अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में ‘ब्रेनवॉश’ का आरोप, PIL पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

Edited By Updated: 10 Aug, 2026 01:46 PM

allegations of brainwashing in minority educational institutions

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को धार्मिक या सेक्युलर शिक्षा देने वाले संस्थानों के रजिस्ट्रेशन, मान्यता, देखरेख और निगरानी के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की गई...

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को धार्मिक या सेक्युलर शिक्षा देने वाले संस्थानों के रजिस्ट्रेशन, मान्यता, देखरेख और निगरानी के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की गई थी। याचिका बीजेपी नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर की गई थी।

याचिका में दावा किया गया था कि कुछ अर्ध-धार्मिक अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत मिले अधिकारों की आड़ में संचालित हो रहे हैं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि ऐसे संस्थानों में बच्चों को कट्टरपंथ की ओर प्रभावित किए जाने की आशंका है और इन संस्थानों की प्रभावी निगरानी नहीं होने से आंतरिक सुरक्षा, भाईचारे, एकता और राष्ट्रीय अखंडता से जुड़े गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।

याचिका में क्या मांग की गई थी?

याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसे सभी संस्थानों के संबंध में रजिस्ट्रेशन, मान्यता, निगरानी और निरीक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग की गई थी, जहां 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को धार्मिक या सेक्युलर शिक्षा दी जाती है। याचिकाकर्ता की दलील थी कि धार्मिक शिक्षा के नाम पर संचालित संस्थानों पर पर्याप्त सरकारी निगरानी होनी चाहिए, ताकि बच्चों की शिक्षा के दौरान किसी भी तरह के कट्टरपंथी प्रभाव की संभावना को रोका जा सके।

अनुच्छेद 30 को लेकर उठे सवाल

PIL में संविधान के अनुच्छेद 30 की व्याख्या को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। अनुच्छेद 30 धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार देता है। याचिका में दावा किया गया कि इस संवैधानिक प्रावधान का इस्तेमाल ऐसे संस्थानों को संरक्षण देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, जो बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने के नाम पर राज्य की निगरानी से बाहर हों। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि धार्मिक शिक्षा को अप्रत्यक्ष रूप से धर्म के प्रचार से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ के समक्ष हुई। पीठ ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, “आप एक के बाद एक रिट याचिकाएं दायर नहीं कर सकते।” इसके बाद अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। कोर्ट ने याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अपनी याचिका वापस लेना चाहता है और उचित मंच पर अपना उपाय खोजना चाहता है।

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