और रहस्यमयी हिस्सा 'ब्रह्म पदार्थ' का स्थानांतरण है। पुरानी मूर्तियों को विसर्जित करने से पहले उनके भीतर मौजूद इस अलौकिक तत्व को नई मूर्तियों में स्थापित किया जाता है। जिस रात यह पूरा अनुष्ठान होता है उस दौरान पूरे पूरी शहर की बिजली गुल कर दी जाती है। मंदिर के परिसर को एक छावनी में बदल दिया जाता है, ताकि कोई भी इस पूरे प्रोसेस को देख न सके। मंदिर के मुख्य पुजारी अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर और मोटे दस्ताने पहनकर पुरानी मूर्ति के सीने से 'ब्रह्म पदार्थ' निकालकर नई मूर्ति में स्थापित करते हैं। इस पूरे अनुष्ठान को करने वाले पुजारियों ने भी इस पदार्थ को कभी नहीं देखा, लेकिन जब वे इसे हाथ में पकड़ते हैं तो उन्हें कुछ धड़कता हुआ महसूस होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का हृदय है, जो आज भी जीवंत अवस्था में मौजूद है। आस्था, गोपनीयता और प्राचीन मान्यताओं का यह अनूठा संगम जगन्नाथ पुरी को पूरी दुनिया में अद्वितीय बनाता है।